एक ओर दुनिया रिकॉर्ड के करीब अनाज उत्पादन की तरफ बढ़ती नजर आ रही है, दूसरी ओर मौसम का अनिश्चित चेहरा इस पूरी तस्वीर को कभी भी बदल सकता है। फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट  
कृषि

ग्लोबल मार्केट में उतार-चढ़ाव: अनाज-चीनी में दिखी नरमी, तेल-मांस महंगे; अल नीनो ने बढ़ाई पैदावार को लेकर चिंता

वैश्विक बाजार में खाद्य कीमतों की चाल भले थोड़ी धीमी पड़ी हो, लेकिन मौसम, व्यापार और महंगाई के दबाव ने साफ कर दिया है कि राहत अभी अधूरी है।

Lalit Maurya

  • जून 2026 में वैश्विक खाद्य कीमतों में हल्की नरमी जरूर दर्ज हुई, लेकिन संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की ताजा रिपोर्ट बताती है कि राहत अभी बेहद नाजुक है और दुनिया की थाली अब भी अनिश्चितता के साये में है।

  • वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक मई के मुकाबले 0.3 फीसदी घटकर 130.3 अंक पर आ गया, पर यह अब भी पिछले साल से ऊंचा बना हुआ है।

  • अनाज और चीनी की कीमतों में गिरावट से कुछ राहत मिली, गेहूं, मक्का, जौ और ज्वार सस्ते हुए, जबकि ब्राजील से मजबूत आपूर्ति के चलते चीनी भी नीचे आई। लेकिन यह तस्वीर पूरी तरह सुकून देने वाली नहीं है। धान की कीमतों में बढ़ोतरी हुई, जो एशिया और अफ्रीका के करोड़ों गरीब परिवारों के लिए चिंता की बात है।

  • दूसरी ओर, वनस्पति तेल और मांस के दाम बढ़कर दबाव और गहरा कर रहे हैं। पाम और रेपसीड तेल की कीमतों में तेजी, बायोडीजल की मांग और मौसम संबंधी जोखिमों से जुड़ी है, जबकि मांस का सूचकांक रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया।

  • इसी बीच एफएओ ने 2026 में दुनिया के दूसरे सबसे बड़े अनाज उत्पादन की उम्मीद जताई है, लेकिन अल नीनो का खतरा इस उम्मीद पर भारी पड़ सकता है।

  • भारत, थाईलैंड और अन्य बड़े उत्पादक देशों में मौसम की गड़बड़ी पैदावार और आपूर्ति को प्रभावित कर सकती है। साफ है कि बाजार में दिखी यह मामूली राहत अभी स्थिरता की नहीं, बल्कि गहरी बेचैनी के बीच मिली एक अस्थाई सांस है।

दुनिया भर में खाने-पीने की चीजों की कीमतों में जून 2026 में हल्की राहत जरूर दिखी, लेकिन राहत की तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की ताजा रिपोर्ट एक ऐसी ही मिली-जुली तस्वीर पेश करती है, जहां एक तरफ आटा-चीनी थोड़ी सस्ती हुई है, जिससे राहत की उम्मीद जगी है।

वहीं दूसरी तरफ खाद्य तेल और मांस महंगा हुआ है। ऊपर से कुदरत की बेरुखी का डर भी सता रहा है।

यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन ने आगाह किया है कि वैश्विक खाद्य बाजार अभी भी अस्थिरता और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं। मतलब कि दुनिया की थाली में यह उतार-चढ़ाव अभी थमने वाला नहीं है।

राहत की पतली परत के बीच, बेचैनी की मोटी लकीर

एफएओ द्वारा जारी ताजा रुझानों से पता चला है कि खाद्य मूल्य सूचकांक (फूड प्राइस इंडेक्स) जून 2026 में औसतन 130.3 अंक दर्ज किया गया। यह भले ही मई के मुकाबले 0.3 फीसदी कम है, लेकिन जून 2025 की तुलना में अब भी करीब 1.7 फीसदी अधिक है।

हालांकि मार्च 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जो ऐतिहासिक उछाल आया था, उसके शिखर से यह सूचकांक अब भी करीब 18.7 फीसदी नीचे है। इसका मतलब यह है कि वैश्विक खाद्य बाजार 2022 जैसी चरम महंगाई से कुछ दूर जरूर आया है, लेकिन स्थिरता अब भी पूरी तरह नहीं लौटी है।

एफएओ में बाजार एवं व्यापार प्रभाग के निदेशक बुबाकर बेन-बेलहासेन के मुताबिक, भले ही खाद्य मूल्य सूचकांक में मामूली गिरावट आई है, लेकिन अलग-अलग खाद्य वस्तुओं के बाजार बिल्कुल अलग दिशा में चल रहे हैं। ऐसे समय में पारदर्शी व्यापार, समय पर जानकारी और भरोसेमंद आपूर्ति व्यवस्था बेहद जरूरी हो जाती है, क्योंकि खाद्य सुरक्षा अब केवल उत्पादन का सवाल नहीं रह गई, बल्कि यह वैश्विक अस्थिरता से जूझने की क्षमता का भी सवाल है।

गेहूं-मक्के में राहत की बयार, पर धान ने बदला अपना मिजाज

रिपोर्ट में सामने आया है कि जून में सबसे बड़ी राहत अनाज के मोर्चे पर दिखी। एफएओ का अनाज मूल्य सूचकांक 110.2 अंक पर आ गया, जो मई की तुलना में 3.5 फीसदी कम है। हालांकि यह अभी भी यह एक साल पहले के मुकाबले 2.7 फीसदी ऊपर बना हुआ है।

गेहूं की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में 4.4 फीसदी की गिरावट आई। इसकी एक बड़ी वजह काला सागर क्षेत्र में तेज कटाई और मजबूत आपूर्ति की उम्मीद रही, जिसने अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में फसल को लेकर बनी चिंताओं को पीछे धकेल दिया।

मक्के के दाम तो इससे भी ज्यादा, 6.2 फीसदी तक नीचे आए। दक्षिण अमेरिका के निर्यातक देशों में भरपूर आपूर्ति की संभावना और एथेनॉल की कमजोर मांग ने इस गिरावट को बढ़ाया। इसी तरह जौ की कीमतें 3.4 फीसदी और ज्वार की 7.7 फीसदी तक घटी हैं।

लेकिन अनाज की पूरी कहानी राहत की नहीं है। धान की कीमतें जून में 3.2 फीसदी बढ़ गई। एशिया में इंडिका धान की मांग मजबूत रही, वहीं मौसम को लेकर चिंताओं और उत्पादन, ढुलाई तथा विपणन लागत बढ़ने से कीमतों को सहारा मिला। यह वृद्धि खास मायने रखती है, क्योंकि एशिया और अफ्रीका के करोड़ों गरीब परिवारों की थाली में चावल केवल एक खाद्य वस्तु नहीं, बल्कि रोज का सहारा है।

रसोई के तेल में उबाल और रिकॉर्ड ऊंचाई पर मांस के दाम

जहां जून के दौरान अनाज में नरमी दिखी, वहीं वनस्पति तेल ने चिंताएं बढ़ा दी हैं। एफएओ का वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक जून में 192 अंक पर पहुंच गया, जो मई से 3.8 फीसदी अधिक है और एक साल पहले के मुकाबले 23.3 फीसदी ऊपर है। पाम तेल और रेपसीड तेल की कीमतों में तेजी इसकी बड़ी वजह रही।

इंडोनेशिया में बायोडीजल के लिए घरेलू मांग बढ़ने और निर्यात उपलब्धता घटने की आशंका से पाम तेल महंगा हुआ है।

रेपसीड तेल पर ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के मौसम की मार और जैव ईंधन की मांग का असर दिखा। वहीं सूरजमुखी के तेल की कीमतें लगभग स्थिर रहीं, जबकि सोयाबीन तेल में थोड़ी नरमी आई। लेकिन रसोई के नजरिए से देखें तो तेल की कीमतों में यह बढ़ोतरी दुनिया के उन घरों पर सबसे ज्यादा असर डालती है, जहां हर दिन की खरीदारी बजट नापकर की जाती है।

इस दौरान मांस के दाम भी बढ़े है। जून 2026 में एफएओ मांस मूल्य सूचकांक 131 अंक तक पहुंच गया। यह मई से 0.4 फीसदी और पिछले साल से 4 फीसदी अधिक है। इतना ही नहीं, यह सूचकांक एक नए रिकॉर्ड उच्च स्तर पर भी पहुंच गया है। पोल्ट्री यानी चिकन के दाम बढ़ने के पीछे ब्राजील से ऊंचे निर्यात मूल्य और वैश्विक मांग का दबाव रहा।

चीनी में बढ़ी हल्की मिठास, पर भारत में मौसम को लेकर बढ़ी चिंताएं

इसके उलट डेयरी उत्पादों में कुछ राहत मिली। एफएओ का डेयरी मूल्य सूचकांक जून में 117.4 अंक दर्ज किया गया, जो मई से 1.5 फीसदी कम है।

जून 2025 की तुलना में यह 24.5 फीसदी नीचे है। इस दौरान स्किम मिल्क पाउडर, होल मिल्क पाउडर, मक्खन और पनीर सभी में गिरावट देखी गई। खासतौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में पनीर की कीमतों में यह लगातार 11वां महीना था जब गिरावट दर्ज की गई।

यूरोपीय यूनियन और अमेरिका में दूध की उपलब्धता बढ़ने से मक्खन और पनीर का उत्पादन बढ़ा और निर्यात आपूर्ति भी मजबूत हुई।

लेकिन यहां भी एक दिलचस्प तस्वीर है, डेयरी बाजार के भीतर सभी उत्पाद एक जैसी दिशा में नहीं चल रहे। उदाहरण के लिए स्किम मिल्क पाउडर अभी भी पिछले साल के मुकाबले ऊंचे स्तर पर बना हुआ है।

हालांकि चीनी में मिठास कुछ बढ़ गई है। एफएओ का चीनी मूल्य सूचकांक जून में 89.7 अंक पर पहुंच गया, जो मई के मुकाबले 5.7 फीसदी और पिछले साल से 13.3 फीसदी नीचे है। ब्राजील में लगातार तीसरे महीने घरेलू एथेनॉल कीमतों में गिरावट आने से गन्ने का बड़ा हिस्सा चीनी बनाने में लगाया गया। साथ ही ब्राजील की मुद्रा के कमजोर होने से वहां से चीनी निर्यात तेज हुआ, जिससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव पड़ा है।

इतिहास की दूसरी बड़ी पैदावार की उम्मीद...और अल-नीनो का डर

लेकिन इस राहत के बीच एक बड़ा डर अब भी बना हुआ है और वो डर है अल नीनो। भारत और थाईलैंड जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में 2026-27 सीजन के दौरान अल नीनो का असर गन्ने की पैदावार पर पड़ सकता है। यही वजह है कि चीनी की कीमतों में गिरावट और गहरी नहीं हो सकी।

कीमतों में इस उतार-चढ़ाव के बीच एफएओ की एक और रिपोर्ट कुछ उम्मीद भी जगाती है। संगठन ने 2026 की वैश्विक फसल के शुरुआती अनुमान जारी करते हुए कहा है कि दुनिया में इस साल कुल अनाज उत्पादन 298.3 करोड़ टन तक पहुंच सकता है।

अगर यह अनुमान सही साबित हुआ तो यह इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा वैश्विक अनाज उत्पादन होगा, हालांकि पिछले साल के रिकॉर्ड स्तर से यह अब भी 1.9 फीसदी कम है।

मोटे अनाज का उत्पादन पिछले साल के करीब बराबर रहने का अनुमान है, जबकि वैश्विक गेहूं उत्पादन 4.3 फीसदी की गिरावट का अंदेशा है, जो 80.65 करोड़ टन रह सकता है। अर्जेंटीना, ब्राजील, चीन और जाम्बिया से बेहतर फसल के संकेत मिले हैं, जिसने कुल उत्पादन के अनुमान को सहारा दिया है।

खेत से रसोई तक फैली एक बेचैनी

यही वह जगह है जहां उम्मीद और चिंता एक-दूसरे से टकराती दिखती हैं। एक ओर दुनिया रिकॉर्ड के करीब अनाज उत्पादन की तरफ बढ़ती नजर आ रही है, दूसरी ओर मौसम का अनिश्चित चेहरा इस पूरी तस्वीर को कभी भी बदल सकता है।

अल नीनो की आशंका सिर्फ मौसम वैज्ञानिकों की शब्दावली नहीं है, इसका मतलब है कहीं बारिश कम होना, कहीं सूखा बढ़ना, कहीं फसल का झुलसना, और अंततः कहीं किसी गरीब परिवार की थाली से एक रोटी या एक कटोरी चावल कम हो जाना।

दरअसल, एफएओ की यह रिपोर्ट केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार की चाल नहीं बताती, बल्कि यह उस अदृश्य डोर को भी सामने लाती है जो ब्राजील के गन्ने के खेत, काला सागर के गेहूं, एशिया के धान, इंडोनेशिया के पाम तेल और भारत-थाईलैंड के मौसम को दुनिया भर की रसोइयों से जोड़ती है।

जून के आंकड़े कहते हैं कि कुल खाद्य कीमतों में थोड़ी नरमी आई है, लेकिन यह राहत बहुत नाजुक है। अगर अनाज कुछ सस्ता हुआ है तो तेल और मांस महंगे हुए हैं, अगर चीनी नीचे आई है तो चावल ऊपर गया है। वहीं अगर फसल अच्छी दिख रही है तो मौसम पर भरोसा कम हो रहा है।

आखिरकार, भोजन केवल बाजार की वस्तु नहीं है। यह खेत में किसान की मेहनत, मंडी की राजनीति, समुद्र पार व्यापार की अनिश्चितता और घर की रसोई में चूल्हे के सामने खड़े परिवार की चिंता, सबका मिला-जुला सच है।

इसलिए जून 2026 की यह हल्की गिरावट राहत की खबर जरूर है, लेकिन ऐसी राहत नहीं, जिससे दुनिया निश्चिंत हो जाए। दुनिया की थाली अभी भी संतुलन खोज रही है, और इस संतुलन की सबसे बड़ी कीमत वही लोग चुकाते हैं, जिनके पास सबसे कम विकल्प होते हैं।