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वन्य जीव एवं जैव विविधता

पीलीभीत टाइगर रिजर्व पर बढ़ता निर्माण का दबाव: रिजर्व सीमा के पास धड़ल्ले से बन रहे व्यावसायिक ढांचे: रिपोर्ट

संयुक्त समिति ने अपनी रिपोर्ट में रिजर्व की सीमा से एक किलोमीटर के भीतर तेजी से बढ़ते व्यावसायिक निर्माण, इलेक्ट्रिक फेंसिंग और 'होमस्टे' की आड़ में नियमों के संभावित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई है।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • पीलीभीत टाइगर रिजर्व की सीमा के आसपास तेजी से बढ़ता अनियंत्रित व्यावसायिक निर्माण अब संरक्षण व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनकर उभर रहा है।

  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के निर्देश पर गठित संयुक्त समिति की 24 जुलाई 2026 की रिपोर्ट में रिजर्व सीमा से एक किलोमीटर के भीतर बन रहे स्थाई व्यावसायिक ढांचों, इलेक्ट्रिक फेंसिंग और 'होमस्टे' व्यवस्था के संभावित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई गई है।

  • रिपोर्ट में इन निर्माणों के लिए जारी एनओसी और कृषि भूमि को व्यावसायिक उपयोग में बदलने की मंजूरियों की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता बताई गई। साथ ही चेतावनी दी गई है कि फार्महाउसों को रिसॉर्ट और गेस्ट हाउस में बदलने की बढ़ती प्रवृत्ति तथा बिजली वाली बाड़ें बाघों समेत अन्य वन्यजीवों की आवाजाही, प्राकृतिक गलियारों और उनकी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं।

  • समिति ने यह भी आगाह किया है कि कुछ कारोबारी 'होमस्टे' के नाम पर नियमों से बचने की कोशिश कर रहे हैं।

  • रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि यदि समय रहते प्रभावी निगरानी और सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो पीलीभीत टाइगर रिजर्व की पारिस्थितिकी, जैव विविधता और ईको-सेंसिटिव जोन का मूल उद्देश्य गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत टाइगर रिजर्व और उसके आसपास तेजी से हो रहे अनियंत्रित व्यावसायिक निर्माण पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 24 जुलाई 2026 को संयुक्त समिति ने अपनी रिपोर्ट में जानकारी दी है कि रिजर्व की सीमा से एक किलोमीटर के भीतर कई स्थाई व्यावसायिक निर्माण या तो जारी हैं या हाल ही में खड़े किए गए हैं।

गौरतलब है कि यह रिपोर्ट नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) फवारा 13 जनवरी 2026 को दिए आदेश पर अदालत में सौंपी गई है।

निर्माण की वैधता पर उठे सवाल

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन निर्माण परियोजनाओं के लिए जारी एनओसी और कृषि भूमि को व्यावसायिक उपयोग में बदलने की आवश्यक मंजूरियों की तत्काल गहन जांच होनी चाहिए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि ये निर्माण कानूनी नियमों और आवश्यक अनुमतियों के तहत हो रहे हैं या नहीं।

समिति ने यह भी पाया कि टाइगर रिजर्व की सीमा से एक किलोमीटर के दायरे में बड़ी संख्या में फार्महाउस पहले से मौजूद हैं। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि रिजर्व के बेहद करीब होने और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध होने के कारण इन्हें बिना पर्याप्त निगरानी के आसानी से फार्म स्टे, गेस्ट हाउस या रिसॉर्ट में बदला जा सकता है।

रिपोर्ट में एक और गंभीर चिंता सामने आई है। इनमें से कई स्थाई निर्माणों के चारों ओर बिजली वाली बाड़ें (इलेक्ट्रिक फेंसिंग) लगाई गई हैं।

समिति के मुताबिक, ऐसी बाड़ न केवल बाघ समेत अन्य वन्यजीवों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है, बल्कि साथ ही यह उनके प्राकृतिक आवागमन और महत्वपूर्ण वन्यजीव गलियारों (इकोलॉजिकल कॉरिडोर) में भी उनकी आवाजाही में बाधा पैदा कर रही हैं।

'होमस्टे' के नाम पर नियमों से बचने की कोशिश

रिपोर्ट में होमस्टे व्यवस्था के संभावित दुरुपयोग पर भी चिंता जताई गई है। इसमें कहा गया है कि हालांकि पीलीभीत टाइगर रिजर्व के प्रस्तावित ईको-सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) में स्थानीय समुदाय को बढ़ावा देने के लिए होमस्टे की अनुमति का प्रावधान है, लेकिन कुछ व्यावसायिक संचालक इस व्यवस्था का गलत फायदा उठा रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, कई पर्यटन कारोबार खुद को 'होमस्टे' बताकर या बड़ी संपत्तियों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर नियमों और प्रतिबंधों से बचने की कोशिश कर रहे हैं।

स्पष्ट है कि यदि इन गतिविधियों पर समय रहते प्रभावी निगरानी और सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो इससे न केवल संरक्षित क्षेत्र की पारिस्थितिकी और वन्यजीवों की सुरक्षा प्रभावित होगी, बल्कि ईको-सेंसिटिव जोन के मूल उद्देश्य भी कमजोर पड़ जाएंगे।

हमे समझना होगा कि पीलीभीत टाइगर रिजर्व केवल बाघों का घर नहीं, बल्कि तराई के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनरेखा है। यदि संरक्षित क्षेत्र की सीमाओं पर अनियंत्रित निर्माण, व्यावसायिक गतिविधियां और नियमों की अनदेखी इसी तरह जारी रही, तो इसकी कीमत केवल वन्यजीव ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी चुकानी पड़ सकती है।