जलवायु परिवर्तन, आवास का विनाश, रासायनिक उर्वरक, आक्रामक प्रजातियां और प्रदूषण जैसे कारणों से कीटों की आबादी पर गहरा असर पड़ा है। फोटो: आईस्टॉक 
वन्य जीव एवं जैव विविधता

सालाना दो फीसदी की दर से घट रहे कीट, पक्षियों से लेकर मेंढकों तक के जीवन पर बढ़ रहा संकट

नए वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया है कि कीट पक्षियों, सरीसृपों और स्तनधारियों के लिए भोजन से कहीं ज्यादा हैं, वे आश्रय, सुरक्षा, सफाई और यहां तक कि दवा का भी काम करते हैं

Lalit Maurya

  • दुनिया के पारिस्थितिकी तंत्र में कीटों की भूमिका जितनी छोटी दिखाई देती है, उसका असर उतना ही बड़ा है।

  • एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि कीटों की घटती संख्या का असर केवल परागण और फसलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पक्षियों, सरीसृपों, स्तनधारियों और दूसरे कशेरुकी जीवों के अस्तित्व पर भी पड़ सकता है।

  • शोधकर्ताओं के मुताबिक दुनिया में कीटों की संख्या हर साल करीब 1 से 2 फीसदी की दर से घट रही है। वहीं, दुनिया में कीटों की 3 करोड़ तक प्रजातियां होने का अनुमान है।

  • ‘नेचर रिव्यूज बायोडायवर्सिटी’ में प्रकाशित इस समीक्षा में आठ देशों के वैज्ञानिकों ने पिछले कई दशकों के सैकड़ों अध्ययनों का विश्लेषण किया है। अध्ययन के मुताबिक जमीन और मीठे पानी में रहने वाले करीब 75 फीसदी कशेरुकी जीव अकशेरुकी जीवों को खाते हैं, जबकि 40 फीसदी से अधिक पूरी तरह इन पर निर्भर हैं। लेकिन कीटों की भूमिका भोजन तक सीमित नहीं है। वे कई जीवों को आश्रय, सुरक्षा, घोंसले बनाने की सामग्री और सफाई जैसी जरूरी सेवाएं भी देते हैं।

  • चिंपैंजी घावों की सफाई के लिए कीटों का इस्तेमाल करते हैं, कुछ मेंढक चींटियों के घोंसलों में शरण लेते हैं और 200 से अधिक पक्षी प्रजातियां चींटियों का इस्तेमाल शरीर की सफाई के लिए करती हैं।

  • वैज्ञानिकों का कहना है कि कीटों का संरक्षण अब जैव विविधता बचाने की रणनीति का अहम हिस्सा होना चाहिए, क्योंकि कीटों का संकट सिर्फ कीटों का नहीं, बल्कि पूरे जीव-जगत के भविष्य का संकट है।

दुनिया में कीटों को अक्सर नन्हे, मामूली जीव समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अगर ये नन्हे जीव अचानक हमारी प्रकृति से गायब होने लगें तो इसका असर केवल फूलों के परागण या फसलों की पैदावार तक सीमित नहीं रहेगा। जंगलों से लेकर रेगिस्तान तक, कीटों की कमी का असर उन असंख्य जीवों पर पड़ सकता है जिनका जीवन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन पर निर्भर है।

इस बारे में किए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया है कि कीट केवल पक्षियों, चमगादड़ों और दूसरे जीवों के लिए भोजन नहीं हैं, बल्कि वे उन्हें आश्रय, सुरक्षा, सफाई, घोंसले बनाने की सामग्री और यहां तक कि औषधीय मदद भी उपलब्ध कराते हैं।

प्रतिष्ठित जर्नल ‘नेचर रिव्यूज बायोडायवर्सिटी’ में प्रकाशित इस स्टडी में दुनिया के आठ देशों के वैज्ञानिकों ने पिछले कई दशकों में किए सैकड़ों अध्ययनों का विश्लेषण किया है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि कीटों की संख्या में लगातार हो रही कमी आने वाले वर्षों में कई कशेरुकी जीवों के अस्तित्व को प्रभावित कर सकती है।

सिर्फ भोजन नहीं, जीवन का सहारा हैं कीट

कीटों को अक्सर जीव-जगत की ‘छोटी मशीनें’ कहा जाता है, क्योंकि वे पारिस्थितिकी तंत्र को चलाने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन उनका योगदान केवल परागण, जैविक पदार्थों के विघटन या दूसरे जीवों के लिए भोजन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है।

उदाहरण के लिए, चिंपैंजी घावों को साफ करने और संक्रमण से बचने के लिए कुछ कीटों का इस्तेमाल करते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि, कुछ बगुले मछली पकड़ने के लिए कीटों को चारे के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

इसी तरह स्लॉथ यानी सुस्त रहने वाले स्तनधारी जीवों के शरीर पर रहने वाले पतंगों की भी अपनी अहम भूमिका है। ये पतंगे उनके फर में शैवाल के विकास में मदद करते हैं। बाद में स्लॉथ इन्हीं शैवाल को भोजन के रूप में इस्तेमाल करता है। देखा जाए तो प्रकृति में ऐसे संबंधों की लिस्ट लंबी है।

कुछ पक्षी और सरीसृप अपने अंडे दीमक की बांबियों के भीतर रखते हैं, जहां तापमान अपेक्षाकृत नियंत्रित रहता है। रेगिस्तान में कुछ मेंढक चींटियों के घोंसलों में शरण लेते हैं, क्योंकि वहां बाहर की तुलना में अधिक नमी होती है। यानी कीट कई जीवों के लिए केवल भोजन की थाली नहीं, बल्कि घर, सुरक्षा और जीवन को बचाने वाली व्यवस्था भी हैं।

पक्षियों के घोंसले से लेकर सुरक्षा तक में भूमिका

अध्ययन के मुताबिक पक्षी अपने घोंसले बनाने के लिए मकड़ियों और कीटों से मिलने वाले रेशम का इस्तेमाल करते हैं। कुछ पक्षी अपने घोंसले ऐसे डंक मारने वाले कीटों, जैसे ततैयों, के पास बनाते हैं ताकि शिकारी उनसे दूर रहें।

दुनिया में पक्षियों की 200 से अधिक प्रजातियां चींटियों को अपने शरीर की सफाई के लिए इस्तेमाल करती हैं। इसे ‘एंटिंग’ कहा जाता है। माना जाता है कि चींटियों से निकलने वाले रसायन पक्षियों के शरीर पर मौजूद परजीवियों को हटाने में मदद कर सकते हैं। कई जीव अपने प्रजनन का समय भी कीटों की मौसमी उपलब्धता के हिसाब से तय करते हैं।

जब कीटों की संख्या बढ़ती है, तब उनके लिए भोजन की उपलब्धता भी बढ़ती है और कई प्रजातियां इसी समय प्रजनन करती हैं।

कीटों की यह भूमिका आज की नहीं है। वैज्ञानिकों के मुताबिक करोड़ों साल पहले डायनासोर के घोंसलों में भी कीट रहते थे और वहां जमा जैविक अवशेषों को साफ करते थे। आज भी कुछ उल्लुओं और किंगफिशर के घोंसलों में कीट इसी तरह की ‘सफाई से जुड़ी सेवा’ देते हैं।

दुनिया में 3 करोड़ तक हो सकती हैं कीटों की प्रजातियां

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि दुनिया में करीब कीटों की 3 करोड़ तक प्रजातियां हो सकती हैं। ये पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य और उसे सुचारू रूप से चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कीट हमिंगबर्ड से लेकर भालू तक कई तरह के जीवों के लिए भोजन उपलब्ध कराते हैं। वे परागण के जरिए उन पौधों और फलों के अस्तित्व में भी योगदान देते हैं जो आगे चलकर दूसरे जीवों के भोजन का आधार बनते हैं।

इसके अलावा कीटों से मिलने वाले शहद, मोम और दूसरे पदार्थ भी कई जीवों द्वारा खाए या इस्तेमाल किए जाते हैं।

इस तरह किसी एक कीट प्रजाति को होने वाला नुकसान केवल उस प्रजाति तक सीमित नहीं रहता। उसका असर धीरे-धीरे पूरी खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिकी तंत्र में फैल सकता है।

हर साल 1 से 2 फीसदी की दर से घट रहे हैं कीट

वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता कीटों की घटती संख्या को लेकर है। अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता और बिंघमटन यूनिवर्सिटी की जैव विज्ञान विभाग की सहायक प्रोफेसर एलिजा ग्रेम्स के मुताबिक दुनिया में कीटों की संख्या करीब 1 से 2 फीसदी प्रति वर्ष की दर से घट रही है। उनके मुताबिक भले ही साल-दर-साल एक या दो फीसदी की गिरावट छोटी दिखाई दे, लेकिन कुछ दशकों में इसका असर बेहद बड़ा हो सकता है।

ग्रेम्स के मुताबिक जब इस गिरावट को कई दशकों के पैमाने पर देखा जाता है तो यह पारिस्थितिकी तंत्र में बड़े बदलाव का संकेत देती है। उनका कहना है कि अगर जैव विविधता के भविष्य को लेकर चिंता है तो कीट संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल करना होगा।

जर्नल साइंस में छपे एक अन्य अध्ययन में भी सामने आया है कि 1990 के बाद से दुनिया में कीटों की आबादी में करीब 25 फीसदी की गिरावट आई है। इस रिसर्च के मुताबिक दुनिया में दशक करीब 9 फीसदी की दर से कीट कम हो रहे हैं।

कीट खत्म होंगे तो दूसरे कशेरुकी जीव भी प्रभावित होंगे

वैज्ञानिकों के मुताबिक जमीन और मीठे पानी में रहने वाले ऐसे कशेरुकी जीवों, जिनके भोजन से संबंधित आंकड़े उपलब्ध हैं, उनमें से करीब तीन-चौथाई जीव अकशेरुकी जीवों को खाते हैं। इनमें 40 फीसदी से अधिक जीव ऐसे हैं जिनका भोजन पूरी तरह अकशेरुकी जीवों पर निर्भर है। कई मामलों में उनके भोजन में कीटों की हिस्सेदारी सबसे अधिक होती है।

फिर भी अब तक हुए अधिकांश अध्ययनों में कीटों की गिरती संख्या को केवल भोजन की कमी के संदर्भ में देखा गया है। कीटों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सुरक्षा, आश्रय, सफाई और दूसरी पारिस्थितिक सेवाओं पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि कीटों और कशेरुकी जीवों के बीच ऐसे संबंधों से जुड़े शोध अलग-अलग जगह बिखरे हुए हैं। इसलिए इनके महत्व की तुलना करना भी मुश्किल है।

अध्ययन के सह-लेखक और पारिस्थितिकी एवं विकासवादी जीव विज्ञान के प्रोफेसर क्रिस एल्फिक के मुताबिक संरक्षण की रणनीतियां बनाते समय वैज्ञानिकों को कीटों और कशेरुकी जीवों को अलग-अलग देखने के बजाय उनके बीच के रिश्ते को समझना होगा।

उनका कहना है कि अगर हम पक्षियों, सरीसृपों और दूसरे कशेरुकी जीवों को बचाना चाहते हैं तो हमें कीट संरक्षण के बारे में भी सोचना होगा, लेकिन अभी ऐसा पर्याप्त रूप से नहीं किया जा रहा है।

देखा जाए तो हम अक्सर किसी जंगल को पेड़ों, पक्षियों और बड़े जानवरों की तस्वीर से पहचानते हैं। लेकिन उस जंगल की असली जिंदगी इन नन्हे जीवों की अनगिनत गतिविधियों से चलती है। मिट्टी में, पेड़ों की छाल पर, घोंसलों के आसपास और जानवरों के शरीर पर मौजूद ये जीव प्रकृति के ऐसे काम करते हैं जिनका महत्व तब समझ आता है, जब वे गायब होने लगते हैं।

हमें समझना होगा कि कीट छोटे जरूर हैं, लेकिन उनके बिना जीवन की बड़ी तस्वीर अधूरी है। इनका संकट केवल कीटों का संकट नहीं, बल्कि उन सभी जीवों के भविष्य का संकट है जो किसी न किसी रूप में इन नन्हे जीवों पर निर्भर हैं।