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वन्य जीव एवं जैव विविधता

क्या पलामू टाइगर रिजर्व में नियमों को दरकिनार कर बन रहे हैं होटल-रिसॉर्ट? एनजीटी ने सरकार से मांगा जवाब

आरोप है कि पलामू वन्यजीव अभयारण्य के इको-सेंसिटिव जोन के भीतर 59 होटल और रिसॉर्ट बनाए जा रहे हैं। इनमें से दो निर्माण सीधे अभयारण्य की सीमा के अंदर मौजूद हैं।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • पलामू टाइगर रिजर्व के इको-सेंसिटिव जोन में कथित तौर पर हो रहे होटल और रिसॉर्ट निर्माणों ने पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने झारखंड सरकार समेत संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब करते हुए इस मामले को राष्ट्रीय महत्व का पर्यावरणीय मुद्दा बना दिया है।

  • याचिका में आरोप लगाया गया है कि पलामू वन्यजीव अभयारण्य के इको-सेंसिटिव जोन के भीतर 59 होटल और रिसॉर्ट बनाए जा रहे हैं, जिनमें से दो सीधे अभयारण्य की सीमा के अंदर स्थित हैं।

  • इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि क्षेत्र के लिए न तो अनिवार्य पर्यटन मास्टर प्लान तैयार किया गया है, न जोनल मास्टर प्लान और न ही निगरानी समिति का गठन किया गया है, जबकि यह सभी व्यवस्थाएं ईएसजेड अधिसूचना के तहत आवश्यक हैं।

  • ऐसे में सवाल उठता है कि क्या संवेदनशील वन क्षेत्रों में पर्यटन परियोजनाओं को पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी कर आगे बढ़ाया जा रहा है। यह मामला केवल पलामू तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर के संरक्षित क्षेत्रों के आसपास बढ़ते विकास दबाव और वन्यजीव संरक्षण की चुनौतियों को भी उजागर करता है।

पलामू टाइगर रिजर्व के इको-सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) में कथित तौर पर नियमों को ताक पर रख बनाए जा रहे होटल, रिसॉर्ट और अन्य व्यावसायिक निर्माणों के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने झारखंड सरकार से जवाब मांगा है। एनजीटी की पूर्वी पीठ ने 25 मई, 2026 को राज्य सरकार समेत संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है।

इस मामले की अगली सुनवाई 8 जुलाई, 2026 को होगी।

पलामू मामले में एनजीटी का दखल

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए ट्रिब्यूनल ने झारखंड सरकार के साथ-साथ पलामू के प्रमंडलीय आयुक्त, पलामू टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) को भी नोटिस भेजा है।

अपनी याचिका में आवेदक ने बताया कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) ने 9 अगस्त, 2019 को अधिसूचना जारी कर झारखंड के लातेहार और गढ़वा जिलों में स्थित पलामू वन्यजीव अभयारण्य, बेतला राष्ट्रीय उद्यान और महुआडांड़ भेड़िया अभयारण्य की सीमाओं से सात किलोमीटर तक के इलाके को इको-सेंसिटिव जोन घोषित किया था।

इस अधिसूचना में राज्य सरकार के लिए कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां तय की गई हैं। इनमें ईको-सेंसिटिव जोन के लिए एक व्यापक पर्यटन मास्टर प्लान तैयार करना भी शामिल है, ताकि पर्यटन विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके तथा संवेदनशील वन्यजीव आवासों पर अनावश्यक दबाव न पड़े।

अभयारण्य की सीमा के भीतर भी निर्माण का दावा

हालांकि, याचिकाकर्ता का आरोप है कि लातेहार जिले में पलामू वन्यजीव अभयारण्य के इको-सेंसिटिव जोन के भीतर 59 होटल और रिसॉर्ट बनाए जा रहे हैं। इनमें से दो निर्माण सीधे अभयारण्य की सीमा के अंदर मौजूद हैं।

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि पलामू टाइगर रिजर्व के ईको-सेंसिटिव जोन के लिए अब तक न तो जोनल मास्टर प्लान तैयार किया गया है, न पर्यटन मास्टर प्लान बनाया गया है और न ही अधिसूचना के अनुसार निगरानी समिति (मॉनिटरिंग कमेटी) का गठन किया गया है। ऐसे में ईको-टूरिज्म परियोजनाओं को अनुमति देने या अस्वीकार करने की कोई वैधानिक व्यवस्था मौजूद नहीं है, जबकि ईएसजेड अधिसूचना के तहत ऐसा अनिवार्य है।

ऐसे में याचिकाकर्ता के अनुसार, इन आवश्यक व्यवस्थाओं के बिना हो रहे निर्माण न केवल अधिसूचना की भावना के विपरीत हैं, बल्कि पलामू टाइगर रिजर्व की संवेदनशील पारिस्थितिकी और वन्यजीवों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं।

इको-सेंसिटिव जोन की सुरक्षा के लिए क्या कहते हैं नियम

गौरतलब है कि ईएसजेड अधिसूचना पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी की जाने वाली वह अधिसूचना है, जिसके तहत राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभयारण्यों और अन्य संरक्षित क्षेत्रों के आसपास के संवेदनशील इलाकों को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ईको-सेंसिटिव जोन) घोषित किया जाता है।

इसका उद्देश्य संरक्षित क्षेत्रों के आसपास एक 'बफर ज़ोन' बनाना है, ताकि खनन, बड़े निर्माण, प्रदूषणकारी उद्योगों और अन्य गतिविधियों से वन्यजीवों तथा उनके आवासों को नुकसान न पहुंचे।

अब इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पलामू टाइगर रिजर्व जैसे संवेदनशील संरक्षित क्षेत्र में पर्यटन और व्यावसायिक विकास पर्यावरणीय नियमों का पालन करते हुए हो रहा है, या फिर संरक्षण के लिए बनाए गए कानूनों को नजरअंदाज किया जा रहा है।

ऐसे में एनजीटी की अगली सुनवाई न केवल इन निर्माणों की वैधता को तय करेगी, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगी कि देश के संरक्षित क्षेत्रों के आसपास पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी कितनी गंभीरता से निभाई जा रही है।