प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
कृषि

पूर्वोत्तर में मिट्टी के कटाव को रोकेगी जीआईएस तकनीक: नागालैंड यूनिवर्सिटी ने दिखाई राह

नागालैंड यूनिवर्सिटी का अध्ययन दर्शाता है कि जियोस्पेशियल तकनीक की मदद से पूर्वोत्तर के पहाड़ी ढलानों पर मिट्टी के बढ़ते कटाव को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है।

Lalit Maurya

  • नागालैंड यूनिवर्सिटी के अध्ययन ने पूर्वोत्तर भारत में तेजी से बढ़ते मिट्टी के कटाव से निपटने के लिए जियोस्पेशियल (जीआईएस) तकनीक को एक प्रभावी समाधान के रूप में सामने रखा है।

  • पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में खड़ी ढलानों, भारी बारिश, वनों की कटाई और अनियोजित मानव गतिविधियों के कारण मिट्टी का नुकसान गंभीर पर्यावरणीय संकट बन चुका है, जो खेती, जल संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहा है।

  • अध्ययन में असम के सिजी वाटरशेड को आधार बनाकर जीआईएस मॉडलिंग और वैज्ञानिक समीकरणों के जरिए जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान की गई। नतीजों से स्पष्ट हुआ कि घने जंगल और हल्की ढलानों में मिट्टी सुरक्षित रहती है, जबकि अधिक ढलान और मानव हस्तक्षेप वाले क्षेत्रों में कटाव तेजी से बढ़ रहा है।

  • वैज्ञानिकों ने इंटीग्रेटेड वाटरशेड मैनेजमेंट, टेरेसिंग और हरियाली बढ़ाने जैसे उपायों की सिफारिश की है। यह अध्ययन न केवल मिट्टी संरक्षण की दिशा दिखाता है, बल्कि नीति-निर्माण और टिकाऊ भूमि उपयोग के लिए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आधार भी प्रदान करता है।

पूर्वी हिमालय के पहाड़ी इलाकों में मिट्टी का तेजी से बढ़ता कटाव पर्यावरण के लिए गंभीर संकट का रूप ले चुका है। खड़ी ढलानों, भारी वर्षा, जंगलों का होता विनाश और अनियोजित इंसानी गतिविधियों जैसे खनन, झूम कृषि और बुनियादी ढांचे के तेजी से होते विकास ने इस समस्या को पहले से कहीं अधिक जटिल और गहरा बना दिया है।

लेकिन अब इस चुनौती से निपटने के लिए नागालैंड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 'जियोस्पेशियल टेक्नोलॉजी' (जीआईएस) पर आधारित एक आधुनिक और वैज्ञानिक समाधान पेश किया है। यह तकनीक जमीन, बारिश, ढलान और भूमि उपयोग जैसे कई अहम पहलुओं को एक साथ जोड़कर यह बताती है कि कहां और कितना कटाव हो रहा है और इसे कैसे रोका जा सकता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक जीआईएस जैसी उन्नत तकनीक की मदद से मिट्टी के कटाव को प्रभावी ढंग से समझा और नियंत्रित किया जा सकता है। यह न केवल मिट्टी को बचाने में मदद करेगा, बल्कि खेतों की उत्पादकता बढ़ाने, जल संसाधनों को मजबूत करने और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभा सकता है।

पानी के साथ बहती किसानों की उम्मीदें

गौरतलब है कि जब पहाड़ी ढलानों पर तेज बारिश होती है, तो सिर्फ पानी ही नहीं बहता, इसके साथ ही धरती की ऊपरी उपजाऊ परत भी बह जाती है। यही मिट्टी किसानों की उम्मीद होती है, और जब यह बहती है, तो खेत, पानी और पूरा पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर पड़ने लगता है।

अध्ययन असम के गाई नदी बेसिन के सिजी वाटरशेड पर केंद्रित है, जो पूर्वोत्तर के सबसे ज्यादा कटाव-प्रभावित इलाकों में से एक है। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने जीआईएस मॉडलिंग और रिवाइज्ड यूनिवर्सल सॉइल लॉस इक्वेशन के जरिए बारिश, मिट्टी की बनावट, ढलान, भूमि उपयोग और संरक्षण उपायों जैसे कारकों का विश्लेषण कर मिट्टी के नुकसान का आकलन किया है। साथ ही यह पता लगाया कि कौन-से इलाके सबसे ज्यादा खतरे में हैं।

यह अध्ययन नागालैंड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एम एस रावत, शोधकर्ता तुलुमोनी गोगोई और एशियन इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के डॉक्टर प्रदीप कुमार रावत द्वारा किया गया है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित अंतराष्ट्रीय जर्नल डिस्कवर जियोसाइंस में प्रकाशित हुए हैं।

नतीजे दर्शाते हैं कि जहां घने जंगल और हल्की ढलान है, वहां मिट्टी सुरक्षित रहती है। लेकिन जहां ढलान तेज, बंजर जमीन, जंगल कम या इंसानी दखल ज्यादा है, वहां मिट्टी तेजी से बह रही है। इतना ही नहीं कुछ इलाकों में तो यह खतरा बेहद गंभीर स्तर तक पहुंच चुका है, जो स्थानीय पारिस्थितिकी और भूमि की स्थिरता के लिए बड़ा खतरा है।

इंटीग्रेटेड वाटरशेड मैनेजमेंट जरूरी

वैज्ञानिकों ने इससे बचने के लिए 'इंटीग्रेटेड वॉटरशेड मैनेजमेंट (आईडब्ल्यूएम)' अपनाने की सिफारिश की है। इसके तहत खेतों को ढलान के अनुसार बनाना (टैरसिंग), जमीन की सतह को कंटूर के अनुसार ढालना और ज्यादा से ज्यादा हरियाली बढ़ाना जैसे उपाय शामिल हैं।

साथ ही वैज्ञानिकों ने मिट्टी को संरक्षित रखने के लिए यांत्रिक और जैविक उपायों को लागू करने की बात कही है। ये तरीके न सिर्फ मिट्टी को बहने से बचाते हैं, बल्कि पानी को जमीन में रोककर उसकी उपलब्धता भी बढ़ाते हैं।

इस मॉडल की खासियत यह है कि यह हर छोटे क्षेत्र के हिसाब से कटाव के 'हॉटस्पॉट' की पहचान करता है। इससे सब जगह एक जैसे उपाय लागू करने की बजाय जरूरत के मुताबिक लक्षित कदम उठाए जा सकते हैं।

आईआईटी दिल्ली के शोधकर्ताओं द्वारा किए अन्य अध्ययन से पता चला है कि भारत में मिट्टी के 68.4 फीसदी कटाव के लिए बारिश जिम्मेवार है। इस रिसर्च में यह भी सामने आया है कि देश में असम और मेघालय के हिस्सों में बारिश के कारण होने वाले कटाव का खतरा सबसे ज्यादा है। इसकी सबसे बड़ी वजह वहां मौजूद दोमट, गाद दोमट, बलुई दोमट और चिकनी दोमट मिट्टी है जो ढलान वाले इलाकों में पानी के कारण होने वाले कटाव को रोकने में काफी हद तक असमर्थ रहती है।

अध्ययन दर्शाता है कि भारत में बारिश के कारण होने वाला औसत अनुमानित कटाव 1200 एमजे-मिमी/हेक्टेयर/घंटा प्रति वर्ष है। मेघालय के ईस्ट खासी हिल्स में लैटकन्स्यू और चेरापूंजी में बारिश के कारण होने वाले कटाव का जोखिम सबसे ज्यादा है। जहां आर फैक्टर 23,909.21 एमजे-मिमी/हेक्टेयर/घंटा/वर्ष है।

वहीं दूसरी तरफ लद्दाख के ठंडे और शुष्क शाही कांगड़ी पर्वतीय क्षेत्र में मिट्टी के कटाव का जोखिम सबसे कम है। इस क्षेत्र का आर फैक्टर 8.10 एमजे-मिमी/हेक्टेयर/घंटा/वर्ष रिकॉर्ड किया गया है। 

रोका जा सकता है मिट्टी को होने वाला नुकसान

प्रोफेसर एम एस रावत का कहना है कि अगर सही तरीके से जमीन का इस्तेमाल किया जाए, तो मिट्टी का नुकसान काफी हद तक रोका जा सकता है।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसरों जगदीश के पटनायक ने इसे पूर्वोत्तर भारत की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने की दिशा में एक अहम कदम बताया है। उनका मानना है कि जियोस्पेशियल तकनीक का इस्तेमाल पर्यावरण संरक्षण की कोशिशों को सही दिशा देगा। इससे न केवल उपजाऊ जमीन बचेगी, बल्कि जल प्रबंधन और कृषि पैदावार में भी सुधार होगा।

शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि यह अध्ययन नीति-निर्माताओं और योजनाकारों को जमीन के बेहतर उपयोग और संरक्षण के लिए सटीक फैसले लेने में मदद कर सकता है। खास बात यह है कि इस मॉडल को भारत के अन्य पहाड़ी इलाकों और दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी अपनाया जा सकता है।

शोधकर्ताओं ने भविष्य में बाढ़ की भविष्यवाणी और बेहतर निगरानी तंत्र विकसित करने की जरूरत पर भी जोर दिया है। देखा जाए तो बदलती जलवायु और बढ़ते इंसानी हस्तक्षेप के बीच यह जरूरी हो गया है कि समय रहते कदम उठाए जाएं, ताकि पर्यावरण को और नुकसान से बचाया जा सके।

नागालैंड यूनिवर्सिटी का यह अध्ययन केवल एक वैज्ञानिक शोध नहीं, बल्कि पहाड़ों की मिट्टी को बचाने के लिए एक स्पष्ट चेतावनी और ठोस मार्गदर्शन भी है।

यह दिखाता है कि अगर तकनीक, विज्ञान और भूमि प्रबंधन को एक साथ जोड़ा जाए, तो मिट्टी के कटाव को प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है। साथ ही, आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ जमीन, सुरक्षित जल संसाधन और संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र को भी मजबूती से संरक्षित किया जा सकता है।