फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) 
वायु

हवा में तैरते अदृश्य कण हर साल ले रहे 20 लाख जानें, वैज्ञानिकों ने पीएम2.5 से भी ज्यादा बताया खतरनाक

रिसर्च से पता चला है कि ये अल्ट्राफाइन कण आकार में इतने सूक्ष्म होते हैं कि ये फेफड़ों की प्राकृतिक सुरक्षा को पार कर सीधे रक्त में पहुंच सकते हैं।

Lalit Maurya

  • हवा में मौजूद ऐसे अदृश्य अल्ट्राफाइन कण, जिन्हें न आंखें देख सकती हैं और न ही शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा आसानी से रोक पाती है, हर साल दुनिया भर में करीब 20 लाख लोगों की असमय मौत का कारण बन रहे हैं।

  • जर्नल कार्डियोवैस्कुलर रिसर्च में प्रकाशित इस नई स्टडी के अनुसार, ये कण पीएम2.5 से भी अधिक खतरनाक हैं क्योंकि इनका आकार 100 नैनोमीटर से भी कम होता है। ये फेफड़ों की सुरक्षा परत को पार कर सीधे रक्त और मस्तिष्क तक पहुंच जाते हैं, जिससे हार्ट अटैक, स्ट्रोक, उच्च रक्तचाप और अन्य गंभीर हृदय-रक्तवाहिका रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

  • रिसर्च में पहली बार उपग्रह आंकड़ों, मशीन लर्निंग और वैश्विक मापों के आधार पर इन कणों का विस्तृत मानचित्र तैयार किया गया, जिससे पता चला कि करीब 91 फीसदी अतिरिक्त मौतें शहरों और उनके आसपास के इलाकों में होती हैं।

  • वैज्ञानिकों के मुताबिक इन कणों का सबसे बड़ा स्रोत वाहन, उद्योग और जीवाश्म ईंधन का दहन है। अध्ययन चेतावनी देता है कि यदि इन अल्ट्राफाइन कणों की नियमित निगरानी शुरू कर कानूनी मानक तय किए जाएं और इनके उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जाए, तो हर साल लगभग 45 फीसदी असमय मौतों को रोका जा सकता है। अब वायु प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई केवल पीएम2.5 तक सीमित नहीं रह सकती।

क्या आप जानते हैं कि हवा में कुछ ऐसे बारीक कण मौजूद होते हैं, जो आंखों से नहीं दिखते, सांसों की कोई रुकावट जिन्हें रोक नहीं पाती, और वे सीधे इंसान के दिल और दिमाग पर हमला कर देते हैं। इस बारे में किए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि हवा में तैर रहे ऐसे अदृश्य और बेहद महीन कण हर साल दुनिया भर में करीब 20 लाख लोगों की मौत की वजह बन रहे हैं।

चिंता की बात है कि यह आंकड़ा स्ट्रोक और ह्रदय संबंधी बीमारियों जैसे असंक्रामक रोगों से होने वाली कुल मौतों का करीब 5 फीसदी है।

अध्ययन के मुताबिक पीएम10 और पीएम2.5 जैसे प्रदूषकों के लिए तो दुनिया भर में निगरानी व्यवस्था और सख्त मानक मौजूद हैं, लेकिन इंसानी बाल से भी करीब 1,000 गुना (100 नैनोमीटर) छोटे ये अल्ट्राफाइन पार्टिकल्स अब भी नियमों की पकड़ से बाहर हैं। यही वजह है कि इन्हें 'अदृश्य जहर' कहा जा रहा है।

यह स्टडी मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर केमिस्ट्री और साइप्रस इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में की गई है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल कार्डियोवैस्कुलर रिसर्च में प्रकाशित हुए हैं।

पीएम2.5 से भी ज्यादा खतरनाक क्यों हैं अल्ट्राफाइन कण?

रिसर्च से पता चला है कि ये अल्ट्राफाइन कण आकार में इतने सूक्ष्म होते हैं कि ये फेफड़ों की प्राकृतिक सुरक्षा को पार कर सीधे रक्त में पहुंच सकते हैं। इतना ही नहीं, नाक के रास्ते ये कण सीधे मस्तिष्क तक पहुंच सकते हैं और फेफड़ों की दीवारों को भेदकर रक्त में घुल जाते हैं।

इसके बाद ये पूरे शरीर में फैलकर सूजन, रक्त वाहिकाओं को नुकसान और अंगों की कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं।

शरीर में प्रवेश करने के बाद ये ऑक्सीडेटिव तनाव, रक्त वाहिकाओं को नुकसान और सूजन पैदा करते हैं, जिससे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, धमनियों में रुकावट (एथेरोस्क्लेरोसिस), हार्ट अटैक, हार्ट फेलियर और स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि इन कणों से जुड़ी करीब आधी मौतें दिल का दौरा, स्ट्रोक और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी बीमारियों के कारण होती हैं। यानी यह अदृश्य प्रदूषण शरीर के सबसे अहम अंगों पर सीधे हमला करता है और बिना किसी चेतावनी के जानलेवा साबित हो सकता है।

पहली बार तैयार हुआ प्रदूषण का विस्तृत नक्शा

अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने 2010 से 2019 के बीच उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों, भूमि उपयोग सम्बन्धी जानकारी, दुनिया के 155 स्थानों से जुटाए गए माप और मशीन लर्निंग तकनीक का उपयोग कर एक किलोमीटर रिजॉल्यूशन वाला वैश्विक मानचित्र तैयार किया है।

इससे पहली बार यह पता लगाया जा सका कि दुनिया के किन इलाकों में लोग अल्ट्राफाइन कणों के सबसे अधिक संपर्क में हैं।

स्टडी के अनुसार, दुनिया भर में करीब 91 फीसदी अतिरिक्त मौतें शहरों और आसपास के इलाकों में होती हैं, जबकि 78 फीसदी मौतें घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में दर्ज की गईं। यानी शहरों में रहने वाले लोग इस अदृश्य खतरे के सबसे बड़े शिकार हैं।

शहरों में सबसे ज्यादा मंडरा रहा है यह अदृश्य खतरा

अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता और कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर थॉमस मुंजेल का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है कि अल्ट्राफाइन कण शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा को पार कर सीधे खून और यहां तक कि मस्तिष्क तक पहुंच जाते हैं। इससे रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त होती हैं और हार्ट अटैक व स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।"

उनके अनुसार, स्वच्छ हवा सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि दिल की सेहत का भी सवाल है।

वाहन, उद्योग और जीवाश्म ईंधन हैं सबसे बड़े स्रोत

विश्लेषण के अनुसार, प्रदूषित इलाकों में पाए जाने वाले अल्ट्राफाइन कणों का अधिकांश हिस्सा ब्लैक कार्बन और ऑर्गेनिक कार्बन से बना होता है। ये मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन, वाहन, उद्योग और अन्य दहन प्रक्रियाओं से निकलते हैं।

दुनिया भर में इन कणों के संपर्क का करीब 75 फीसदी हिस्सा जीवाश्म ईंधन के जलने से जुड़ा है। वहीं, अमीर देशों में यह आंकड़ा 90 फीसदी से भी अधिक है, जबकि कमजोर देशों में जीवाश्म ईंधन के साथ-साथ घरों में लकड़ी और अन्य ठोस ईंधन जलाने से भी बड़ी मात्रा में ऐसे कण पैदा होते हैं।

बता दें कि स्वास्थ्य पर इनके बढ़ते खतरे को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूरोपीय यूनियन ने इन अल्ट्राफाइन कणों को "उभरते हुए गंभीर प्रदूषकों" की श्रेणी में रखा है।

सख्त मानक बनें तो बच सकती हैं लाखों जिंदगियां

स्टडी में यह भी सामने आया है कि यदि हवा में इन अल्ट्राफाइन कणों की वार्षिक औसत मात्रा 5,000 कण प्रति घन सेंटीमीटर तक सीमित कर दी जाए, तो दुनिया भर में इनसे होने वाली असमय मौतों में करीब 45 फीसदी तक कमी लाई जा सकती है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि अब समय आ गया है कि अल्ट्राफाइन कणों की भी पीएम2.5 की तरह नियमित निगरानी और कानूनी सीमा तय की जाए। साथ ही, शहरों में यातायात, उद्योग और ऊर्जा क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन को तेजी से कम करने तथा साफ सुथरी गैर-जीवाश्म ऊर्जा को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। ऐसा करके लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है और आने वाली पीढ़ियों को अधिक सुरक्षित हवा मिल सकती है।

यह अध्ययन स्पष्ट संकेत देता है कि वायु प्रदूषण की लड़ाई अब केवल पीएम2.5 और पीएम10 तक सीमित नहीं रह सकती। हवा में मौजूद ये अदृश्य अल्ट्राफाइन कण भी करोड़ों लोगों की सेहत के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इनकी नियमित निगरानी शुरू की जाए, कानूनी मानक तय किए जाएं और यातायात, उद्योग व ऊर्जा क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन को तेजी से घटाया जाए, तो हर साल लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है। ऐसे में अब चुनौती सिर्फ इस खतरे को पहचानने की नहीं, बल्कि समय रहते उस पर प्रभावी कार्रवाई करने की है।

भारत में वायु गुणवत्ता से जुड़ी ताजा जानकारी आप डाउन टू अर्थ के एयर क्वालिटी ट्रैकर से प्राप्त कर सकते हैं।