दक्षिण एशिया में धूल और प्रदूषण के मिश्रण वाले एरोसोल सबसे प्रभावी, वातावरण को गर्म करने के लिए जिम्मेवार।
वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में सात प्रकार के एरोसोल की पहचान की, जलवायु मॉडल और मौसम पूर्वानुमान में मिलेगी मदद।
अधिक अवशोषण वाले एरोसोल वातावरण में सबसे ज्यादा गर्मी बढ़ाते हैं, जबकि कमजोर एरोसोल का प्रभाव अपेक्षाकृत कम पाया गया।
छह महाद्वीपों के 171 निगरानी केंद्रों के 30 वर्षों के आंकड़ों से एरोसोल के वैश्विक प्रभावों का किया गया अध्ययन।
एरोसोल की सही पहचान से वायु गुणवत्ता निगरानी, उपग्रह अध्ययन और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने में सहायता मिलेगी।
हवा में मौजूद बेहद छोटे कण, जिन्हें एरोसोल कहा जाता है, अब जलवायु और मौसम को प्रभावित करने वाले बड़े कारणों में शामिल हो गए हैं। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में सामने आया है कि दक्षिण एशिया में धूल और प्रदूषण के मिले-जुले एरोसोल बड़ी मात्रा में मौजूद हैं। ये कण वातावरण को गर्म करने और मौसम की गतिविधियों में बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि एरोसोल की संरचना और उनके प्रभाव को समझना जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण की चुनौती से निपटने के लिए जरूरी है। इस अध्ययन से दुनिया भर में एरोसोल के वितरण और उनके जलवायु प्रभावों की बेहतर जानकारी मिली है।
दुनिया भर के एरोसोल का किया गया अध्ययन
यह शोध भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (आईआईए), बेंगलुरु और आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एआरआईईएस), नैनीताल के वैज्ञानिकों ने भारत और विदेशों के अन्य शोधकर्ताओं के साथ मिलकर किया है। अध्ययन एटमॉस्फेरिक एनवायरनमेंट जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
शोधकर्ताओं ने दुनिया के छह महाद्वीपों में मौजूद 171 निगरानी केंद्रों से मिले 30 साल से ज्यादा पुराने आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसके लिए एरोसोल रोबोटिक नेटवर्क (ऐरोनेट) से प्राप्त जानकारी का इस्तेमाल किया गया।
एरोसोल को सात श्रेणियों में बांटा गया
वैज्ञानिकों ने एरोसोल को उनके गुणों के आधार पर सात मुख्य प्रकारों में विभाजित किया। इनमें शुद्ध धूल, धूल मिश्रण, प्रदूषण प्रधान मिश्रण, बहुत कम अवशोषण वाले कण, कम अवशोषण वाले कण, मध्यम अवशोषण वाले कण और अधिक अवशोषण वाले कण शामिल हैं।
अध्ययन में पाया गया कि उत्तरी अफ्रीका में रेगिस्तानी धूल वाले एरोसोल का प्रभाव अधिक है। वहीं दक्षिण एशिया में धूल और प्रदूषण के मिश्रण वाले एरोसोल प्रमुख हैं। यूरोप और उत्तरी अमेरिका के शहरी इलाकों में कम गर्मी पैदा करने वाले एरोसोल पाए जाते हैं। जबकि जंगलों में आग और जैव ईंधन जलने वाले उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अधिक अवशोषण वाले एरोसोल की मात्रा ज्यादा होती है।
वातावरण को सबसे ज्यादा गर्म करते हैं कुछ एरोसोल
अध्ययन में सामने आया कि अधिक अवशोषण वाले एरोसोल, जिनमें काले कार्बन जैसे कण शामिल होते हैं, वातावरण को सबसे ज्यादा गर्म करते हैं। इनसे होने वाला एरोसोल रेडिएटिव फोर्सिंग लगभग 30.14 वाट प्रति वर्ग मीटर पाया गया।
इसके मुकाबले बहुत कम अवशोषण वाले एरोसोल का प्रभाव काफी कम रहा। इनसे रेडिएटिव फोर्सिंग लगभग 7.83 वाट प्रति वर्ग मीटर दर्ज की गई। वैज्ञानिकों के अनुसार, अधिक गर्मी पैदा करने वाले एरोसोल बादलों के बनने, बारिश के तरीके और क्षेत्रीय मौसम पर असर डाल सकते हैं।
मौसम और स्वास्थ्य पर पड़ सकता है असर
एरोसोल सूर्य के प्रकाश के साथ अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया करते हैं। कुछ कण सूर्य की रोशनी को वापस अंतरिक्ष में भेजकर धरती को ठंडा करने में मदद करते हैं, जबकि कुछ कण सूर्य की ऊर्जा को सोखकर वातावरण को गर्म करते हैं।
दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों में जहां धूल, वाहनों का धुआं, उद्योगों से निकलने वाला प्रदूषण और अन्य स्रोत मिलकर एरोसोल बनाते हैं, वहां इसका असर ज्यादा देखने को मिलता है। इससे मौसम के बदलाव के साथ-साथ वायु गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
जलवायु मॉडल को बेहतर बनाने में मिलेगी मदद
शोधकर्ताओं के अनुसार, पहले एरोसोल का अध्ययन सीमित श्रेणियों के आधार पर किया जाता था। इस नए अध्ययन में अधिक विस्तृत वर्गीकरण किया गया है, जिससे जलवायु मॉडल को बेहतर बनाया जा सकेगा।
इस शोध में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और अमेरिका तथा जापान के वैज्ञानिकों ने भी सहयोग दिया।
वैज्ञानिकों का मानना है कि एरोसोल की सही पहचान से उपग्रहों के जरिए प्रदूषण की निगरानी, मौसम की भविष्यवाणी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने में मदद मिलेगी। यह अध्ययन आने वाले समय में बेहतर पर्यावरण नीतियां बनाने के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।