ध्रुवों पर पिघलती बर्फ के कारण हिमालय में सर्दियों के तूफानों यानी पश्चिमी विक्षोभों की तीव्रता और आवृत्ति घट सकती है, जिससे लाखों लोगों की जल आपूर्ति, कृषि और जीवन प्रभावित हो सकते हैं।
भारतीय और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि आर्कटिक और अंटार्कटिक की बर्फ पिघलने से वायुमंडलीय प्रवाह और जेट स्ट्रीम में बदलाव आता है, जिससे हिमालयी बर्फबारी और बारिश में कमी आ सकती है।
शोधकर्ता चेतावनी देते हैं कि यदि वैश्विक तापमान और उत्सर्जन को नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले दशकों में यह संकट और बढ़ सकता है।
अध्ययन साफ़ तौर पर दिखाता है कि पोलर क्षेत्रों में बदलाव सिर्फ ध्रुवों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हिमालय और दक्षिण एशिया के मौसम, जल संसाधन और कृषि पर भी दूरगामी असर डाल सकते हैं।
सर्दियों की ठंडी हवाओं और बर्फ से ढंकी हिमालय की चोटियां दशकों से नदियों, खेतों और गांवो के जीवन का आधार रही हैं। लेकिन अब वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि आर्कटिक और अंटार्कटिक में पिघलती बर्फ इस प्राकृतिक संतुलन को खतरे में डाल सकती है।
अगर ये बदलाव जारी रहे, तो हिमालय में सर्दियों के तूफानों की तीव्रता और आवृत्ति घट सकती है, और इसका सीधा असर लाखों किसानों, गांवों और शहरों की जल आपूर्ति और जीवन पर पड़ेगा।
भारतीय वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि आर्कटिक और अंटार्कटिक में बर्फ के तेजी से पिघलने से हिमालय में सर्दियों के दौरान आने वाले तूफानों की आवृत्ति और तीव्रता दोनों कम हो सकती हैं। ये तूफान, जिन्हें पश्चिमी विक्षोभ यानी वेस्टर्न डिस्टर्बेंस (डब्ल्यूडी) कहा जाता है, हिमालय में बर्फबारी और दक्षिण एशिया की बड़ी नदियों जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र के जल स्रोतों के लिए बेहद अहम हैं।
गौरतलब है कि पश्चिमी विक्षोभ, भूमध्य सागर में उत्पन्न होने वाला एक अतिरिक्त-उष्णकटिबंधीय तूफान है, जो सर्दियों में भारत, पाकिस्तान और नेपाल में बारिश और बर्फबारी लाता है। यह पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर बढ़ता है, जिससे उत्तर-पश्चिमी भारत में ठंड, बारिश और कोहरा बढ़ता है, जो रबी फसलों के लिए बेहद फायदेमंद होता है।
पश्चिमी विक्षोभ: बारिश और बर्फ का इंजन
ऐसे में इन तूफानों के कमजोर होने का मतलब है कि क्षेत्रीय जल आपूर्ति, कृषि उत्पादन और मौसम के स्थानीय पैटर्न पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
यह अध्ययन इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज और यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन से जुड़े शोधकर्ता वरुणेश चंद्रा और उनके सहयोगियों एस संदीप और कीरन एम आर हंट द्वारा किया गया है। अपने इस अध्ययन में उन्होंने क्लाइमेट सिमुलेशन तकनीक का उपयोग करके यह पता लगाने की कोशिश की है कि ध्रुवों पर बर्फ के पिघलने से वायुमंडलीय परिस्थितियों में क्या बदलाव आते हैं।
इसे समझने के लिए उन्होंने समुद्री बर्फ के परिदृश्य का सिमुलेशन तैयार किया, जिसमें आर्कटिक और अंटार्कटिक दोनों क्षेत्रों में बर्फ का परावर्तन कम करके दिखाया गया। इससे सूरज की किरणों का अवशोषण अधिक हुआ और पोलर क्षेत्र गर्म हो गए।
इसके बाद उन्होंने इन परिणामों को हाई-रिजॉल्यूशन वायुमंडलीय मॉडल से जोड़कर अलग-अलग पश्चिमी विक्षोभ के गठन और गति का अध्ययन किया। शोध में यह भी सामने आया है कि समुद्री बर्फ के पिघलने से वायुमंडलीय प्रवाह यानी जेट स्ट्रीम में बड़े बदलाव आते हैं। विशेष रूप से, सबट्रॉपिकल जेट स्ट्रीम कमजोर और चौड़ी हो जाती है। इसके साथ ही वो थोड़ा भूमध्य रेखा की ओर शिफ्ट हो जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि पश्चिमी विक्षोभों का निर्माण और उनकी तीव्रता दोनों कम हो जाती हैं।
सर्दियों के तूफानों में 19 फीसदी तक गिरावट
मॉडल के अनुसार, पश्चिमी विक्षोभों की गतिविधि मुख्य क्षेत्र में करीब 19 फीसदी तक घट सकती है। यह आंकड़ा महज मौसम की बात नहीं, बल्कि भविष्य में बढ़ती ग्रीनहाउस गैसों और वैश्विक तापमान में आते उछाल के प्रभावों का संकेत भी देता है।
शोधकर्ताओं ने आशंका जताई है कि यह बदलाव सीधे तौर पर हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फबारी, नदियों के जल प्रवाह और कृषि को प्रभावित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, बर्फबारी कम होने से नदी के जलस्तर में गिरावट आ सकती है और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
इस अध्ययन के नतीजे ओपन एक्सेस जर्नल एटमोस्फियरिक साइंस लेटर्स में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन का एक और महत्वपूर्ण संदेश यह है कि ध्रुवीय क्षेत्रों में होने वाले बदलाव हजारों किलोमीटर दूर मौसम पर भी गहरा असर डाल सकते हैं।
यह अध्ययन साबित करता है कि जलवायु परिवर्तन केवल स्थानीय चुनौती नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी ग्लोबल सिस्टम पर पड़ता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत और दक्षिण एशिया को अपने जल और कृषि संसाधनों के भविष्य की सुरक्षा के लिए इन बदलावों को भी ध्यान में रखना होगा।
वैश्विक तापमान और स्थानीय जीवन का कनेक्शन
शोधकर्ताओं के मुताबिक अगर पश्चिमी विक्षोभों में लगातार कमी आती रही, तो यह स्थानीय मौसम के संकटों को बढ़ा सकता है। नदियों में पानी की कमी, बर्फबारी में गिरावट और कृषि उत्पादन पर असर, ये सब सीधे स्थानीय आबादी और उनकी जीविका पर असर डाल सकते हैं। इसके साथ ही अध्ययन यह भी दर्शाता है कि ध्रुवों पर जमा बर्फ को बचाना केवल ध्रुवीय क्षेत्र से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह हिमालय और दक्षिण एशिया जैसे दूर-दराज के क्षेत्रों में मौसम और जल सुरक्षा के लिए भी बेहद जरूरी है।
निष्कर्ष दर्शाते हैं कि वैश्विक तापमान में होती वृद्धि और ध्रुवों पर पिघलती बर्फ के बीच गहरा संबंध है। ऐसे में अगर वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन और तापमान को नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले दशकों में हिमालय में सर्दियों के तूफानों में लगातार कमी देखी जा सकती है। इससे मौसम संबंधित जोखिम बढ़ सकते हैं।
ऐसे में वैश्विक जलवायु नीतियों और स्थानीय जल प्रबंधन रणनीतियों को इस प्रकार डिजाइन करना होगा कि भविष्य में हिमालय और दक्षिण एशिया के लिए पानी और कृषि सुरक्षा को सुनिश्चित की जा सके।