2050 तक वर्तमान कोको क्षेत्रों का लगभग 20 फीसदी जलवायु बदलाव के कारण फसल के उगने योग्य नहीं रहेगा। फोटो साभार: आईस्टॉक
जलवायु

साल 2050 तक कोलंबिया में कोको की जमीन के पांचवें हिस्से के गायब होने के आसार

कोलंबिया में कोको की खेती पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: 2050 तक कुछ क्षेत्रों में नुकसान, ऊंचाई वाले इलाके बन सकते हैं सुरक्षित और जंगली कोको अहम समाधान

Dayanidhi

  • क्षेत्रीय नुकसान: 2050 तक वर्तमान कोको क्षेत्रों का लगभग 20 फीसदी जलवायु बदलाव के कारण फसल के उगने योग्य नहीं रहेगा।

  • कैरेबियाई और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में एटलांटिको, बोलिवर, सेसर, कॉर्डोबा, सुक्रे, एंटिओकिया, अराउका, कसनारे, मेटा, और विचाडा मुख्य रूप से प्रभावित होंगे।

  • अध्ययन में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में लगभग तीन फीसदी नए उपयुक्त क्षेत्र का विस्तार देखा गया, जिससे कोको की भूगोलिक स्थानांतरण संभावना बढ़ी।

  • जंगली कोको अत्यधिक जलवायु परिस्थितियों में जीवित रहता है और भविष्य में लचीले किस्मों के विकास में अहम भूमिका निभा सकता है।

  • एग्रोफॉरेस्ट्री, सिंचाई, उत्पादन विविधीकरण और लचीले आनुवंशिक स्रोत को अपनाकर किसानों को जलवायु परिवर्तन से सुरक्षा मिल सकती है।

कोलंबिया में कोको की खेती भविष्य में जलवायु परिवर्तन की वजह से बड़े बदलावों का सामना कर सकती है। हाल ही में किए गए एक अध्ययन में पता चला है कि 2050 तक वर्तमान में कोको के लिए उपयुक्त क्षेत्रों में से लगभग 20 फीसदी इलाका जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल नहीं रह पाएंगे। विशेष रूप से यह कैरेबियाई क्षेत्र के निचले इलाकों और देश के उत्तर-पूर्वी विभागों में होगा।

खतरे में आने वाले क्षेत्र

रीजनल एनवायरमेंटल चेंज नामक पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, सबसे ज्यादा नुकसान निचले क्षेत्रों में होने के आसार हैं। इन क्षेत्रों में शामिल कैरेबियाई क्षेत्र: एटलांटिको, बोलिवर, सेसर, कॉर्डोबा, सुक्रे, और एंटिओकिया, जबकि उत्तर-पूर्वी विभाग: अराउका, कसनारे, मेता, और विचाडा शामिल हैं।

जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान बढ़ेगा और अनियमित बारिश या अधिक तीव्र होगी। इससे उपज कम हो सकती है, फसल पर तनाव बढ़ सकता है और कोको किसान परिवारों के लिए आर्थिक अस्थिरता बढ़ सकती है।

शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि हाल की घटनाएं, जैसे उत्तर कोलंबिया में हुई ठंडी लहर और बाढ़, दिखाती हैं कि जलवायु परिवर्तन और जलवायु अस्थिरता पहले से ही वास्तविक प्रभाव डाल रही है।

सहायक क्षेत्र और संभावित विस्तार

अध्ययन से यह भी पता चला है कि सभी क्षेत्रों में नुकसान समान नहीं होगा। आंधीज की तलहटी - जहां वर्तमान में अधिकांश कोको उत्पादन होता है, इनमें जलवायु अनुकूल बनी रहेगी।

इसके अलावा अध्ययन में लगभग तीन फीसदी नए उपयुक्त क्षेत्र की संभावना बताई गई है। ये मुख्य रूप से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में होंगे, जो संकेत देते हैं कि कोको की खेती भविष्य में भूगोलिक रूप से स्थानांतरित हो सकती है। इसका मतलब है कि कोलंबिया में कोको खत्म नहीं होगा, बल्कि धीरे-धीरे नए क्षेत्रों में फैलेगा।

जंगली कोको: अनुकूलन के लिए महत्वपूर्ण

अध्ययन में यह पाया गया कि जंगली कोको नई परिस्थितियों में फैल सकता है। जंगली कोको की विशेषता यह है कि यह अत्यधिक जलवायु परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है।

टॉबियास फ्रेमाउट, एलायंस ऑफ बायोवर्सिटी इंटरनेशनल और सीआईएटी के शोधकर्ता, ने कहा, जंगली कोको में ऐसे आनुवंशिक गुण होते हैं जो इसे भविष्य में जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक लचीला बनाते हैं। जो पौधे बहुत गर्म, बहुत सूखे या बहुत गीले क्षेत्रों में बढ़ते हैं, वे विशेष रूप से हमारे लिए मूल्यवान हैं।

इसलिए देशी निचले इलाकों के जंगलों का संरक्षण करना बहुत जरूरी है, क्योंकि ये आनुवंशिक विविधता का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

क्या हैं अनुकूलन के उपाय?

अध्ययन के अनुसार, कोको किसानों को कुछ अनुकूलन रणनीतियों को अपनाना चाहिए -

एग्रोफॉरेस्ट्री सिस्टम - कोको के पेड़ों को अन्य पेड़ों की छाया में उगाना, जिससे तापमान संतुलित रहता है और मिट्टी की नमी बनी रहती है।

  • पूरक सिंचाई - उन क्षेत्रों में जहां सूखा अधिक होता है, सिंचाई उत्पादन को स्थिर रख सकती है।

  • लचीले आनुवंशिक स्रोत - जंगली कोको की विशेषताओं वाला अधिक लचीला कोको विकसित करना।

उत्पादन विविधीकरण - अन्य फसलें उगाकर आर्थिक जोखिम कम करना।

  • विज्ञान आधारित योजना - मौसम और जलवायु के आंकड़ों का उपयोग करके किसानों को सही निर्णय लेने में मदद करना।

इन उपायों को लागू करके, कोलंबिया के कोको किसान जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम कर सकते हैं और उत्पादन को स्थायी बना सकते हैं।

नीति और संस्थागत सहयोग

इस अध्ययन के आधार पर, नीति निर्माता और संस्थान जैसे मिनिस्टेरियो डे एग्रीकल्चर, यूपीआरए, फेडेकाओ, एग्रोसाविया बायोवर्सिटी इंटरनेशनल और सीआईएटी का गठबंधन किसानों की मदद करने के लिए रणनीतियां विकसित कर सकते हैं।

कोकोडाइवर्सिटी.ऑर्ग जैसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से किसानों को यह जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी कि किस क्षेत्र में किस प्रकार की खेती और अनुकूलन उपाय सबसे प्रभावी होंगे।

कोलंबिया में कोको की खेती 2050 तक खत्म नहीं होगी, लेकिन भूगोलिक रूप से स्थानांतरित होगी। जंगली कोको और उपयुक्त अनुकूलन रणनीतियां इसे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से सुरक्षित रखने में मदद करेंगी। किसानों और नीति निर्माताओं को सही निर्णय लेने और लचीली खेती को अपनाने पर ध्यान देना होगा।

इस प्रकार, वैज्ञानिक अध्ययन और रणनीतिक योजना के माध्यम से कोको की खेती को भविष्य में भी सुरक्षित और स्थायी रखा जा सकता है।