प्रशांत महासागर में पिघलते हिमखंड अटलांटिक की एएमओसी धारा को कमजोर कर सकते हैं, वैज्ञानिकों ने जलवायु बदलाव का नया संबंध खोजा। प्रतीकात्मक छवि, साभार: आईस्टॉक
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जलवायु संकट: प्रशांत महासागर में पिघलती बर्फ अटलांटिक की बड़ी समुद्री धारा पर डाल रही है असर

दूर प्रशांत की पिघलती बर्फ से अटलांटिक की ताकतवर समुद्री धारा पर संकट, वैज्ञानिकों ने जलवायु बदलाव के नए कारण का लगाया पता

Dayanidhi

  • प्रशांत महासागर में पिघलते हिमखंड अटलांटिक की एएमओसी धारा को कमजोर कर सकते हैं, वैज्ञानिकों ने जलवायु बदलाव का नया संबंध खोजा।

  • 19 हजार साल पुराने जलवायु रिकॉर्ड से खुलासा, उत्तर-पूर्वी प्रशांत का मीठा पानी वैश्विक तापमान बदलावों को प्रभावित कर सकता है।

  • एएमओसी समुद्र की विशाल कन्वेयर बेल्ट जैसी प्रणाली है, जो धरती पर गर्मी और ऊर्जा का संतुलन बनाए रखती है।

  • शोध में पता चला कि उत्तर अटलांटिक नहीं, बल्कि प्रशांत क्षेत्र की बर्फ पिघलने की घटनाएं एएमओसी कमजोरी का कारण बनीं।

  • वैज्ञानिकों की चेतावनी, एएमओसी कमजोर होने से बारिश, तापमान और वैश्विक जलवायु व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ने की संभावना बढ़ सकती है।

समुद्र में होने वाले बदलावों को लेकर वैज्ञानिकों ने एक अहम जानकारी सामने रखी है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, डेविस के शोधकर्ताओं के अनुसार, उत्तर-पूर्वी प्रशांत महासागर में पिघलने और टूटने वाले हिमखंड अटलांटिक महासागर की एक बड़ी समुद्री धारा को कमजोर कर सकते हैं। यह खोज जलवायु परिवर्तन को समझने में नई दिशा दे सकती है।

यह अध्ययन वैज्ञानिक पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं ने बताया कि समुद्र की एक प्रमुख प्रणाली, जिसे अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन यानी एएमओसी कहा जाता है, पूरी धरती के मौसम और जलवायु को प्रभावित करती है।

एएमओसी क्या है और क्यों है महत्वपूर्ण

एएमओसी को समुद्र की एक विशाल कन्वेयर बेल्ट की तरह समझा जा सकता है। यह उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से गर्म और खारे पानी को उत्तर अटलांटिक महासागर तक पहुंचाती है। इसके कारण दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में गर्मी और ऊर्जा का वितरण होता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, एएमओसी भूमध्य रेखा के पार समुद्र द्वारा होने वाले लगभग 70 प्रतिशत गर्मी परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अगर यह प्रणाली कमजोर होती है, तो इसका असर दुनिया के मौसम, बारिश और तापमान पर पड़ सकता है।

पहले मानी जाती थी अलग वजह

पृथ्वी के पिछले हिमयुग के दौरान एएमओसी के कमजोर होने के लिए वैज्ञानिक मुख्य रूप से उत्तर अटलांटिक महासागर में पिघलने वाले हिमखंडों को जिम्मेदार मानते थे। इन घटनाओं को ‘हेनरिक स्टेडियल’ कहा जाता है। इन समयों में उत्तरी गोलार्ध में ठंड बढ़ी थी और अंटार्कटिका में गर्मी का प्रभाव देखा गया था।

लेकिन नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि उत्तर अटलांटिक में हिमखंडों के पिघलने की घटनाएं एएमओसी के कमजोर होने के बाद हुई थीं। इसका मतलब है कि ये घटनाएं एएमओसी को कमजोर करने का मुख्य कारण नहीं थीं।

प्रशांत महासागर से शुरू हो सकती है प्रक्रिया

शोधकर्ताओं ने करीब 19 हजार साल पहले हुई ‘हेनरिक स्टेडियल 1’ नामक घटना का कंप्यूटर मॉडल के जरिए अध्ययन किया। उन्होंने पुराने जलवायु आंकड़ों और सुपरकंप्यूटर की मदद से उस समय की परिस्थितियों को दोबारा बनाया।

अध्ययन में पाया गया कि उत्तर-पूर्वी प्रशांत महासागर से निकलने वाला मीठा पानी और हिमखंडों का पिघला पानी दुनिया के महासागरों में फैल सकता है। यह पानी उत्तर अटलांटिक के उन क्षेत्रों तक पहुंच सकता है जहां समुद्र की गहरी धाराएं बनती हैं।

यह मीठा पानी समुद्र के खारे पानी को पतला कर देता है, जिससे एएमओसी की ताकत कम हो सकती है। इसके बाद समुद्र के अंदर गर्म पानी बढ़ सकता है और इससे और अधिक बर्फ पिघलने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

अंटार्कटिका की बर्फ पर भी असर

वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्र के अंदर मौजूद गर्म पानी पश्चिमी अंटार्कटिका की बर्फ की चादर को नुकसान पहुंचा सकता है। इसी तरह की प्रक्रिया ने पिछले हिमयुग के अंत में भी बर्फ की चादरों के पीछे हटने में भूमिका निभाई थी। यह खोज बताती है कि समुद्र के किसी एक हिस्से में होने वाला बदलाव पूरी दुनिया की जलवायु व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

भविष्य में बढ़ सकती है चिंता

वैज्ञानिकों में यह सहमति है कि 21वीं सदी के अंत तक एएमओसी के कमजोर होने की संभावना है। कुछ शोधकर्ताओं ने इसके पूरी तरह बंद होने की आशंका भी जताई है।

पहले के अध्ययनों में पाया गया है कि एएमओसी के कमजोर होने से मध्य अमेरिका, अमेजन क्षेत्र और पश्चिमी अफ्रीका जैसे अधिक बारिश वाले इलाकों में वर्षा कम हो सकती है। कुछ क्षेत्रों में सालाना बारिश लगभग आधी तक घट सकती है।

नया अध्ययन यह संकेत देता है कि एएमओसी केवल उत्तर अटलांटिक में होने वाले बदलावों से प्रभावित नहीं होती, बल्कि दुनिया के किसी भी हिस्से से आने वाले मीठे पानी के बड़े प्रवाह का असर इस पर पड़ सकता है। यह खोज भविष्य के जलवायु बदलावों को समझने और उनके प्रभावों का अनुमान लगाने में वैज्ञानिकों की मदद करेगी।