वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि लंबे समय से बढ़ता वैश्विक तापमान इन चरम मौसमी घटनाओं को और पहले से कहीं ज्यादा घातक बना रहा है। फोटो: आईस्टॉक 
जलवायु

लू, बाढ़, बारिश, तूफान, बर्फबारी: जनवरी 2026 में दुनिया ने देखा जलवायु संकट का ट्रेलर

ऑस्ट्रेलिया से अफ्रीका तक, अमेरिका से यूरोप तक, चरम मौसम ने साफ कर दिया कि जलवायु परिवर्तन अब महज कागजी आंकड़े नहीं है, बल्कि यह रोजमर्रा की कड़वी सच्चाई बन चुका है

Lalit Maurya

  • जनवरी 2026 ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि जलवायु परिवर्तन अब महज वैज्ञानिक चेतावनी नहीं, बल्कि आम जीवन के लिए आपदा बन चुका है। साल के पहले महीने में ही दुनिया के हर हिस्से में चरम मौसमी घटनाओं ने जनजीवन को झकझोर दिया।

  • ऑस्ट्रेलिया में लू, दक्षिण अमेरिका में आग, अमेरिका-कनाडा में ठंड और अफ्रीका में बाढ़ ने जनजीवन को प्रभावित किया।

  • डब्ल्यूएमओ पहले ही 2026 के अब तक के तीन सबसे गर्म वर्षों में शामिल होने का अनुमान जाता चुका है, जो बढ़ती चरम मौसमी घटनाओं की बड़ी वजह है।

  • वैज्ञानिकों ने भी पुष्टि की है कि लंबे समय से बढ़ता वैश्विक तापमान इन चरम मौसमी घटनाओं को और पहले से कहीं ज्यादा घातक बना रहा है।

  • ‘वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन से जुड़े वैज्ञानिकों के मुताबिक, जनवरी की शुरुआत में आई लू को जलवायु परिवर्तन ने औसतन 1.6 डिग्री सेल्सियस तक अधिक गर्म बना दिया है।

जनवरी 2026 ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि जलवायु परिवर्तन अब महज वैज्ञानिक चेतावनी नहीं, बल्कि आम जीवन के लिए आपदा बन चुका है। साल के पहले महीने में ही दुनिया के हर हिस्से में चरम मौसमी घटनाओं ने जनजीवन को झकझोर दिया।

कहीं रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और जंगलों में धधकती आग के कहर बरपाया तो कहीं जानलेवा ठंड, बर्फबारी, मूसलाधार बारिश और बाढ़ हावी रहे। इस दौरान यह चरम घटनाएं लोगों को जीवन के हर मोर्चे पर चुनौती देती रही। मतलब की जनवरी ने ही यह दर्शा दिया कि आने वाला समय कैसा होने वाला है।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के अनुसार, राष्ट्रीय मौसम और जल विज्ञान सेवाएं इस संकट की पहली पंक्ति में रहीं। देखा जाए तो बढ़ते तापमान ने मौसम को कहीं ज्यादा अनिश्चित और पहले से कहीं अधिक खतरनाक बना दिया है।

धरती का बढ़ता तापमान, बढ़ती आपदाएं

गौरतलब है डब्ल्यूएमओ पहले ही 2026 के अब तक के तीन सबसे गर्म वर्षों में शामिल होने का अनुमान जाता चुका है, जो बढ़ती चरम मौसमी घटनाओं की बड़ी वजह है। वैज्ञानिकों ने भी पुष्टि की है कि लंबे समय से बढ़ता वैश्विक तापमान इन चरम मौसमी घटनाओं को और पहले से कहीं ज्यादा घातक बना रहा है।

डब्ल्यूएमओ ने जानकारी दी है जनवरी में ऑस्ट्रेलिया के बड़े हिस्से दो जानलेवा लू की चपेट में रहे। हालात इस कदर खराब हो गई कि दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के सेडुना शहर में 26 जनवरी को तापमान रिकॉर्ड 49.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया।

गर्मी से बेहाल ऑस्ट्रेलिया-दक्षिण अमेरिका

वहीं दक्षिण ऑस्ट्रेलिया, उत्तर-पश्चिम विक्टोरिया, न्यू साउथ वेल्स के अंदरूनी इलाकों और दक्षिण-पश्चिम क्वींसलैंड में कई जगह पारा 45 डिग्री से ऊपर चला गया। हालात की गंभीरता को देखते हुए ऑस्ट्रेलियाई प्रशासन को लू की चेतावनी जारी करनी पड़ी।

तेज हवाओं और भीषण गर्मी के मेल ने आग के खतरे को बेहद बढ़ा दिया। ‘वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन से जुड़े वैज्ञानिकों के मुताबिक, जनवरी की शुरुआत में आई लू को जलवायु परिवर्तन ने औसतन 1.6 डिग्री सेल्सियस तक अधिक गर्म बना दिया है।

दक्षिण अमेरिका भी इससे अछूता नहीं रहा। चिली और अर्जेंटीना के जंगलों में लगी भीषण आग ने दर्जनों लोगों की जान ले ली और हजारों को घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

इस दौरान चिली में बायोबियो और न्युब्ले क्षेत्रों के जंगलों में लगी भीषण आग ने भारी तबाही मचाई। आगजनी की इन घटनाओं के कारण हजारों लोगों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा, सैकड़ों इमारतें जलकर खाक हो गईं और कम से कम 21 लोगों की मौत हो गई। भीषण गर्मी और तेज हवाओं के बीच 75 अलग-अलग जगहों पर आग फैलने के बाद सरकार ने आपात स्थिति की घोषणा कर दी।

दक्षिणी अर्जेंटीना में भी हालात बेहद गंभीर रहे। बढ़ते तापमान, लंबे समय से जारी सूखे और तेज हवाओं ने पाटागोनिया क्षेत्र में विनाशकारी आग को भड़का दिया, जिससे बड़े पैमाने पर प्राकृतिक और मानवीय नुकसान हुआ।

आईपीसीसी की छठी आकलन रिपोर्ट भी साफ तौर पर कहती है कि इंसानों द्वारा प्रेरित जलवायु परिवर्तन ने 1950 के बाद से लू (हीटवेव) की आवृत्ति और तीव्रता दोनों को बढ़ा दिया है। वैज्ञानिकों का अंदेशा है कि आने वाले समय में हालात और बिगड़ सकते हैं।

अमेरिका-कनाडा में हाड गला देने वाली ठंड

आईपीसीसी के मुताबिक, 1950 के बाद से वैश्विक स्तर पर भारी ठंड की घटनाओं की संख्या और तीव्रता में कमी आई है और औसत रूप से सर्दियां लगातार गर्म हो रही हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि चरम मौसम का दौर खत्म हो गया है।

जनवरी में क्षेत्रीय स्तर पर उत्तरी गोलार्ध में अचानक लौटी भीषण ठंड ने तबाही मचाई। कमजोर पड़ते ध्रुवीय भंवर (पोलर वॉर्टेक्स) के कारण आर्कटिक की ठंडी हवाएं उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया तक पसर गई।

दरअसल पोलर वॉर्टेक्स ठंडी और तेज हवाओं की एक विशाल परत होती है, जो आमतौर पर उत्तरी ध्रुव के आसपास बनी रहती है। जब यह कमजोर पड़ता है, तो आर्कटिक की ठंडी हवा दक्षिण की ओर फैल जाती है और अपेक्षाकृत गर्म हवा आर्कटिक की ओर खिंच जाती है।

अमेरिका और कनाडा में ठन्डे विनाशकारी तूफानों ने बिजली आपूर्ति ठप कर दी। इसकी वजह से न केवल उड़ानें रद्द करनी पड़ी बल्कि कई लोगों को अपनी जान से हाथ भी धोना पड़ा। आशंका है कि फरवरी के बाद के दिनों में उत्तर अमेरिका और उत्तरी यूरोप में एक बार फिर भीषण ठंड का खतरा बढ़ सकता है।

अमेरिकी राष्ट्रीय मौसम सेवा (एनडब्ल्यूएस) ने चेतावनी दी कि 31 जनवरी तक आर्कटिक की बेहद ठंडी हवा मैदानी इलाकों, ग्रेट लेक्स क्षेत्र और देश के दक्षिण-पूर्वी व पूर्वी हिस्सों तक फैल सकती है। मौसम विभाग के अनुसार, “यह ठंड पिछले कई दशकों में सबसे लंबी ठंड साबित हो सकती है।“

इस दौरान रूस के कामचटका प्रायद्वीप में भी हालात बेहद असामान्य रहे। जनवरी के पहले दो हफ्तों में यहां दो मीटर से ज्यादा बर्फ गिरी, जबकि दिसंबर में ही 3.7 मीटर बर्फबारी हो चुकी थी। इससे जनजीवन ठप्प सा हो गया।

अफ्रीका में मूसलाधार बारिश और बाढ़

दक्षिण-पूर्वी अफ्रीका में हफ्तों की भारी बारिश ने नदियों को उफान पर ला दिया। मोजाम्बिक में बाढ़ से 650,000 से अधिक लोग प्रभावित हुए और हजारों घर तबाह हो गए। फसलें नष्ट हुईं और बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ गया। हालांकि, चल रहे खोज और बचाव अभियानों के कारण यह संख्या बढ़ने की आशंका है। सबसे अधिक प्रभावित शहरों में राजधानी मापुटो भी शामिल है। 

दक्षिण अफ्रीका ने 18 जनवरी को मूसलाधार बारिश और भीषण बाढ़ के कारण राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दी। देश के उत्तरी हिस्सों में आई इस बाढ़ में कम से कम 30 लोगों की मौत हो गई, जबकि कई घर, सड़कें और पुल बह गए। यह इलाका मोजाम्बिक की सीमा से सटा हुआ है, जहां पहले से ही बाढ़ ने भारी तबाही मचा रखी है।

इसी तरह यूरोप, इंडोनेशिया और न्यूजीलैंड में भी तूफानों, बाढ़ और भूस्खलन ने जान-माल को भारी नुकसान पहुंचाया।

इसी तरह 24 जनवरी को इंडोनेशिया के पश्चिमी जावा में हुए भूस्खलन में 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई। यह हादसा मूसलाधार बारिश के बाद हुआ, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इसकी वजह सिर्फ बारिश नहीं थी। इलाके की भू-वैज्ञानिक बनावट, तीखी ढलानें, मिट्टी की कमजोर स्थिरता और असंतुलित भूमि उपयोग जैसी समस्याओं ने इस त्रासदी को और गंभीर बना दिया।

क्या यूरोप जैसे क्षेत्र भी हैं तैयार

यूरोप के बड़े हिस्सों में लगातार एक के बाद एक शक्तिशाली तूफान आए। भारी बारिश, तेज हवाओं और ऊंची समुद्री लहरों के कारण कई देशों में यात्रा बाधित हुई और बाढ़ जैसे हालात बने। पश्चिम में आयरलैंड और यूनाइटेड किंगडम से लेकर पुर्तगाल, स्पेन और पूरे भूमध्यसागरीय क्षेत्र तक इसका असर देखने को मिला।

हालात की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मौसम और जल विज्ञान सेवाओं को कई चेतावनियां जारी करनी पड़ी।

27 जनवरी को जारी जलवायु चेतावनी में कहा गया कि अगले दो हफ्तों में ग्रीनलैंड, उत्तर-पश्चिमी और पश्चिमी यूरोप तथा भूमध्यसागरीय क्षेत्र के कई हिस्सों में औसत से अधिक बारिश हो सकती है। अनुमान के मुताबिक, साप्ताहिक वर्षा 25 से 100 मिलीमीटर तक रह सकती है, जबकि कुछ संवेदनशील इलाकों में यह 100 मिलीमीटर से भी ज्यादा हो सकती है।

एजेंसी ने यह भी चेताया कि आने वाले हफ्तों में आर्कटिक की ठंडी हवा एक बार फिर फैल सकती है, खासकर उत्तरी और उत्तर-पूर्वी यूरोप में। इससे प्रभावित क्षेत्रों में नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, उत्तरी यूरोपीय रूस, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया और बेलारूस के उत्तरी हिस्से शामिल हैं।

क्या शुरू हो चुका है चरम मौसम का युग

वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और ला नीना के मेल से यहां ‘परफेक्ट स्टॉर्म’ जैसी स्थिति बनी। चिंता की बात है कि औद्योगिक काल से पहले की तुलना में भारी बारिश की तीव्रता 40 फीसदी तक बढ़ चुकी है।

इस वैश्विक संकट के बीच एक बात तो पूरी तरह साफ है, इन चरम मौसमी घटनाओं को पूरी तरह नहीं रोका जा सकता, लेकिन उसके असर को कम किया जा सकता है। डब्ल्यूएमओ का कहना है कि जिन देशों में प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली है, वहां आपदाओं से होने वाली मौतें छह गुणा तक कम होती हैं।

इसी वजह से दुनिया भर में ‘अर्ली वॉर्निंग फॉर ऑल’ पहल को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। इसके तहत मौसम, पानी और जलवायु से जुड़े खतरों की समय पर भरोसेमंद जानकारी लोगों तक पहुंचाई जा रही है। ‘कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल’ जैसे सिस्टम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि चेतावनियां सभी माध्यमों और सभी लोगों तक एक साथ पहुंचें।

डब्ल्यूएमओ की महासचिव सेलेस्टे साउलो का कहना है, “यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि चरम मौसम विश्व आर्थिक मंच की ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट में लगातार शीर्ष खतरों में शामिल है। मौसम और जलवायु से जुड़ी आपदाओं से प्रभावित लोगों की संख्या हर साल बढ़ रही है और जनवरी में इसके भयावह मानवीय असर रोज देखने को मिले।“

सटीक पूर्वानुमान, समय पर चेतावनी और मजबूत तैयारी है रक्षा कवच

उन्होंने कहा कि यही वजह है कि ‘अर्ली वॉर्निंग फॉर ऑल’ पहल को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है, क्योंकि जिन देशों में प्रभावी चेतावनी प्रणाली है, वहां आपदा से होने वाली मौतें छह गुणा तक कम होती हैं।

साथ ही डब्ल्यूएमओ भीषण गर्मी से निपटने के लिए नया ढांचा और टूलकिट भी तैयार कर रहा है, ताकि देश भीषण गर्मी और लू से जुड़े स्वास्थ्य और आपदा जोखिमों को बेहतर तरीके से संभाल सकें।

जंगलों में लगने वाली आग के लिए भी वैश्विक स्तर पर एक मजबूत चेतावनी और सलाह प्रणाली विकसित की जा रही है। मोजाम्बिक और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों ने दिखाया है कि राष्ट्रीय विकास योजनाओं में मल्टी-हैजर्ड वार्निंग सिस्टम को शामिल कर कैसे जान और संपत्ति बचाई जा सकती है।

जनवरी 2026 में सामने आई चरम घटनाओं ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में सटीक पूर्वानुमान, समय पर चेतावनी और मजबूत तैयारी ही इनसे बचने का सबसे बड़ा समाधान है। अब सवाल यह नहीं है कि चरम मौसम आएगा या नहीं, बल्कि यह है कि हम उसका सामना करने के लिए कितने तैयार हैं।