मिजोरम के फावंगपुई नेशनल पार्क में 2,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर मेंढक की नई प्रजाति मिली है। फोटो साभार: टैप्रोबानिका पत्रिका
वन्य जीव एवं जैव विविधता

मिजोरम के जंगलों में मिली मेंढक की नई प्रजाति, वैज्ञानिकों ने दिया ‘फावंगपुई टोड’ नाम

मिजोरम के ऊंचे पहाड़ी जंगलों में मिली मेंढक की नई प्रजाति, वैज्ञानिकों ने रखा फावंगपुई टोड नाम, संरक्षण को लेकर बढ़ी उम्मीदें

Dayanidhi

  • मिजोरम के फावंगपुई नेशनल पार्क में 2,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर मेंढक की नई प्रजाति मिली है।

  • नई प्रजाति का वैज्ञानिक नाम दत्ताफ्रायनस फावंगपुई रखा गया, जबकि इसे फावंगपुई टोड के नाम से जाना जाएगा।

  • वैज्ञानिकों ने डीएनए जांच और शरीर की बनावट के अध्ययन से नई प्रजाति की अलग पहचान की पुष्टि की।

  • फावंगपुई टोड की पीठ पर क्रीम से हल्की पीली रंग की पतली पट्टी इसकी खास पहचान है।

  • नई खोज मिजोरम के पहाड़ी जंगलों में छिपी जैव विविधता और संरक्षण की जरूरत को उजागर करती है।

मिजोरम के घने पहाड़ी जंगलों से जैव विविधता के क्षेत्र में एक बड़ी खबर सामने आई है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी मेंढक प्रजाति की पहचान की है, जिसके बारे में पहले वैज्ञानिक दस्तावेजों में जानकारी नहीं थी। इस नई प्रजाति का वैज्ञानिक नाम दत्ताफ्रायनस फावंगपुई रखा गया है। इसे आम तौर पर फावंगपुई टोड कहा जाएगा।

इस नई प्रजाति की खोज मिजोरम के लॉन्गतलाई जिले में स्थित फावंगपुई नेशनल पार्क में हुई। यह इलाका समुद्र तल से 2,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर है। यहां ऊंचे पहाड़ों पर झाड़ियां और घने पहाड़ी जंगल पाए जाते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस तरह के ऊंचाई वाले जंगल कई ऐसी प्रजातियों का घर हो सकते हैं, जिनकी अभी तक पहचान नहीं हुई है।

इस खोज में मिजोरम यूनिवर्सिटी, असम डॉन बॉस्को यूनिवर्सिटी, इंडोनेशिया की नेशनल रिसर्च एंड इनोवेशन एजेंसी (ब्रिन) और असम की हेल्प अर्थ संस्था के शोधकर्ता शामिल थे। यह शोध टैप्रोबानिका नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

वैज्ञानिकों ने नई प्रजाति की पहचान के लिए जंगल में दिन और रात दोनों समय लंबे सर्वे किए। उन्होंने जंगल की पगडंडियों और जमीन पर गिरी पत्तियों के बीच रहने वाले इन टोडों का अध्ययन किया। शोध के दौरान पता चला कि ये जीव मुख्य रूप से जमीन पर रहने वाला जीवन जीते हैं।

पहचान के लिए अपनाया गया आधुनिक तरीका

वैज्ञानिकों ने केवल शरीर की बनावट देखकर इस टोड को नई प्रजाति नहीं माना। इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने कई वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल किया। पहले इसके शरीर के आकार, रंग और दूसरे शारीरिक लक्षणों का अध्ययन किया गया। इसके बाद अलग-अलग शारीरिक मापों की तुलना की गई।

इसके साथ ही वैज्ञानिकों ने टोड के डीएनए की भी जांच की। इसके लिए माइटोकॉन्ड्रियल 16एस आरआरएनए जीन का अनुक्रम तैयार किया गया। इस आनुवंशिक जांच से पता चला कि फावंगपुई में मिलने वाली यह आबादी दत्ताफ्रायनस वंश की अन्य प्रजातियों से अलग है।

अध्ययन में पाया गया कि इसके सबसे करीबी रिश्तेदारों से इसकी आनुवंशिक दूरी करीब 3.8 से 5.5 प्रतिशत है। इससे वैज्ञानिकों को इसे एक अलग प्रजाति के रूप में पहचानने का मजबूत आधार मिला।

शरीर पर दिखती है खास पहचान

फावंगपुई टोड का आकार मध्यम है। इसकी लंबाई नाक से शरीर के पिछले हिस्से तक लगभग 47.72 से 56.26 मिलीमीटर दर्ज की गई है। इसका आकार कुछ करीबी प्रजातियों, जैसे दत्ताफ्रीनस चंदाई और दत्ताफ्रीनस स्टुअर्टी, से छोटा है, जबकि दत्ताफ्रीनस धारा से बड़ा है।

इस टोड के शरीर पर ग्रंथियों जैसी उभरी हुई गांठें और गहरे भूरे से काले रंग के अनियमित धब्बे दिखाई देते हैं। इसकी सबसे खास पहचान इसकी पीठ पर बनी एक पतली क्रीम से हल्की पीली रंग की पट्टी है। यह पट्टी मुंह के आगे के हिस्से से शुरू होकर शरीर के पीछे तक जाती है।

इसके कान का पर्दा यानी टिम्पेनम साफ दिखाई नहीं देता। सिर पर भी ज्यादातर उभरी हुई हड्डीदार धारियां नहीं हैं। इसकी उंगलियां पूरी तरह बिना जाल वाली हैं, जबकि पैरों की उंगलियों में सीमित जाल पाया जाता है।

‘ब्लू माउंटेन’ के नाम पर रखा गया नाम

वैज्ञानिकों ने इस नई प्रजाति का नाम उसके खोज स्थल के सम्मान में दत्ताफ्रायनस फावंगपुई रखा है। फावंगपुई को स्थानीय रूप से ‘ब्लू माउंटेन’ यानी नीला पहाड़ कहा जाता है। यह मिजोरम की सबसे ऊंची चोटियों में से एक है और फावंगपुई नेशनल पार्क इसी क्षेत्र में स्थित है।

मिजो भाषा में इसे फावंगपुई उटॉक और लाई भाषा में फावंगपी उटलाक कहा जाएगा।

‘स्काई आइलैंड’ हैं ये पहाड़ी जंगल

वैज्ञानिकों के लिए यह खोज केवल एक नई मेंढक प्रजाति मिलने तक सीमित नहीं है। फावंगपुई जैसे ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्र अलग-अलग जीवों की आबादी को एक-दूसरे से अलग कर देते हैं। ऐसे इलाकों को वैज्ञानिक अक्सर ‘स्काई आइलैंड’ कहते हैं।

लंबे समय तक अलग-थलग रहने के कारण इन क्षेत्रों में जीवों की अलग-अलग प्रजातियां विकसित हो सकती हैं। फावंगपुई टोड की खोज इस बात का संकेत देती है कि दक्षिणी मिजोरम के पहाड़ी जंगलों में अभी भी जैव विविधता के कई रहस्य छिपे हो सकते हैं। यह खोज इन संवेदनशील पहाड़ी पारिस्थितिक तंत्रों के संरक्षण और आगे वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत को भी सामने लाती है।