आईआईटी दिल्ली से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए गए एक नए अध्ययन ने चेतावनी दी है कि भारत में कोयला आधारित बिजलीघरों से निकलने वाला सल्फर डाइऑक्साइड लाखों लोगों की सेहत और जिंदगी पर गंभीर असर डाल रहा है।
अध्ययन के मुताबिक, यदि इन बिजलीघरों से होने वाले एसओ₂ उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण कर लिया जाए, तो हर साल करीब 1.25 लाख असमय मौतों को रोका जा सकता है। शोध में यह भी सामने आया है कि इससे हवा में मौजूद खतरनाक पीएम2.5 प्रदूषण में बड़ी कमी आएगी, जो दिल और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों की बड़ी वजह है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे घनी आबादी वाले राज्यों को इसका सबसे ज्यादा स्वास्थ्य लाभ मिल सकता है।
वहीं छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे औद्योगिक राज्यों में वायु गुणवत्ता में बड़ा सुधार संभव है। अध्ययन यह भी बताता है कि प्रदूषण कम होने का सबसे अधिक फायदा समाज के कमजोर और हाशिए पर रहने वाले तबकों को मिलेगा।
शोधकर्ताओं ने जोर दिया है कि यदि एफजीडी जैसी प्रदूषण नियंत्रण तकनीकों को सख्ती से लागू किया जाए, तो 2030 तक कोयला बिजलीघरों से जुड़े एसओ₂ और पीएम2.5 उत्सर्जन में 80 फीसदी से ज्यादा कमी लाई जा सकती है।
भारत में हर साल करोड़ों लोग ऐसी हवा में सांस लेने को मजबूर हैं, जो धीरे-धीरे उनकी जिंदगी छीन रही है। इसके लिए कुछ हद तक कोयला बिजलीघरों से होने वाला उत्सर्जन भी जिम्मेवार है।
भले ही देश अक्षय ऊर्जा की दिशा में प्रगति कर रहा है, लेकिन इस सच को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि भारत की बिजली व्यवस्था आज भी बड़े पैमाने पर कोयले पर टिकी है। इसी कोयले से निकलने वाला सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) लाखों लोगों की सांसों और जिंदगी पर भारी पड़ रहा है।
आईआईटी दिल्ली से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में इस विषय पर किए एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि यदि कोयला बिजलीघरों से निकलने वाले जहरीले सल्फर डाइऑक्साइड पर सख्ती से नियंत्रण कर लिया जाए, तो हर साल करीब 124,564 लोगों की जिंदगी बचाई जा सकती है।
साथ ही इसकी मदद से हवा में मौजूद प्रदूषण के खतरनाक महीन कणों पीएम2.5 में बड़े पैमाने पर कमी लाई जा सकती है। देखा जाए तो यह महज प्रदूषण कम करने की बात नहीं, बल्कि सांसों, स्वास्थ्य और लाखों जिंदगियों को बचाने की उम्मीद से जुड़ा सवाल है।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित नेचर जर्नल एनपीजे क्लीन एयर में प्रकाशित हुए हैं।
अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट से प्राप्त आंकड़ों और अत्याधुनिक वायु प्रदूषण मॉडल जीईओएस-सीएचईएम की मदद से यह समझने की कोशिश की है कि कोयला बिजलीघरों से निकलने वाला सल्फर डाइऑक्साइड कैसे हवा में घुलकर बेहद खतरनाक सूक्ष्म कण पीएम2.5 में बदल जाता है। यही महीन कण दिल, फेफड़ों और सांस से जुड़ी गंभीर बीमारियों की बड़ी वजह बनते हैं।
सालाना घट सकता है 12 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पीएम2.5
अध्ययन में पुष्टि हुई है कि यदि कोयला आधारित बिजलीघरों से उत्सर्जित होने वाले सल्फर डाइऑक्साइड पर पूरी तरह लगाम लगा दी जाए तो देशभर में पीएम2.5 का स्तर सालाना 12 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक घट सकता है। इसका सबसे बड़ा फायदा छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे मध्य और पूर्वी राज्यों में देखने को मिल सकता है, जहां वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार संभव है।
साथ ही इसकी मदद से राज्य हवा में मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड के स्तर को 0.1 से 13.6 पीपीबी तक कम कर सकते हैं।
‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज’ पद्धति से किए इस विश्लेषण के अनुसार, प्रदूषण में इस कमी से होने वाली जिन लाखों मौतों को टाला जा सकता है, उनमें दिल और सांस से जुड़ी बीमारियों से होने वाली मौतें भी शामिल हैं।
किन राज्यों को होगा सबसे ज्यादा फायदा
नतीजे दर्शाते हैं कि सल्फर उत्सर्जन में इस कमी से हर साल हृदय संबंधी बीमारियों से होने वाली 14,777 और सांस से जुड़ी बीमारियों से होने वाली 8,476 मौतों को रोका जा सकता है। इन मौतों के लिए भी कहीं न कहीं प्रदूषण के महीन कण ही जिम्मेवार हैं।
खास बात यह है कि महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे घनी आबादी वाले राज्यों में मौतों में सबसे ज्यादा कमी देखने को मिल सकती है। अनुमान है कि केवल महाराष्ट्र में ही हर साल करीब 18,663, तमिलनाडु में 18,417 और कर्नाटक में 11,817 असमय मौतों को रोका जा सकता है। इसके अलावा मध्य और दक्षिण भारत के कई अन्य राज्यों में भी पीएम2.5 से जुड़ी हजारों मौतों में कमी आ सकती है।
इसी तरह हृदय सम्बन्धी बीमारियों से होने वाली मौतों में सबसे बड़ा लाभ महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना को मिल सकता है। वहीं सांस संबंधी बीमारियों से होने वाली मौतों में सबसे अधिक राहत उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में देखने को मिल सकती है।
अध्ययन में एक अहम बात यह देखी गई कि छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में कोयला बिजलीघरों से सल्फर उत्सर्जन ज्यादा होने के बावजूद महाराष्ट्र और तमिलनाडु में स्वास्थ्य लाभ अधिक दिखाई दिए। इसकी बड़ी वजह इन राज्यों की भारी आबादी है, जो लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहती है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी सांस संबंधी बीमारियों से बचाव का फायदा काफी बड़ा हो सकता है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, प्रदूषण में कमी का सबसे बड़ा लाभ समाज के कमजोर और हाशिए पर रहने वाले तबकों को मिलेगा। ऐसे में सल्फर उत्सर्जन पर नियंत्रण सिर्फ साफ हवा या पर्यावरण बचाने का मामला नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समानता, स्वास्थ्य सुरक्षा और न्याय से जुड़ा एक अहम सवाल भी है।
एफजीडी तकनीक पर क्यों छिड़ी है बहस
शोधकर्ताओं के मुताबिक ऊर्जा क्षेत्र को पहले ही भारत में वायु प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत माना जाता है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि थर्मल पावर प्लांट वास्तव में कितनी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं, ताकि राज्य अपने स्तर पर सटीक नीतियां बना सकें।
अध्ययन ऐसे समय सामने आया है, जब फ्लू-गैस डिसल्फराइजेशन (एफजीडी) तकनीक को लेकर बहस तेज है। यह तकनीक बिजलीघरों की चिमनियों से निकलने वाले सल्फर डाइऑक्साइड को कम करती है। सरकार ने 2015 में पर्यावरण संरक्षण नियमों में संशोधन कर कोयला बिजलीघरों में फ्लू गैस डीसल्फराइजेशन (एफजीडी) प्रणाली लगाना अनिवार्य किया था।
हालांकि अध्ययन के मुताबिक नीति आयोग का तर्क था कि भारतीय कोयले में सल्फर की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है, इसलिए एफजीडी तकनीक पर होने वाला भारी खर्च व्यावहारिक नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही इस तकनीक से बिजली और कोयले की अतिरिक्त खपत, ज्यादा पानी की जरूरत, चूना पत्थर खनन, जिप्सम कचरे के निपटान से जुड़े पर्यावरणीय नुकसान और विदेशी कंपनियों पर निर्भरता के कारण बढ़ने वाले खर्च जैसी चिंताएं भी सामने रखी गईं।
एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यदि देशभर में एफजीडी तकनीक लागू की जाती है, तो इससे एसओ₂ में होने वाली कमी की तुलना में करीब चार गुणा अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन हो सकता है, जो जलवायु परिवर्तन और उससे जुड़े स्वास्थ्य व पर्यावरणीय संकट को और बढ़ा सकती है।
लेकिन नए अध्ययन का दावा है कि लोगों की जान बचाने और बीमारियां घटाने से होने वाला आर्थिक और सामाजिक फायदा, इस तकनीक की लागत से कहीं ज्यादा होगा।
सीएसई ने भी जारी की थी रिपोर्ट
'वैल्यू ऑफ स्टैटिस्टिकल लाइफ’ (वीएसएल) और भारत से जुड़े सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों के आधार पर किए गए आकलन में पाया गया कि यदि 2015 में बड़े पैमाने पर कोयला बिजलीघरों से होने वाले उत्सर्जन पर पूरी तरह नियंत्रण कर लिया जाता, तो करीब 80 हजार असमय मौतों को रोका जा सकता था। साथ ही इससे देश को करीब 600 करोड़ डॉलर का शुद्ध आर्थिक लाभ भी मिल सकता था।
सीएसई के विश्लेषण से भी पता चला है कि खासकर दिल्ली-एनसीआर के आसपास मौजूद कई कोयला आधारित बिजलीघर एफजीडी प्रणाली लगाने की बढ़ाई गई समयसीमा का पालन करने में अब भी पीछे हैं। यह तकनीक सल्फर डाइऑक्साइड और उससे बनने वाले खतरनाक सेकेंडरी पीएम2.5 प्रदूषण को कम करने के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है।
सैटेलाइट आंकड़ों पर आधारित अध्ययन से पता चला है कि 2005 से 2021 के बीच दुनिया भर में सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन लगातार घटा है। 2007 में जहां यह उत्सर्जन सबसे अधिक था, वहीं 2013 के बाद इसमें तेजी से कमी दर्ज की गई। लेकिन भारत की स्थिति इसके उलट रही। देश में सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन 2005 में 2.36 हजार किलोटन प्रति वर्ष से बढ़कर 2021 में 5.05 हजार किलोटन तक पहुंच गया, जबकि 2023 में इसमें करीब 30 फीसदी और बढ़ोतरी दर्ज की गई।
2030 तक घट सकता है 80 फीसदी उत्सर्जन, कैसे
अध्ययन के अनुसार, भारत में कोयला आधारित बिजलीघरों से होने वाले एसओ₂ उत्सर्जन के सबसे बड़े प्रदूषण हॉटस्पॉट देश के औद्योगिक मध्य और पूर्वी हिस्सों में मौजूद हैं, जिनमें छत्तीसगढ़ और ओडिशा सबसे प्रमुख हैं।
शोधकर्ताओं ने इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि यदि मौजूदा उत्सर्जन नियमों को सख्ती से लागू किया जाए, बिजलीघरों में एफजीडी और अन्य प्रदूषण नियंत्रण तकनीकों का विस्तार किया जाए और प्रदूषण हॉटस्पॉट क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाए, तो 2030 तक कोयला बिजलीघरों से जुड़े एसओ₂ और पीएम2.5 उत्सर्जन में 80 फीसदी से ज्यादा की कमी लाई जा सकती है।
आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि कोयले से बनने वाली बिजली की असली कीमत महज आर्थिक नहीं, बल्कि लोगों की सांसों और जिंदगी से भी चुकाई जा रही है। ऐसे में सवाल केवल ऊर्जा उत्पादन का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि विकास की कीमत आखिर कितनी जिंदगियों से वसूली जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वच्छ ईंधन, अक्षय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा और प्रदूषण के अन्य स्रोतों पर लगाम भी इस जंग में अहम भूमिका निभाएगी।
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