छत्तीसगढ़ की राजा रानी झील की मिट्टी में सुरक्षित परागकणों से मध्यकाल में अत्यंत मजबूत भारतीय मानसून के प्रमाण मिले।
वैज्ञानिकों ने 40 सेंटीमीटर लंबे तलछट कोर का अध्ययन कर पिछले 2500 सालों की जलवायु जानकारी हासिल की।
1060 से 1725 ईस्वी के बीच घने उष्णकटिबंधीय वनों की मौजूदगी मजबूत बारिश और नमी भरी जलवायु दर्शाती है।
अध्ययन में मध्यकाल के दौरान कोर मानसून क्षेत्र में किसी भी बड़े सूखे के संकेत नहीं पाए गए।
ला नीना परिस्थितियां, आईटीसीजेड का उत्तर की ओर खिसकना और अधिक सौर सक्रियता मजबूत मानसून के प्रमुख कारण रहे।
भारत में मानसून का बहुत बड़ा महत्व है। देश की खेती, जंगल, नदियां और आम लोगों का जीवन मानसून पर निर्भर करता है। भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून भारत की कुल बारिश का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा देता है। इसलिए मानसून में होने वाले छोटे बदलाव भी देश के पर्यावरण और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक शोध में पाया है कि लगभग एक हजार साल पहले भारत में मानसून आज की तुलना में कहीं अधिक मजबूत था।
राजा रानी झील और शोध स्थल
यह महत्वपूर्ण शोध छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में स्थित राजा रानी झील में किया गया। यह झील भारत के कोर मानसून क्षेत्र में आती है। यह क्षेत्र इसलिए खास है क्योंकि यहां मानसून की सक्रियता सबसे अधिक रहती है। इस अध्ययन को लखनऊ स्थित बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पेलियोसाइंसेज (बीएसआईपी) के वैज्ञानिकों ने किया।
झील की मिट्टी में छिपा इतिहास
वैज्ञानिकों ने झील की तलहटी से लगभग 40 सेंटीमीटर लंबा मिट्टी का कोर निकाला। इस मिट्टी की परतों में पिछले 2500 वर्षों का प्राकृतिक इतिहास सुरक्षित था। हर परत अलग-अलग समय की कहानी बताती है। इन परतों में बहुत छोटे-छोटे परागकण पाए गए, जो प्राचीन समय में आसपास उगने वाले पेड़-पौधों से आए थे।
परागकणों से कैसे पता चलता है मौसम
परागकणों के अध्ययन को पैलिनोलॉजी कहा जाता है। परागकण यह बताते हैं कि किसी समय विशेष में कौन-सी वनस्पतियां मौजूद थीं। अगर जंगलों के पेड़ों के परागकण ज्यादा मिलते हैं, तो इसका मतलब होता है कि उस समय मौसम गर्म और नम था। वहीं घास और झाड़ियों के परागकण सूखे मौसम की ओर संकेत करते हैं। इस तरह वैज्ञानिक पुराने समय की जलवायु को समझ पाते हैं।
मध्यकाल में बहुत मजबूत मानसून
शोध में यह सामने आया कि 1060 से 1725 ईस्वी के बीच, जिसे मध्यकालीन जलवायु विसंगति कहा जाता है, इस क्षेत्र में मानसून बहुत मजबूत था। उस समय नम और शुष्क उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों का विस्तार था। इसका मतलब है कि अच्छी बारिश होती थी और मौसम गर्म व आर्द्र था। खास बात यह रही कि इस पूरे काल में कोर मानसून क्षेत्र में सूखे के कोई बड़े प्रमाण नहीं मिले।
मजबूत मानसून के पीछे कारण
वैज्ञानिकों के अनुसार उस समय मानसून के मजबूत होने के पीछे कई कारण थे। इनमें ला नीना जैसी स्थितियां, जो भारत में अधिक बारिश लाती हैं, प्रमुख थीं। इसके अलावा अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र का उत्तर की ओर खिसकना भी एक कारण था। साथ ही उस समय सूर्य की सक्रियता अधिक थी और सनस्पॉट्स की संख्या भी ज्यादा थी, जिससे पृथ्वी का तापमान बढ़ा और मानसून मजबूत हुआ।
आज के समय में शोध का महत्व
यह शोध आज के समय में बहुत उपयोगी है, जब जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती बन चुका है। यह अध्ययन बताता है कि गर्म जलवायु में मानसून हमेशा कमजोर नहीं होता, बल्कि कई बार और ज्यादा शक्तिशाली भी हो सकता है। इससे वैज्ञानिकों को वर्तमान मानसून को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है।
भविष्य की योजना और नीति निर्माण
प्राचीन जलवायु से जुड़ा यह ज्ञान भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण है। इससे वैज्ञानिक भविष्य के मानसून और बारिश का पैटर्न का अनुमान लगा सकते हैं। यह जानकारी खेती, जल संसाधन प्रबंधन और आपदा प्रबंधन की योजना बनाने में सहायक हो सकती है। सही वैज्ञानिक समझ के आधार पर नीतियां बनाई जाएं तो समाज को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बेहतर तरीके से बचाया जा सकता है।
राजा रानी झील में सुरक्षित प्राचीन परागकणों ने भारत के मानसून इतिहास की एक महत्वपूर्ण कहानी उजागर की है। यह कहानी बताती है कि अतीत में भारत ने बहुत मजबूत मानसून का अनुभव किया है। इससे हमें न केवल अपने अतीत को समझने में मदद मिलती है, बल्कि भविष्य की चुनौतियों से निपटने का रास्ता भी दिखता है।