दुनिया में तापमान 1.39 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा, मानवजनित गतिविधियों से तेजी से बढ़ती धरती की गर्मी पर वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी।
2030 तक 1.5 डिग्री सीमा पार होने की आशंका, पेरिस समझौते के जलवायु लक्ष्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
समुद्र स्तर 1901 से 23 सेंटीमीटर बढ़ा, समुद्री लू की घटनाएं और समुद्री जीवन पर प्रभाव तेजी से बढ़ा।
कार्बन उत्सर्जन रिकॉर्ड स्तर पर बना हुआ, ‘कार्बन बजट’ अगले तीन वर्षों में समाप्त होने की गंभीर आशंका जताई गई है।
उपग्रह और जलवायु निगरानी प्रणालियों की फंडिंग घट रही, भविष्य में जलवायु परिवर्तन ट्रैकिंग और पूर्वानुमान पर संकट गहरा सकता है।
दुनिया भर के प्रमुख वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ रहा है और इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन के संकेत भी लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में कहा गया है कि मानवजनित गतिविधियों के कारण होने वाली वैश्विक गर्मी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है। वैज्ञानिकों ने यह भी चिंता जताई है कि जलवायु परिवर्तन को मापने वाले महत्वपूर्ण निगरानी तंत्र और संसाधनों पर भी खतरा बढ़ रहा है।
यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के एक समूह द्वारा तैयार किया गया है, जिनमें संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पैनल से जुड़े विशेषज्ञ भी शामिल हैं। यह रिपोर्ट हर साल प्रकाशित होती है और जलवायु परिवर्तन की स्थिति पर ताजा जानकारी देती है। यह अध्ययन "अर्थ सिस्टम साइंस डेटा" नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
पृथ्वी का तापमान रिकॉर्ड स्तर के करीब
रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक युग से पहले की तुलना में लगभग 1.39 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका लगभग पूरा कारण मानवजनित गतिविधियां हैं, जैसे जीवाश्म ईंधन का उपयोग, उद्योगों से निकलने वाला प्रदूषण और जंगलों की कटाई।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो साल 2030 के आसपास वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर सकता है। यह वही सीमा है जिसे 2015 के पेरिस जलवायु समझौते में दुनिया के देशों ने सुरक्षित स्तर माना था। इस समझौते का उद्देश्य तापमान वृद्धि को नियंत्रित रखना है, जिसे संयुक्त राष्ट्र जलवायु संधि के तहत लागू किया गया है।
समुद्र और मौसम पर असर बढ़ा
वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रभाव समुद्रों और मौसम पर देखा जा रहा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि समुद्र का स्तर 1901 से अब तक लगभग 23 सेंटीमीटर बढ़ चुका है। इसके अलावा, समुद्रों का गर्म होना भी तेज हो गया है, जिससे समुद्री लू की घटनाएं बढ़ रही हैं।
अध्ययन में यह भी पाया गया है कि 1991 की तुलना में समुद्री लू के दिन तीन गुना से भी अधिक बढ़ गए हैं। इससे समुद्री जीवन, मछलियों की प्रजातियां और तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा पर गंभीर खतरा पैदा हो रहा है।
पृथ्वी की ऊर्जा असंतुलन बढ़ा
रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण बात यह भी बताई गई है कि पृथ्वी पर ऊर्जा का असंतुलन लगातार बढ़ रहा है। इसका मतलब है कि सूर्य से आने वाली ऊर्जा और पृथ्वी से वापस जाने वाली ऊर्जा के बीच संतुलन बिगड़ गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर मानव गतिविधियों का प्रभाव न होता तो यह संतुलन लगभग शून्य के आसपास रहता।
लेकिन 1970 के दशक से यह असंतुलन लगातार बढ़ रहा है और अब यह अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। इसके पीछे मुख्य कारण वातावरण में बढ़ती ग्रीनहाउस गैसें हैं, खासकर कार्बन डाइऑक्साइड।
कार्बन उत्सर्जन और ‘कार्बन बजट’ की स्थिति
वैज्ञानिकों का कहना है कि कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन अभी भी बहुत अधिक है और यह जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है। हालांकि कुछ देशों में उत्सर्जन की गति थोड़ी धीमी हुई है, लेकिन कुल मिलाकर यह अभी भी बढ़ रहा है।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि इसी तरह उत्सर्जन जारी रहा, तो 1.5 डिग्री की सीमा के भीतर रहने के लिए बचा हुआ “कार्बन बजट” अगले लगभग तीन वर्षों में समाप्त हो सकता है। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि इस सीमा को बनाए रखना अब बहुत कठिन होता जा रहा है।
जलवायु निगरानी प्रणालियों पर खतरा
अध्ययन में एक और गंभीर चिंता जताई गई है कि जलवायु परिवर्तन को ट्रैक करने वाली वैश्विक निगरानी प्रणालियों पर दबाव बढ़ रहा है। इन प्रणालियों में उपग्रह, समुद्री उपकरण, मौसम स्टेशन और अन्य वैज्ञानिक उपकरण शामिल हैं, जो पृथ्वी की स्थिति पर लगातार नजर रखते हैं।
वैज्ञानिकों ने बताया कि कई देशों में बजट कटौती और राजनीतिक कारणों से इन कार्यक्रमों पर असर पड़ रहा है। विशेष रूप से अमेरिका में कुछ समुद्री और उपग्रह आधारित परियोजनाओं में कमी की गई है। इससे भविष्य में जलवायु परिवर्तन की सही निगरानी करना मुश्किल हो सकता है।
वैश्विक मौसम और जलवायु सेवाओं को समन्वित करने वाली संस्था विश्व मौसम विज्ञान संगठन और अन्य वैज्ञानिक नेटवर्क भी इस दबाव से प्रभावित हो रहे हैं। वहीं जलवायु निगरानी प्रणाली ने भी चेतावनी दी है कि अगर डेटा संग्रह कमजोर हुआ तो जलवायु मॉडलिंग और पूर्वानुमान पर असर पड़ेगा।
बढ़ता संकट और बढ़ती जिम्मेदारी
वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनिया तेजी से एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है जहां जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और अधिक स्पष्ट और खतरनाक होंगे। समुद्र स्तर बढ़ना, अत्यधिक गर्मी, और मौसम की अनिश्चितता आने वाले वर्षों में और तेज हो सकती है।
साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि जलवायु निगरानी प्रणाली कमजोर हुई तो समस्या की सही पहचान और समाधान और कठिन हो जाएगा। इसलिए वैज्ञानिकों ने देशों से अपील की है कि वे जलवायु के आंकड़ों और निगरानी नेटवर्क को मजबूत करें और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को तेजी से कम करने के कदम उठाएं।