धरती का पारंपरिक मौसम चक्र तेजी से बदल रहा है और गर्मियां अब पहले से कहीं अधिक जल्दी आकर ज्यादा समय तक टिकने लगी हैं।
वैज्ञानिकों ने चेताया है कि जलवायु संकट के बीच गर्मियां अब पहले से कहीं जल्दी दस्तक देने लगी हैं, ज्यादा लम्बे समय तक टिक रही हैं और तपिश पहले से कहीं ज्यादा होती जा रही हैं।
ऐसे में बढ़ती तपिश और अचानक बदलते मौसम का असर केवल तापमान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव खेती, जल संसाधनों, स्वास्थ्य, ऊर्जा मांग, जैव विविधता और शहरों की बुनियादी व्यवस्थाओं तक महसूस किया जाएगा।
मौसम का वह संतुलन, जिस पर हमारी जीवनशैली और योजनाएं टिकी रही हैं, अब कमजोर पड़ता दिख रहा है। ऐसे में अगर यही रुझान जारी रही, तो आने वाले वर्षों में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि कितनी गर्मी पड़ेगी, बल्कि यह होगा कि क्या हमारे शहर, हमारे खेत, हमारी जल व्यवस्था और हमारी जीवनशैली इस नई, लंबी और आक्रामक गर्मी का सामना करने के लिए तैयार है।
कभी जून में दस्तक देने वाली गर्मी अब अप्रैल-मई में ही शहरों को झुलसाने लगी है। मौसम का पारंपरिक कैलेंडर तेजी से बदल रहा है और वैज्ञानिकों की नई चेतावनी बताती है कि जलवायु संकट के बीच गर्मियां अब पहले से कहीं जल्दी दस्तक देने लगी हैं, ज्यादा लम्बे समय तक टिक रही हैं और तपिश पहले से कहीं ज्यादा होती जा रही हैं। यह इस बात का सबूत है धरती के मौसम का पारंपरिक चक्र तेजी से बदल रहा है।
इस बारे में यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए नए अध्ययन से पता चला है कि 1990 से 2023 के बीच दुनिया के कई हिस्सों में गर्मियां हर दशक औसतन छह दिन लंबी हुई हैं, जबकि पहले यह अनुमान करीब चार दिन प्रति दशक का था।
यह रफ्तार वैज्ञानिकों के पिछले अनुमानों से करीब 50 फीसदी अधिक है। यानी धरती पर सिर्फ गर्मी नहीं बढ़ रही, उसका मौसम भी पहले के मुकाबले तेजी से लम्बा हो रहा है।
कई शहरों में तेजी से बढ़ रही गर्मी
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कुछ शहरों में तो यह बदलाव और भी ज्यादा चौंकाने वाला है। उदाहरण के लिए सिडनी में जहां 1990 में गर्मियां करीब 80 दिन रहती थी, वो अवधि अब बढ़कर 130 दिनों पर पहुंच गई है, यानी वहां हर दशक गर्मियों में करीब 15 दिन की बढ़ोतरी हुई है। इसी तरह टोरंटो में भी गर्मियां हर दशक करीब आठ दिन लम्बी हुई हैं।
इसी तरह कई शहरों में मौसम का पारंपरिक कैलेंडर अब बेअसर होता जा रहा है, क्योंकि जून का इंतजार किए बिना ही गर्मियां दस्तक देने लगी हैं। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल एनवायर्नमेंटल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित हुए हैं।
अपने इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 1961 से 2023 के बीच दोनों गोलार्धों के भूमि, महासागर और तटीय क्षेत्रों के तापमान के आंकड़ों का विश्लेषण किया है। साथ ही उन्होंने दुनिया के 10 प्रमुख शहरों में मौसम और तापमान के बदलते रुझानों का भी अध्ययन किया है।
बदल रहा मौसम के बदलने का तरीका
अध्ययन में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि अब मौसम धीरे-धीरे नहीं बदल रहा। वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है कि पहले वसंत से गर्मी और गर्मी से सर्दियों का आगमन जो धीरे-धीरे होता था वो अब पहले की तुलना में अचानक से हो रहा है। यानी तापमान धीरे-धीरे बढ़ने के बजाय अब गर्मी एकाएक दस्तक दे रही है।
विशेषज्ञों के मुताबिक यह बदलाव उन प्राकृतिक और मानवीय प्रणालियों को प्रभावित कर सकता है जो मौसम के तय चक्र पर निर्भर हैं। इसका असर खेतों से लेकर जंगलों और शहरों तक हर जगह दिखेगा।
इसकी वजह से फूल परागण करने वाले कीटों के सक्रिय होने से पहले खिल सकते हैं। किसान मौसम के पारंपरिक चक्र के आधार पर खेती की योजना नहीं बना पाएंगे और वसंत में बर्फ के तेजी से पिघलने के कारण बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। इतना ही नहीं इससे बिजली और पानी की मांग भी बढ़ सकती है। साथ ही स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ जाएगा।
कृषि से स्वास्थ्य तक सब पर पड़ेगा असर
इस बारे में अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता टेड स्कॉट का कहना है, “यह बदलाव मौसम के सामान्य चक्र को चुनौती दे रहा है। गर्मी कब आती है और कितनी तेजी से आती है, इसका असर प्रकृति, कृषि और मानव समाज सभी पर पड़ता है।“
स्कॉट ने चेताया है कि ये बदलाव कई व्यवस्थाओं के लिए गंभीर व्यवधान पैदा कर सकते हैं। उदाहरण के लिए उत्तरी गोलार्ध में जून को गर्मी की शुरुआत मानकर योजनाएं और नीतियां बनाई जाती रही हैं, ऐसे में समय से पहले आने वाली गर्मी के लिए समाज और व्यवस्थाएं पर्याप्त रूप से तैयार नहीं हो सकतीं।
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि सिर्फ गर्मियों की अवधि ही नहीं बढ़ रही, बल्कि उस दौरान जमा होने वाली कुल गर्मी भी खतरनाक रफ्तार से बढ़ रही है। उत्तरी गोलार्ध में 1990 के बाद गर्मियों की कुल ऊष्मा पहले की तुलना में तीन गुणा अधिक तेजी से बढ़ रही है। इसका मतलब है कि धरती सिर्फ ज्यादा दिनों तक गर्म नहीं रह रही, बल्कि इसके साथ ही गर्मी की तपिश भी बढ़ रही है।
क्या बदलाव के लिए तैयार हैं हम
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि उत्तरी गोलार्ध के तटीय इलाकों में गर्मियों की अवधि और जमा होती गर्मी सबसे तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में इसका असर उन लाखों लोगों पर पड़ सकता है जिन्होंने अपेक्षाकृत संतुलित मौसम की वजह से इन क्षेत्रों को रहने के लिए चुना था।
भारत में भी इस विषय पर किए अध्ययन से पता चला है कि देश में बसंत का मौसम जैसे गायब सा हो गया है। सर्दियों के बाद सीधे गर्मियां, मौसम में बड़े बदलाव की ओर इशारा करती हैं। तापमान में बहुत तेजी से उतार-चढ़ाव आ रहा है। इसके चलते मौसम बहुत जल्द सर्दियों से गर्मियों में बदल रहा है। यह प्रभाव सर्दी के मौसम पर विशेष रूप से दिख रहा है। देश में कहीं सर्दी के दौरान तापमान बढ़ रहा है, तो कहीं कम हो रहा है।
देखा जाए तो यह अध्ययन उस अनुभव को वैज्ञानिक आधार देता है जिसे दुनिया भर के लोग अब महसूस करने लगे हैं। आम लोगों को भी लगने लगा है कि मौसम का तालमेल अब बिगड़ चुका है। मतलब जो कभी अपवाद लगता था, वह अब मौजूदा समय में आम होता जा रहा है।
ऐसे में अगर यही रुझान जारी रही, तो आने वाले वर्षों में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि कितनी गर्मी पड़ेगी, बल्कि यह होगा कि क्या हमारे शहर, हमारे खेत, हमारी जल व्यवस्था और हमारी जीवनशैली इस नई, लंबी और आक्रामक गर्मी का सामना करने के लिए तैयार है।