प्रदूषित पानी को साफ करने के लिए अब महंगे संयंत्रों के साथ-साथ प्रकृति की ताकत का भी सहारा लिया जा सकता है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने अरबी के पौधों की जड़ों, बजरी और पानी के बहाव की विशेष व्यवस्था से ऐसी तकनीक विकसित की है, जो सुअर पालन से निकलने वाले गंदे पानी में प्रदूषण और हानिकारक सूक्ष्मजीवों को कम करने में मदद कर सकती है।
अध्ययन में इस प्रणाली से टोटल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा करीब 60,000 से घटकर 1,200 और ई कोलाई का स्तर 2,200 से घटकर 350 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर रह गया। साथ ही, उपचार के बाद पानी के संभावित विषैले प्रभावों में भी उल्लेखनीय कमी देखी गई।
इस तकनीक की खासियत है कि यह कम ऊर्जा में काम कर सकती है और इसमें पौधों तथा सूक्ष्मजीवों की प्राकृतिक सफाई क्षमता का इस्तेमाल होता है।
इससे छोटे और मध्यम आकार के पशुपालन केंद्रों, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, अपशिष्ट जल उपचार का एक किफायती विकल्प विकसित होने की उम्मीद है।
हालांकि, उपचारित पानी को सिंचाई या अन्य कामों में इस्तेमाल करने से पहले उसकी सुरक्षा की जांच जरूरी है। बड़े स्तर पर उपयोग से पहले इस तकनीक की लागत, प्रभावशीलता और दीर्घकालिक सुरक्षा को वास्तविक परिस्थितियों में परखना भी आवश्यक होगा।
सुअर पालन से निकलने वाला गंदा पानी अगर बिना उपचार के नदियों, झीलों और खेतों तक पहुंच जाए, तो यह जल स्रोतों और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। इस पानी में जैविक प्रदूषकों, पोषक तत्वों और हानिकारक सूक्ष्मजीवों की भरमार हो सकती है। लेकिन अब इस चुनौती से निपटने के लिए प्रकृति की मदद ली जा सकती है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने अरबी के पौधे, बजरी और पानी के बहाव की विशेष व्यवस्था से ऐसी तकनीक विकसित की है, जो कम ऊर्जा में इस प्रदूषित पानी को साफ करने में मदद कर सकती है।
यह तकनीक खास तौर पर छोटे और मध्यम आकार के सुअर पालन केंद्रों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। ग्रामीण इलाकों में, जहां बड़े और महंगे अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र लगाना मुश्किल होता है, वहां इसका इस्तेमाल एक व्यावहारिक विकल्प बन सकता है।
पौधों और सूक्ष्मजीवों की मदद से साफ होगा पानी
यह अध्ययन आईआईटी गुवाहाटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के वेस्ट मैनेजमेंट रिसर्च ग्रुप द्वारा किया गया है। इसमें अरबी (कोलोकेशिया एस्कुलेंटा) के पौधों और विशेष रूप से तैयार की गई कृत्रिम आर्द्रभूमि प्रणाली का इस्तेमाल किया गया।
इस प्रणाली में पानी को सीधे एक दिशा में बहने देने के बजाय, अंदर बनी अवरोधक पट्टियों की मदद से टेढ़े-मेढ़े रास्ते से गुजारा जाता है।
इस विशेष बनावट के कारण पानी उपचार प्रणाली के भीतर अधिक समय तक रहता है। इससे उसे पौधों की जड़ों, बजरी और उपयोगी सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आने का ज्यादा मौका मिलता है। ये सूक्ष्मजीव और पौधों की जड़ें मिलकर पानी में मौजूद प्रदूषकों को कम करने में मदद करते हैं। पानी के बहाव के दौरान ऑक्सीजन की उपलब्धता में होने वाले बदलाव भी जैविक उपचार की अलग-अलग प्रक्रियाओं को बढ़ावा देते हैं।
हानिकारक सूक्ष्मजीवों में आई उल्लेखनीय कमी
शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस प्रणाली से पानी में मौजूद जैविक प्रदूषण, पोषक तत्वों, बारीक ठोस कणों, धातुओं और हानिकारक सूक्ष्मजीवों को कम करने में सफलता मिली। इसकी मदद से पानी में मौजूद टोटल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा करीब 60,000 से घटकर 1,200 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर रह गई।
वहीं, ई कोलाई का स्तर करीब 2,200 से घटकर 350 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर पर आ गया। बता दें कि एमपीएन सूक्ष्मजीवों की संख्या का अनुमान लगाने की एक मानक विधि है।
इस दौरान अरबी के पौधों की वृद्धि भी अच्छी रही। अध्ययन में उनके तने की लंबाई लगभग दोगुनी हो गई, जबकि पौधों का कुल जैवभार चार गुने से भी अधिक बढ़ गया। इससे पता चलता है कि उपचार प्रणाली में पौधे न केवल प्रदूषित पानी के संपर्क में बने रहे, बल्कि अच्छी तरह से विकसित भी हुए।
हालांकि, सूक्ष्मजीवों की संख्या में कमी आने का अर्थ यह नहीं है कि उपचार के बाद यह पानी पूरी तरह रोगाणुमुक्त हो गया। इसका सुरक्षित इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए पानी की गुणवत्ता और संभावित स्वास्थ्य जोखिमों की आगे भी जांच जरूरी है।
इस अध्ययन की एक खास बात यह रही कि वैज्ञानिकों ने केवल पानी में प्रदूषकों की मात्रा नहीं मापी, बल्कि यह भी जांचा कि उपचार के बाद पानी जीवित कोशिकाओं और पौधों के लिए कितना नुकसानदेह रह जाता है।
इसके लिए शोधकर्ताओं ने पानी की सामान्य गुणवत्ता जांच के साथ प्याज पर आधारित जैविक परीक्षण का इस्तेमाल किया। इस परीक्षण से पानी के संभावित विषैले प्रभावों, खासकर कोशिकाओं और पौधों को होने वाले नुकसान, का आकलन किया गया।
अध्ययन में उपचार के बाद पानी के पौधों और कोशिकाओं पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभावों में उल्लेखनीय कमी देखी गई। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी पानी में प्रदूषकों की मात्रा घट जाना ही उसकी सुरक्षा की पूरी गारंटी नहीं होता। यह जानना भी जरूरी है कि उपचार के बाद उसका जीवित प्राणियों पर क्या असर पड़ता है।
आईआईटी गुवाहाटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अजय एस कलामधड़ के मुताबिक, शोध दल का उद्देश्य केवल प्रदूषण के संकेतकों को कम करना नहीं था, बल्कि अपशिष्ट जल को पर्यावरण के लिए जैविक रूप से अधिक सुरक्षित बनाना भी था।
उन्होंने बताया कि पानी के बहाव को विशेष ढंग से नियंत्रित करके और पौधों तथा सूक्ष्मजीवों की प्राकृतिक सफाई क्षमता का इस्तेमाल करके एक छोटी और ऊर्जा-कुशल प्रणाली विकसित की गई है। इसे विकेंद्रीकृत सुअर पालन केंद्रों की जरूरतों के अनुसार ढाला जा सकता है।
इस तकनीक की खासियत यह है कि इसमें ऊर्जा की जरूरत कम है और रखरखाव भी अपेक्षाकृत आसान होता है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पौधों और बजरी जैसे पदार्थों का इस्तेमाल इसे ग्रामीण क्षेत्रों के लिए उपयोगी बनाता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस प्रणाली से साफ किए पानी का इस्तेमाल कुछ गैर-पेय जरूरतों, जैसे नियंत्रित सिंचाई, के लिए किए जाने की संभावना है। लेकिन इसके लिए पानी की गुणवत्ता की अतिरिक्त जांच, खेतों और फसलों पर संभावित प्रभावों का आकलन तथा संबंधित मानकों का पालन जरूरी होगा।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ एनवायरमेंटल मैनेजमेंट में प्रकाशित हुए हैं। यह शोध इस बात का सबूत है कि प्राकृतिक प्रक्रियाओं और इंजीनियरिंग के मेल से दूषित पानी के उपचार के नए रास्ते तलाशे जा सकते हैं।
हालांकि, अभी इस तकनीक को बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने से पहले लंबी अवधि तक वास्तविक परिस्थितियों में इसकी प्रभावशीलता, लागत, रखरखाव और उपचारित पानी की सुरक्षा की जांच करना जरूरी है। ऐसे में शोधकर्ताओं का अगला लक्ष्य प्रयोगशाला में विकसित इस प्रणाली को बड़े स्तर पर ले जाकर क्षेत्रीय परिस्थितियों में इसकी पुष्टि करना है।
यदि आगे के परीक्षणों में भी इसके नतीजे उत्साहजनक रहते हैं, तो यह तकनीक उन ग्रामीण और दूरदराज के पशुपालन केंद्रों के लिए मददगार हो सकती है, जहां केंद्रीकृत अपशिष्ट जल उपचार की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
इससे प्रदूषित पानी को सीधे प्राकृतिक जल स्रोतों में जाने से रोकने और जल प्रदूषण का दबाव कम करने की दिशा में एक उपयोगी विकल्प मिल सकता है।