देश की आर्द्रभूमियों और दूसरे जलस्रोतों के संरक्षण में राज्यों की देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है।
12 अक्टूबर, 2026 को दिए आदेश में अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चार महीने के भीतर आर्द्रभूमियों की जमीनी पड़ताल पूरी करने का निर्देश दिया है। साथ ही, चार सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल कर अब तक हुई प्रगति का ब्योरा देने को कहा है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सर्वे में केवल बड़ी आर्द्रभूमियां ही नहीं, बल्कि छोटे तालाबों और दूसरे जलस्रोतों को भी शामिल कर उनकी पहचान और नक्शे पर चिह्नित करना होगा।
वेटलैंड एटलस के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 2.25 हेक्टेयर से छोटी करीब 5,55,557 आर्द्रभूमियां हैं। इन छोटे जलक्षेत्रों के संरक्षण के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी भी राज्यों को देनी होगी।
आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत जरूरी दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया नौ साल बाद भी पूरी नहीं होने पर अदालत ने चिंता जताई। इस मामले में पहले भी कई बार निर्देश दिए जा चुके हैं।
आर्द्रभूमियां बारिश का पानी सहेजने, भूजल रिचार्ज करने, बाढ़ का खतरा घटाने और जैव विविधता को बचाने में अहम भूमिका निभाती हैं। ऐसे में इनकी पहचान में देरी केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि जल सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है।
देश की आर्द्रभूमियों यानी वेटलैंड्स और दूसरे जलस्रोतों को बचाने की दिशा में राज्यों की धीमी कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है।
अदालत ने निर्देश दिया है कि आर्द्रभूमियों की जमीनी पड़ताल (ग्राउंड ट्रुथिंग) का काम तेजी से पूरा किया जाए। इसके लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चार महीने का समय दिया गया है। यह प्रक्रिया आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत पूरी की जानी है।
12 अक्टूबर, 2026 को दिए अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमीनी पड़ताल का दायरा केवल अधिसूचित या चिह्नित आर्द्रभूमियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसमें दूसरे जलस्रोतों को भी शामिल किया जाए। राज्यों को अपनी रिपोर्ट में इन सभी जलस्रोतों की पहचान कर उनका स्पष्ट उल्लेख करना होगा और उन्हें नक्शे पर चिह्नित करना होगा।
अदालत ने 19 अगस्त, 2025 के अपने आदेश का भी हवाला दिया। उसमें कहा गया था कि 2.25 हेक्टेयर से छोटे आर्द्रभूमि क्षेत्रों की भी मौजूदा नियमों के अनुसार पहचान की जानी जरूरी है। साथ ही, राज्य सरकारों और आर्द्रभूमि प्राधिकरणों को यह बताना होगा कि इन जलक्षेत्रों को बचाने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं या उठाए जा रहे हैं।
वेटलैंड एटलस के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए अदालत ने बताया था कि देश में 2.25 हेक्टेयर से छोटी ऐसी आर्द्रभूमियों की संख्या करीब 5,55,557 है। ये छोटे जलक्षेत्र आकार में भले ही मामूली दिखें, लेकिन स्थानीय जल व्यवस्था और पारिस्थितिकी के लिए इनकी अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने आर्द्रभूमि नियम, 2017 के नियम 7(1)(क) का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके तहत राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के संबंधित विभागों को नियम प्रकाशित होने के एक साल के भीतर अधिसूचना के लिए पहचानी गई प्रत्येक आर्द्रभूमि का विस्तृत विवरण तैयार करना था।
इस दस्तावेज में नियम के तहत निर्धारित जरूरी जानकारियां शामिल होनी चाहिए थीं।
लेकिन अदालत ने पाया कि यह प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हुई है। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट को 11 दिसंबर, 2024; 19 अगस्त, 2025; 7 अक्टूबर, 2025; 28 अक्टूबर, 2025 और 28 जुलाई, 2026 को लगातार निर्देश जारी करने पड़े।
अदालत ने इस देरी पर ध्यान दिलाते हुए कहा कि नियमों के प्रकाशन के नौ साल बाद भी यह काम पूरा नहीं हो सका है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चार महीने के भीतर जमीनी पड़ताल पूरी करने का निर्देश दिया है। साथ ही, उन्हें चार सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल कर यह बताना होगा कि आर्द्रभूमियों और दूसरे जलस्रोतों की पहचान का काम कहां तक पहुंचा है।
समझना होगा कि आर्द्रभूमियां केवल पानी से भरे भूखंड नहीं हैं। वे बारिश के पानी को सहेजने, भूजल के पुनर्भरण, बाढ़ के प्रभाव को कम करने और पक्षियों तथा दूसरे जीवों को आश्रय देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। छोटे तालाबों और स्थानीय जलस्रोतों का मिटना अक्सर आसपास के समुदायों की जल सुरक्षा और आजीविका को भी प्रभावित करता है।
ऐसे में अदालत का यह निर्देश केवल सरकारी सर्वे को पूरा करने तक सीमित नहीं है। इसकी असली कसौटी यह होगी कि वर्षों से उपेक्षित जलक्षेत्रों की पहचान के बाद उन्हें संरक्षण मिल पाता है या नहीं। क्योंकि किसी जलस्रोत को बचाने की पहली शर्त है, उसका अस्तित्व सरकारी रिकॉर्ड और जमीन, दोनों पर स्वीकार किया जाए।