चीन के सिचुआन बेसिन से मिले 44.5 करोड़ साल पुराने शेल में 20 से अधिक सूक्ष्म समुद्री जीवाश्म पाए गए। फोटो साभार: रॉयल सोसाइटी ओपन साइंस
वन्य जीव एवं जैव विविधता

नई तकनीक से मिले 44 करोड़ से अधिक साल पुराने विलुप्त हो चुके समुद्री जीव

44.5 करोड़ साल पुराने पत्थर में नई तकनीक से सूक्ष्म जीवाश्मों की खोज ने प्राचीन समुद्री जीवन और बड़े विलुप्ति काल को समझने के नए रास्ते खोले

Dayanidhi

  • नई सिंक्रोट्रॉन माइक्रो-सीटी तकनीक से वैज्ञानिकों ने बिना पत्थर तोड़े उसके अंदर सूक्ष्म जीवाश्मों की त्रि-आयामी संरचना खोजी।

  • चीन के सिचुआन बेसिन से मिले 44.5 करोड़ साल पुराने शेल में 20 से अधिक सूक्ष्म समुद्री जीवाश्म पाए गए।

  • खोजे गए जीवाश्मों में रेडियोलेरियन नामक एककोशिकीय समुद्री जीव शामिल थे, जिनमें एक नई वैज्ञानिक प्रजाति भी पहचानी गई।

  • पारंपरिक एसिड विधि से नष्ट होने वाले नाजुक जीवाश्म अब नई तकनीक से सुरक्षित रूप में अध्ययन किए जा सकते हैं।

  • यह खोज लेट ऑर्डोविसियन मास एक्सटिंक्शन और प्राचीन महासागरों में ऑक्सीजन कमी के प्रभाव समझने में मदद कर सकती है।

हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण खोज की है, जो पृथ्वी के पुराने इतिहास को समझने में मदद कर सकती है। ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड के वैज्ञानिकों ने चीन के सिचुआन बेसिन से लिए गए एक बहुत पुराने पत्थर के अंदर छोटे-छोटे जीवाश्म खोजे हैं। यह पत्थर लगभग 44.5 करोड़ साल पुराना है और समुद्र के नीचे बनी चट्टानों का हिस्सा था।

सूक्ष्म जीवाश्मों की अनोखी खोज

वैज्ञानिकों को इस पत्थर के अंदर 20 से ज्यादा सूक्ष्म जीवाश्म मिले हैं। इनमें से कुछ जीव पहले कभी विज्ञान में नहीं देखे गए थे। खासकर एक नई प्रजाति की पहचान भी हुई है। ये जीव “रेडियोलेरियन” नाम के बहुत छोटे समुद्री जीव थे, जो एक ही कोशिका से बने होते हैं। ये समुद्र में रहते हैं और उनके जीवाश्म वैज्ञानिकों को पुराने समुद्रों के बारे में जानकारी देते हैं।

यह खोज इसलिए भी खास है क्योंकि यह उस समय की है जब पृथ्वी पर “लेट ऑर्डोविसियन” नाम का काल चल रहा था। यह समय पृथ्वी के बड़े विलुप्ति में से एक के लिए जाना जाता है, जब समुद्र में रहने वाले कई जीव खत्म हो गए थे। यह शोध रॉयल सोसाइटी ओपन साइंस में प्रकाशित किया गया है

पारंपरिक तरीके से क्यों नहीं मिलते थे ये जीवाश्म

आमतौर पर वैज्ञानिक जीवाश्म खोजने के लिए चट्टानों को तेज एसिड से घोल देते हैं। लेकिन इस तरीके में बहुत नाजुक जीवाश्म भी नष्ट हो जाते हैं। इसलिए पहले रेडियोलेरियन जैसे सूक्ष्म जीवों को ठीक से देखना मुश्किल था।

इसी समस्या को हल करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक का उपयोग किया। उन्होंने एक बहुत छोटे पत्थर के टुकड़े को लिया, जो चावल के दाने से भी छोटा था, और उसे एक खास मशीन में स्कैन किया।

नई तकनीक से मिली अंदर की तस्वीर

इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने सिंक्रोट्रॉन आधारित माइक्रो-सीटी स्कैनिंग तकनीक का इस्तेमाल किया। यह एक बहुत शक्तिशाली एक्स-रे मशीन होती है, जो किसी भी चीज के अंदर की 3डी तस्वीर बना सकती है।

इस स्कैन से पता चला कि जीवों के असली शरीर तो समय के साथ खत्म हो गए थे, लेकिन उनके आकार का एक खाली ढांचा पत्थर के अंदर रह गया था। बाद में यह खाली ढांचा प्राकृतिक पदार्थों और बिटुमिन (प्राकृतिक डामर जैसे पदार्थ) से भर गया, जिससे उनके शरीर का आकार सुरक्षित रह गया।

छिपे हुए समुद्री जीवन का नया रिकॉर्ड

इस तकनीक की मदद से वैज्ञानिकों ने आठ अलग-अलग प्रकार के रेडियोलेरियन जीवों की पहचान की। इनमें से एक पूरी तरह नई प्रजाति थी, जो पहले कभी नहीं देखी गई थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसी चट्टानों में अभी बहुत सारे अनदेखे जीवाश्म छिपे हो सकते हैं।

दुनिया भर में ऐसी काली शेल चट्टानें मौजूद हैं, जो प्राचीन समुद्रों से बनी हैं। इसलिए यह तकनीक भविष्य में कई नई खोजों का रास्ता खोल सकती है।

प्राचीन जलवायु और विलुप्ति को समझने में मदद

ये जीवाश्म उस समय के हैं जब पृथ्वी के महासागर धीरे-धीरे ऑक्सीजन खो रहे थे। इसी कारण कई समुद्री जीव जीवित नहीं रह पाए और बड़े पैमाने पर विलुप्ति हुई। इन जीवाश्मों का अध्ययन करके वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि कौन से जीव इस कठिन समय में बच पाए और कैसे समुद्री जीवन ने पर्यावरणीय बदलावों का सामना किया।

भविष्य की संभावनाएं

वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर इस तकनीक का उपयोग बड़े स्तर पर किया जाए, तो लंबी चट्टानों के कोर को स्कैन करके और भी बहुत सारे छुपे हुए जीवाश्म खोजे जा सकते हैं। यह पृथ्वी के इतिहास को समझने में एक नया अध्याय जोड़ सकता है।

यह खोज दिखाती है कि पृथ्वी के अंदर अभी भी बहुत कुछ छिपा हुआ है। नई तकनीक की मदद से हम उन जीवों को भी देख सकते हैं जो लाखों साल पहले समुद्र में रहते थे। इससे हमें न केवल अतीत को समझने में मदद मिलती है, बल्कि यह भी पता चलता है कि बदलते पर्यावरण में जीवन कैसे प्रतिक्रिया देता है।