रिसर्च से पता चला है कि मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव और एंजाइम पर्यावरण में होने वाले बदलावों के अत्यंत संवेदनशील जैविक संकेतक हैं। इनकी निगरानी से चाय बागानों में मिट्टी की वास्तविक सेहत और पर्यावरणीय बदलावों का बेहतर आकलन किया जा सकता है। फोटो: आईस्टॉक 
कृषि

क्या बदलती जलवायु से भारत में बदल रही चाय बागानों की जैविक सेहत, मिट्टी के सूक्ष्मजीव बने अहम पैमाना

नागालैंड विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए अध्ययन में सामने आया है कि चाय बागानों की मिट्टी में छिपे नन्हे सूक्ष्मजीव और एंजाइम ही असल में बागानों का 'जैविक हेल्थ कार्ड' हैं

Lalit Maurya

  • असम के चाय बागानों पर किया भारतीय वैज्ञानिकों का नया अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल चाय की पैदावार, गुणवत्ता या मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि मिट्टी के भीतर मौजूद सूक्ष्मजीवों और एंजाइमों जैसे अदृश्य जैविक तंत्र पर भी पड़ रहा है।

  • नागालैंड विश्वविद्यालय के नेतृत्व में किए गए इस बहुवर्षीय शोध में पाया गया कि यही सूक्ष्मजीव और एंजाइम मिट्टी की वास्तविक सेहत के सबसे भरोसेमंद 'जैविक हेल्थ कार्ड' हैं, जो पोषक तत्वों के संतुलन, उर्वरता और अंततः चाय उत्पादन को नियंत्रित करते हैं। अ

  • ध्ययन के अनुसार तापमान और मौसम में बढ़ती अनिश्चितता इन जैविक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर रही है, जबकि कुछ विशेष मौसमी परिस्थितियां लाभकारी सूक्ष्मजीवों के लिए सबसे अनुकूल साबित होती हैं।

  • वैज्ञानिकों का मानना है कि मिट्टी के इन जैविक संकेतकों की नियमित निगरानी से चाय बागानों में पोषक तत्वों का अधिक वैज्ञानिक प्रबंधन, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता में कमी और जलवायु-अनुकूल खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है।

  • यह शोध नीति-निर्माताओं और चाय उद्योग के लिए भी महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है, ताकि बदलती जलवायु के बीच भारत की चाय की गुणवत्ता, उत्पादकता और उत्पादन की स्थिरता को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके।

सुबह की एक कप चाय भारत में केवल एक पेय नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की दिनचर्या का पहला एहसास है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि असम की जिन वादियों से यह चाय हमारी प्याली तक पहुंचती है, वहां की जमीन के भीतर एक खामोश जंग चल रही है?

रिसर्च से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन का साया अब सिर्फ आसमान, बारिश और चाय की पत्तियों तक सीमित नहीं है। यह धरती के उस 'अदृश्य जीवन' पर भी गहरा असर डाल रहा है, जो मिट्टी को जिन्दा रखता है।

भारतीय वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए एक नए अध्ययन ने खुलासा किया है कि चाय बागानों की मिट्टी में छिपे नन्हे सूक्ष्मजीव और एंजाइम ही असल में बागानों का 'जैविक हेल्थ कार्ड' हैं, और मौसम के बिगड़ते मिजाज से इनकी सांसें प्रभावित हो रही हैं। वैज्ञानिकों ने पाया है कि बदलती जलवायु मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्मजीवों और एंजाइमों की गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है। यही सूक्ष्मजीव मिट्टी की सेहत, पोषक तत्वों के संतुलन और अंततः चाय की उत्पादकता के सबसे अहम आधार हैं।

जैविक तंत्र को बदल रही मौसम में बढ़ती अनिश्चितता

नागालैंड विश्वविद्यालय सहित देश-दुनिया के जाने माने शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों द्वारा किए एक नए संयुक्त अध्ययन में सामने आया है कि मौसम में बढ़ती अनिश्चितता मिट्टी के जैविक तंत्र को बदल रही है।

अपने अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 2016 से 2019 के बीच असम के जोरहाट स्थित पांच प्रमुख चाय बागानों की मिट्टी का विभिन्न मौसमों में विस्तृत विश्लेषण किया। इस दौरान बैक्टीरिया, फफूंद (फंगी) और मिट्टी में सक्रिय एंजाइमों की गतिविधियों का अध्ययन किया गया, ताकि यह समझा जा सके कि बदलती जलवायु इन जैविक प्रक्रियाओं को किस प्रकार प्रभावित करती है।

इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका एनवायरमेन्ट्स में प्रकाशित हुए हैं।

अध्ययन में सूक्ष्मजीव विज्ञान, जैव-रसायन, जलवायु विज्ञान और उन्नत सांख्यिकीय विश्लेषण को एक साथ जोड़कर यह देखा गया कि बदलती जलवायु मिट्टी की जैविक प्रक्रियाओं को किस प्रकार प्रभावित कर रही है।

इसके लिए सहसंबंध विश्लेषण, हायरार्किकल क्लस्टर विश्लेषण और प्रिंसिपल कंपोनेंट एनालिसिस जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया। यह असम के चाय बागानों में सूक्ष्मजीवों के मौसमी बदलावों का पहला बहुवर्षीय और व्यापक अध्ययन है।

सूक्ष्मजीव और एंजाइम बने मिट्टी की सेहत के सबसे बड़े संकेतक

अध्ययन ने जलवायु परिवर्तन, मिट्टी के जैविक स्वास्थ्य और सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के बीच गहरे संबंधों को उजागर किया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये निष्कर्ष पूर्वोत्तर भारत में चाय की पर्यावरण और जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार साबित हो सकते हैं।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव और एंजाइम केवल उर्वरता बनाए रखने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे पोषक तत्वों के चक्र को भी संतुलित रखते हैं। लेकिन अब तक पूर्वोत्तर भारत के चाय बागानों में जलवायु परिवर्तन का इन जैविक प्रक्रियाओं पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर पर्याप्त वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध नहीं थी। यह अध्ययन उस कमी को काफी हद तक पूरा करता है।

शोध में पाया गया कि कुछ विशेष तापमान और मौसमी परिस्थितियां लाभकारी सूक्ष्मजीवों की वृद्धि के लिए सबसे अनुकूल होती हैं। साथ ही, सूक्ष्मजीवों की संख्या और मिट्टी के एंजाइमों की गतिविधियों के बीच मजबूत सकारात्मक संबंध दर्ज किया गया।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि जैविक आंकड़ों में 80 फीसदी से अधिक बदलाव को पहले तीन प्रमुख सांख्यिकीय घटकों से समझाया जा सकता है, जो शोध की विश्वसनीयता को और मजबूत बनाता है।

अध्ययन ने यह भी पुष्टि की है कि मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव और एंजाइम पर्यावरण में होने वाले बदलावों के अत्यंत संवेदनशील जैविक संकेतक हैं। इनकी निगरानी से चाय बागानों में मिट्टी की वास्तविक सेहत और पर्यावरणीय बदलावों का बेहतर आकलन किया जा सकता है।

अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता और नागालैंड विश्वविद्यालय के मृदा विज्ञान विभाग के प्रोफेसर तन्मय करक ने प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि इस शोध का उद्देश्य उन मौसमी परिस्थितियों की पहचान करना था, जिनमें लाभकारी सूक्ष्मजीव सबसे बेहतर तरीके से विकसित होते हैं। साथ ही यह समझना भी था कि तापमान और अन्य जलवायु संबंधी कारक मिट्टी की जैविक प्रक्रियाओं को किस प्रकार नियंत्रित करते हैं।

किसानों और चाय उद्योग के लिए क्यों अहम है यह शोध?

उन्होंने बताया कि शोध के दौरान ऐसी मौसमी सीमाओं और तापमान के दायरे की पहचान की गई है, जिनमें लाभकारी सूक्ष्मजीव सबसे अधिक सक्रिय रहते हैं। इससे भविष्य में मिट्टी की जैविक स्थिति के आधार पर सटीक पोषण प्रबंधन संभव होगा और रासायनिक उर्वरकों के अनावश्यक उपयोग को भी कम किया जा सकेगा।

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह अध्ययन पर्यावरण और जलवायु-अनुकूल चाय उत्पादन प्रणाली विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

यदि मिट्टी के जैविक संकेतकों की नियमित निगरानी की जाए तो चाय उत्पादक पोषक तत्वों का अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी प्रबंधन कर सकेंगे, जिससे खेती अधिक बेहतर और पर्यावरण अनुकूल बन सकेगी।

शोधकर्ताओं का यह भी मानना है कि यह अध्ययन नीति-निर्माताओं और कृषि विस्तार एजेंसियों को वैज्ञानिक आधार उपलब्ध कराएगा। इससे भारत के चाय क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के प्रति अधिक सक्षम और लचीला बनाया जा सकेगा तथा भविष्य में चाय की गुणवत्ता, उत्पादकता और उत्पादन की स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलेगी।

नागालैंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर जगदीश कुमार पटनायक ने इस उपलब्धि पर वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए कहा कि, “यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन केवल मौसम का संकट नहीं है, बल्कि यह मिट्टी के भीतर मौजूद जीवन को भी प्रभावित कर रहा है। उनके अनुसार, ऐसे शोध उत्तर-पूर्व भारत में जलवायु-अनुकूल चाय उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ-साथ क्षेत्र की पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।“

भारत में चाय की पैदावार और गुणवत्ता पर भारी पड़ रहा जलवायु परिवर्तन

गौरतलब है कि क्रिश्चियन एड द्वारा जारी एक अन्य रिपोर्ट में सामने आया था कि जलवायु में आ रहे बदलावों के चलते भारत, चीन, श्रीलंका और केन्या में भी चाय उत्पादन पर असर पड़ सकता है। वैज्ञानिकों ने अंदेशा जताया था कि बाढ़, सूखा, लू और तूफान इसके उत्पादन, स्वाद और स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद गुणों पर गंभीर प्रभाव डाल सकता हैं। 

रिपोर्ट के मुताबिक कई क्षेत्रों में होने वाली भारी बारिश और बाढ़ के चलते मौजूद चाय का जायका बदल सकता है। साथ ही संभव है कि वो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक गुणों पर भी असर डालेगा।

रिसर्च से पता चला है कि जलभराव उन पर्यावरणीय संकेतों को रोक देगा जिसके कारण पौधे, चाय का जायका बढ़ाने वाले रसायनों को छोड़ते हैं।

इनके कारण चाय में एंटीऑक्सिडेंट गुण पैदा होते हैं। इन सुगंधित यौगिकों को सेकेंडरी मेटाबॉलिट्स कहा जाता है, जो शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ावा देने में मदद कर सकते हैं, साथ ही इनमें सूजन को कम करने वाले गुण भी होते हैं। ऐसे में इसका खामियाजा चाय पीने वालों को चुकाना होगा।

दार्जिलिंग टी रिसर्च और विकास केंद्र द्वारा किए एक अध्ययन के मुताबिक तापमान और बारिश में आ रहे बदलावों के चलते चाय की पैदावार पर भारी असर पड़ा है। जहां 1994 में 1.13 करोड़ किलोग्राम दार्जलिंग चाय की पैदावार हुई थी वो 2018 में घटकर 80 से 85 लाख किलोग्राम रह गई थी। वहां न केवल इसके उत्पादन में, साथ ही गुणवत्ता में भी गिरावट आई है।

यह चाय अपने ख़ास स्वाद और सुगंध के लिए जानी जाती है पर उसपर भी जलवायु परिवर्तन का असर पड़ रहा है। इसके साथ ही बढ़ते कीटों और कीड़ों का हमला भी किसानों के लिए एक नई चुनौती पैदा कर रहा है।