जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल बढ़ते तापमान, सूखे या बाढ़ तक सीमित नहीं रह गया है। प्रतिष्ठित जर्नल नेचर में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने चेतावनी दी है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण आने वाले दशकों में ओलावृष्टि पहले से कहीं अधिक विनाशकारी हो सकती है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सदी के अंत तक ओलावृष्टि से होने वाला वैश्विक नुकसान 42.1 फीसदी तक बढ़ सकता है।
अध्ययन के अनुसार, बढ़ते तापमान और वातावरण में बढ़ती नमी के कारण 30 मिलीमीटर या उससे बड़े आकार के ओलों की घटनाओं में 51.8 फीसदी तक वृद्धि हो सकती है, जबकि छोटे ओलों की संख्या घट सकती है।
चीन और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने 14,000 से अधिक ऐतिहासिक ओलावृष्टि घटनाओं का विश्लेषण कर यह निष्कर्ष निकाला है कि बड़े ओले अधिक तेज गति से गिरते हैं और फसलों, घरों, वाहनों तथा बुनियादी ढांचे को कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं।
एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल होंगे, जिससे भारत भी खतरे की जद से बाहर नहीं है। अध्ययन स्पष्ट संकेत देता है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण नहीं किया गया और जलवायु अनुकूलन के उपाय नहीं अपनाए गए, तो आसमान से गिरने वाले ओले भविष्य में जलवायु संकट के सबसे विनाशकारी प्रतीकों में बदल सकते हैं।
किसान जब आसमान की तरफ देखता है, तो उसकी आंखों में उम्मीद होती है। लेकिन जब वही आसमान अचानक काले बादलों से घिरकर सफेद आफत बरसाने लगे, तो उम्मीदें मिट्टी में मिल जाती हैं। सच कहें तो ओलावृष्टि सिर्फ मौसम का बदलना नहीं है, यह किसी से उसकी छत तो किसी से निवाले छीन लेती है।
चिंता की बात यह है कि इंसान की अपनी गलतियों की वजह से आसमान से बरसने वाली यह आफत पहले से कहीं ज्यादा हिंसक होने जा रही है। इस बारे में प्रतिष्ठित जर्नल नेचर में प्रकाशित एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि सदी के अंत तक ओलावृष्टि से होने वाली तबाही में 42.1 फीसदी तक की भारी बढ़ोतरी हो सकती है।
सदी के अंत तक कितना बढ़ सकता है नुकसान?
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वातावरण में बढ़ती गर्मी के कारण बड़े ओलों जिनका आकार 30 मिलीमीटर या उससे अधिक है उनके गिरने की रफ्तार 51.8 फीसदी तक बढ़ सकती है। मतलब आने वाले समय में खेतों और आशियानों पर गिरने वाली यह बर्फ, बर्फ नहीं बल्कि 'पत्थर' बनकर बरसेगी। ऐसे में लोगों की जान, फसलों, वाहनों और बुनियादी ढांचे को होने वाला नुकसान तेजी से बढ़ सकता है।
अध्ययन में इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण दुनिया के कई हिस्सों में पहले से बड़े आकार के ओले गिर सकते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ओलों के मामले में उनका आकार बेहद महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि बड़े ओले अधिक तबाही मचाते हैं। इसके विपरीत, छोटे आकार के ओलों की संख्या में 4.2 से 12.3 फीसदी तक की कमी आने की उम्मीद है।
ग्लोबल वार्मिंग ने बदल दिया ओलों का मिजाज
बता दें कि हाल के वर्षों में दुनिया भर में रिकॉर्ड तोड़ ओलावृष्टि की घटनाएं सामने आई हैं। लोग हैरान थे कि क्या यह महज एक इत्तेफाक है? लेकिन वैज्ञानिक के मुताबिक इसके पीछे कोई गहरा कारण है। ओलों के मामले में उनका आकार सबसे ज्यादा मायने रखता है।
ओला जितना बड़ा होगा, उसकी गिरने की रफ्तार और तबाही मचाने की ताकत उतनी ही भयानक होगी। इस खतरे को गहराई से समझने के लिए अपने इस अध्ययन में चीन और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने एक बेहद आधुनिक कंप्यूटर मॉडल का सहारा लिया। उन्होंने दुनिया भर में सामने आई ओलावृष्टि की 14,000 से अधिक ऐतिहासिक घटनाओं का विश्लेषण किया है।
इसे समझने के लिए उन्होंने तापमान, हवा में मौजूद नमी और ओलों की रफ्तार से जुड़े आंकड़ों को इस मॉडल में डाला ताकि यह समझा जा सके कि आसमान में ओले कैसे बनते, कैसे बढ़ते और गिरते समय कितने पिघलते हैं।
42 फीसदी ज्यादा नुकसान का खतरा
साथ ही वैज्ञानिकों ने यह समझने के लिए कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन का असर कितना गंभीर हो सकता है, सदी के अंत (2070-2100) तक के तीन अलग-अलग जलवायु परिदृश्यों का विश्लेषण किया।भारत पर जलवायु की दोहरी मार: 2030 तक दोगुनी होगी लू, 43 फीसदी बढ़ेगा बारिश का कहर
इस अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि इस सदी के अंत तक ओलावृष्टि से होने वाला वैश्विक नुकसान 36.5 से 42.1 फीसदी तक बढ़ सकता है। इसी तरह वातावरण में बढ़ती गर्मी और नमी के कारण 30 मिलीमीटर या उससे बड़े आकार के ओलों के गिरने की आवृत्ति 37.9 फीसदी से 51.8 फीसदी तक बढ़ जाएगी।
वहीं दूसरी तरफ छोटे ओलों (30 मिमी से कम) की घटनाओं में 4 से 12 फीसदी तक की कमी आ सकती है।
खतरे की जद से बाहर नहीं भारत
वैज्ञानिकों के अनुसार, उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया ऐसे क्षेत्र होंगे जहां सबसे अधिक नुकसान होने की आशंका है। हालांकि उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कुल ओलावृष्टि की घटनाएं कुछ कम हो सकती हैं, क्योंकि छोटे ओले जमीन तक पहुंचने से पहले ही पिघल जाएंगे। इसके साथ ही इन क्षेत्रों में कुल ओलावृष्टि की घटनाएं कुछ कम हो सकती हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है। लेकिन यदि सरकारें और समाज अभी से ही सचेत हो जाएं, अपनी फसलों, घरों और बुनियादी ढांचे को इस बदलते मौसम के अनुकूल ढालना शुरू कर दें, तो हम इस तबाही के असर को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
ऐसे में यह अध्ययन केवल ओलों के आकार में बढ़ोतरी की कहानी बयां नहीं कहता, बल्कि उस भविष्य की चेतावनी देता है जिसे हमने अपनी ही गलतियों से जन्म दिया है। यदि बढ़ते उत्सर्जन पर लगाम नहीं लगी और जलवायु अनुकूलन की दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में आसमान से गिरने वाले ओले महज मौसम की घटना नहीं, बल्कि कृषि, अर्थव्यवस्था और मानव जीवन पर बढ़ते जलवायु संकट के प्रतीक बन जाएंगे।