रायपुर में करीब 40 सिटी बसें जनता के लिए चलती हैं जिनमें सीमित संख्या में लोग ही यात्रा करते हैं। फोटो : भागीरथ 
वायु

कारपूलिंग से लेकर वर्क फ्रॉम होम तक, सफर की छोटी आदतें रोक सकती हैं 53.8 करोड़ टन उत्सर्जन: रिपोर्ट

रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि रोजमर्रा में यात्रा से जुड़ी आदतें बदलकर भारत सहित जी20 देश 2050 तक हर साल 53.8 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन और 271.5 करोड़ टन तेल बचा सकते हैं।

Lalit Maurya

  • सिर्फ वाहन बदलने से नहीं, सफर की आदतें बदलने से भी जलवायु संकट पर बड़ा वार किया जा सकता है।

  • काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) की नई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत समेत जी20 देशों में कारपूलिंग, सार्वजनिक परिवहन और हाइब्रिड वर्क को बढ़ावा दिया जाए तो 2050 तक यात्री परिवहन से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में हर साल 53.8 करोड़ टन तक की कमी लाई जा सकती है।

  • यह आंकड़ा 2024 में दक्षिण अफ्रीका के पूरे साल के कुल कार्बन उत्सर्जन के करीब है।

  • रिपोर्ट के अनुसार, कारपूलिंग अकेले 41.1 करोड़ टन तक सालाना उत्सर्जन बचा सकती है, जबकि 2025 से 2050 के बीच इन व्यवहारिक बदलावों से करीब 271.5 करोड़ टन तेल की खपत भी रोकी जा सकती है। इस तेल बचत का आर्थिक मूल्य करीब 2.3 ट्रिलियन डॉलर आंका गया है।

  • हालांकि, उत्सर्जन बचत का सबसे बड़ा हिस्सा विकसित देशों और चीन से आने की संभावना है, क्योंकि वहां निजी वाहनों पर निर्भरता अधिक है। भारत के लिए चुनौती के साथ बड़ा अवसर भी है।

  • बेहतर और सस्ती बस सेवाएं, साझा परिवहन और लचीले कार्य मॉडल अपनाकर भारत बढ़ते शहरीकरण के बीच निजी वाहनों पर निर्भरता को रोक सकता है। रिपोर्ट का संदेश स्पष्ट है, जलवायु कार्रवाई सिर्फ तकनीक बदलने से नहीं, यात्रा का तरीका बदलने से भी तेज हो सकती है।

सुबह दफ्तर जाने की आपा-धापी, सड़कों पर रेंगती गाड़ियों की कतारें और हवा में घुलता काला धुंआ, यह सिर्फ एक शहर की नहीं, बल्कि भारत सहित दुनिया भर के जी20 देशों में रोजमर्रा की कहानी है। इस समस्या से निपटने के लिए दुनिया तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ रही है, लेकिन सिर्फ वाहन बदलना ही काफी नहीं है।

हम कैसे सफर करते हैं, कितनी बार निजी वाहन निकालते हैं और क्या हर यात्रा के लिए कार जरूरी है, इन सवालों के जवाब भी भविष्य में पर्यावरण की दिशा तय कर सकते हैं।

इस विषय पर काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) द्वारा जारी एक नई रिपोर्ट में सामने आया है कि, अगर जी20 देशों में लोग अधिक कारपूलिंग करें, बसों का इस्तेमाल बढ़ाएं और सप्ताह के कुछ दिन घर से काम करें, तो 2050 तक यात्री परिवहन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में हर साल 53.8 करोड़ टन तक की कमी लाई जा सकती है।

इस कमी का पैमाना इसी से समझा जा सकता है कि यह 2024 में दक्षिण अफ्रीका से पूरे साल हुए कुल कार्बन उत्सर्जन के करीब-करीब बराबर है।

सीईईडब्ल्यू की रिपोर्ट ‘अ ग्लोबल मिशन लाइफ: मिटिगेशन पोटेंशियल ऑफ बिहेवियरल चेंज इन पैसेंजर ट्रांसपोर्ट इन जी20 कंट्रीज’ भारत के मिशन लाइफ की सोच को वैश्विक स्तर पर परखती है। इसका संदेश सीधा है, जलवायु कार्रवाई केवल नई तकनीक अपनाने से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की आदतें बदलने से भी संभव है।

अकेली कारपूलिंग से ही उत्सर्जन में 20 फीसदी तक कमी

रिपोर्ट के अनुसार, इसमें कारपूलिंग सबसे प्रभावी उपाय साबित हो सकता है। 2050 तक इससे जी20 देशों के यात्री परिवहन उत्सर्जन में 41.1 करोड़ टन तक की सालाना कमी संभव है। इस बचत का करीब 92 फीसदी हिस्सा विकसित देशों और चीन से आने का अनुमान है।

इसका कारण भी साफ है। इन देशों में निजी कारों की संख्या और सफर की दूरी बहुत ज्यादा जबकि वाहनों में औसतन यात्रियों की संख्या कम होती है। यानी कई बार एक कार में सिर्फ एक व्यक्ति सफर करता है, जबकि उसी रास्ते पर कई अन्य लोग अलग-अलग कारों से जाते हैं।

सीईईडब्ल्यू के वरिष्ठ फेलो डॉक्टर वैभव चतुर्वेदी के मुताबिक, मिशन लाइफ ने जलवायु कार्रवाई को केवल उत्पादन बढ़ाने से आगे ले जाकर जिम्मेदार उपभोग से जोड़ा है। उनके अनुसार, यह अध्ययन दिखाता है कि सबसे बड़ी संभावित बचत उन्हीं अर्थव्यवस्थाओं में है, जहां परिवहन व्यवस्था निजी कारों पर सबसे ज्यादा निर्भर है।

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि अगर एक ही दिशा में जाने वाले लोग साथ सफर करें, बसों को प्राथमिकता दें या सप्ताह के कुछ दिन घर से काम करें, तो सड़कों पर वाहनों की संख्या घट सकती है और इसके साथ ईंधन की खपत तथा प्रदूषण भी कम हो सकता है।

चीन और विकसित देशों को सबसे ज्यादा फायदा

रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि व्यवहार में इन बदलावों से होने वाली कुल बचत का 80 से 88 फीसदी हिस्सा विकसित देशों और चीन से आएगा। अकेले अमेरिका और यूरोपियन यूनियन के 15 देश मिलकर 61 से 63 फीसदी तक की बचत में योगदान दे सकते हैं।

सीईईडब्ल्यू के मुताबिक प्रति व्यक्ति संभावित उत्सर्जन बचत में भी बड़ा अंतर दिखाई देता है। उदाहरण के लिए एक औसत अमेरिकी नागरिक के लिए इन व्यवहारिक बदलावों से होने वाली प्रति व्यक्ति संभावित उत्सर्जन बचत एक भारतीय की तुलना में 56 गुणा तक अधिक हो सकती है।

तेल की खपत में भी आएगी बड़ी गिरावट

इन बदलावों का असर केवल हवा और जलवायु तक सीमित नहीं रहेगा। इससे देशों की ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत हो सकती है। रिपोर्ट का अनुमान है कि 2025 से 2050 के बीच व्यवहार में बदलाव से परिवहन क्षेत्र में करीब 271.5 करोड़ टन तेल की खपत रोकी जा सकती है।

बचने वाले इस तेल की मात्रा भी चौंकाने वाली है, जोकि 2024 में दुनिया की कुल सालाना तेल मांग के करीब 59 फीसदी के बराबर है।

अप्रैल 2026 में तेल के मूल्य के आधार पर इस बचत की कुल आर्थिक कीमत करीब 2.3 ट्रिलियन डॉलर आंकी गई है। यानी कारपूलिंग, सार्वजनिक परिवहन और हाइब्रिड वर्क जैसी छोटी-छोटी आदतों का असर सिर्फ पर्यावरण पर नहीं, बल्कि देशों की अर्थव्यवस्था और तेल आयात पर भी पड़ सकता है।

खासकर उन देशों के लिए, जो भू-राजनीतिक तनाव और तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव से प्रभावित होते हैं, तेल की खपत कम करना ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी एक मजबूत सुरक्षा कवच बन सकता है।

भारत के लिए चुनौती और बड़ा अवसर

सीईईडब्ल्यू की प्रोग्राम एसोसिएट रोहिणी दीक्षित के मुताबिक, उत्सर्जन बचत का भूगोल समझना बेहद जरूरी है। विकसित देशों और चीन में निजी वाहनों पर अधिक निर्भरता के कारण कुल बचत की संभावना ज्यादा है, जबकि भारत जैसे विकासशील देशों में प्रति व्यक्ति संभावित बचत कम है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भारत के लिए अवसर छोटा है। बल्कि यहां सबसे बड़ा मौका भविष्य को निजी वाहनों पर निर्भर होने से बचाने का है। अगर शहरों में अच्छी, भरोसेमंद और सस्ती बस सेवाएं उपलब्ध हों, साझा परिवहन को बढ़ावा मिले और कामकाज के ऐसे मॉडल विकसित हों जिनमें हर दिन ऑफिस जाना जरूरी न हो, तो बढ़ती आबादी और शहरीकरण के साथ निजी वाहनों की निर्भरता को काफी हद तक रोका जा सकता है।

जरूरत सिर्फ सलाह की नहीं, बेहतर व्यवस्था की है

रिपोर्ट में सीईईडब्ल्यू ने जी20 देशों से जलवायु नीतियों में लोगों के व्यवहार से होने वाली उत्सर्जन बचत को भी मापने की व्यवस्था शामिल करने की सिफारिश की है।

विकसित देशों और चीन में कारपूलिंग प्लेटफॉर्म, हाइब्रिड वर्क को बढ़ावा देने के साथ भीड़भाड़ और पार्किंग शुल्क जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं। वहीं विकासशील देशों को निजी वाहनों पर रोक लगाने से पहले बसों के बेड़े का विस्तार, उनका विद्युतीकरण और साझा परिवहन के लिए प्रोत्साहन बढ़ाने पर जोर देना चाहिए।

हमे समझना होगा कि, जलवायु परिवर्तन से लड़ाई हमेशा किसी बड़ी तकनीकी छलांग से ही नहीं जीती जाएगी। कभी-कभी बदलाव इतना सरल भी हो सकता है कि रोज घर से निकलते समय कार में अकेले बैठने के बजाय किसी के साथ सफर किया जाए, बस चुनी जाए या सप्ताह में एक-दो दिन घर से काम किया जाए।

यह सही  है कि एक व्यक्ति की छोटी-सी आदत शायद दुनिया नहीं बदलती, लेकिन जब करोड़ों लोग एक जैसी छोटी कोशिश करते हैं, तो उसका असर सड़कों से लेकर तेल बाजार और जलवायु तक दिखाई दे सकता है।