दुनिया भर में गैस फ्लेरिंग की समस्या लगातार बढ़ रही है। 2024 में गैस फ्लेरिंग का यह आंकड़ा बढ़कर 151 अरब घन मीटर तक पहुंच गया, जो पिछले 17 वर्षों में अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि बीते 15 वर्षों में गैस फ्लेरिंग की तीव्रता (प्रति बैरल तेल पर जलाई जाने वाली गैस) लगभग जस की तस बनी हुई है। 2000 के दशक की शुरुआत में इस दिशा में जो प्रगति दिख रही थी, वो भी अब ठहर सी गई है।
यह जानकारी वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी नई रिपोर्ट 'ग्लोबल गैस फ्लेरिंग ट्रैकर रिपोर्ट 2025' में सामने आई है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 'गैस फ्लेरिंग' का मतलब तेल और गैस उत्पादन के दौरान निकलने वाली प्राकृतिक गैस का उपयोग करने के बजाए जला देने से है। सरल शब्दों में कहें तो जब जमीन से तेल निकाला जाता है, तब उसके साथ-साथ प्राकृतिक गैस जैसे मीथेन भी निकलती है।
कई बार कंपनियों के पास इस गैस को स्टोर या इस्तेमाल करने की सुविधा नहीं होती, इसलिए वे उसे एक ऊंची चिमनी जैसी संरचना की मदद से जला देते हैं। यही प्रक्रिया गैस फ्लेरिंग कहलाती है। बता दें कि तेल उत्पादन के दौरान प्राकृतिक गैस को जलाया जाना एक आम बात है, लेकिन यह जलवायु परिवर्तन को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
जब अरबों को नहीं मिल रही ऊर्जा, तब गैस की बर्बादी चिंताजनक
गौरतलब है कि गैस फ्लेरिंग में बढ़ोतरी ऐसे समय में दर्ज की गई है जब दुनिया भर में ऊर्जा सुरक्षा खतरे में है। हालात यह हैं कि अभी भी 50 करोड़ से ज्यादा लोग विश्वसनीय ऊर्जा से वंचित हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो 2024 में जितनी गैस फ्लेरिंग के दौरान जितनी गैस बर्बाद हुई, वह करीब-करीब पूरे अफ्रीका की सालाना गैस खपत के बराबर है।
यह न केवल ऊर्जा की बर्बादी है साथ ही 2024 में गैस फ्लेरिंग की वजह से करीब 38.9 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी हुआ, जो जलवायु परिवर्तन के दृष्टिकोण से बेहद हानिकारक है। इसके साथ ही यह उत्सर्जन स्थानीय प्रदूषण में भी इजाफा कर रहा है, जो स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस उत्सर्जन में 4.6 करोड़ टन घातक मीथेन गैस भी शामिल है, जो तापमान में वृद्धि के लिहाज से सबसे खतरनाक गैसों में गिनी जाती है।
रिपोर्ट में गैस की इस बर्बादी की अनुमानित कीमत करीब 6,300 करोड़ डॉलर आंकी है, यह रकम इतनी है कि आईईए के 'नेट जीरो 2050' लक्ष्य को पाने के लिए जरूरी निवेश का आधे से ज्यादा हिस्सा कवर कर सकती है।
कुछ जिम्मेदार, कुछ लापरवाह
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 2024 में दर्ज कुल गैस फ्लेरिंग के करीब 76 फीसदी के लिए महज नौ देश जिम्मेवार थे, जिनमें रूस, ईरान, इराक, अमेरिका, वेनेजुएला, अल्जीरिया, लीबिया, मैक्सिको और नाइजीरिया शामिल हैं। 2012 में इन देशों की गैस फ्लेरिंग में जो हिस्सेदारी 65 फीसदी थी, वो अब बढ़कर 76 फीसदी पर पहुंच गई है।
इनमें भी रूस, ईरान और इराक की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है, जो कुल मिलाकर अब 46 फीसदी फ्लेरिंग के लिए जिम्मेवार हैं। रूस और ईरान में फ्लेरिंग लगातार बढ़ी है, जबकि इराक में 2016 से स्थिति लगभग जस की तस है। वहीं अमेरिका और नाइजीरिया ने कुछ सुधार दिखाया है, जबकि वेनेजुएला, अल्जीरिया, लीबिया और मैक्सिको में फ्लेरिंग मामूली बढ़ी है।
सभी प्रमुख फ्लेरिंग देशों में 2012 के मुकाबले इसकी तीव्रता बढ़ी है, वहीं अमेरिका और इराक में इसमें गिरावट दर्ज की गई। अमेरिका ने अपनी फ्लेरिंग तीव्रता में करीब 50 फीसदी की कमी की है, जो अब दुनिया में सबसे कम में गिनी जाती है। वहीं दूसरी ओर, अंगोला, मिस्र, इंडोनेशिया और कजाकिस्तान जैसे कुछ देशों ने न सिर्फ अपनी फ्लेरिंग कम की है, बल्कि तीव्रता में भी गिरावट हासिल की है।
रिपोर्ट बताती है कि कुछ देशों ने इस दिशा में बेहतर काम किया है। 'जीरो रूटीन फ्लेरिंग बाय 2030' (जेडआरएफ) पहल से जुड़े देशों ने 2012 से अब तक गैस जलाने की तीव्रता में औसतन 12 फीसदी की कमी की है, जबकि जो देश इससे नहीं जुड़े हैं वहां फ्लेरिंग में 25 फीसदी की वृद्धि देखी गई है।
उदाहरण के लिए इस पहल से जुड़े ब्राजील, कोलंबिया, मिस्र, इंडोनेशिया और कजाकिस्तान जैसे देश 2012 के मुकाबले 30 फीसदी कम फ्लेरिंग कर रहे हैं।
देखा जाए तो ऐसे समय में जब दुनिया ऊर्जा संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी दोहरी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब गैस फ्लेरिंग जैसी बर्बादी न केवल संसाधनों का नुकसान है, बल्कि यह एक बड़ी नैतिक और नीतिगत विफलता भी है। हालांकि इस समस्या का समाधान संभव है नीति, निवेश और तकनीक के सही इस्तेमाल से यह बर्बाद होती गैस प्रदूषण की जगह रोजगार और विकास का इंजन बना सकती हैं।