वैज्ञानिकों ने जंगली केले कैलकटा 4 में फ्यूजेरियम विल्ट रेस 4 के खिलाफ प्राकृतिक आनुवंशिक प्रतिरोध खोजा।
यह खतरनाक फफूंद मिट्टी में सालों तक जीवित रहती है और केले के पौधों को सुखाकर पूरी फसल नष्ट करती है।
शोधकर्ताओं ने प्रतिरोधी जीन को क्रोमोसोम 5 पर चिन्हित किया, जो भविष्य की प्रजनन योजनाओं में मदद करेगा।
पांच सालों तक पौधों की पीढ़ियां उगाकर डीएनए तुलना से बीमारी सहनशील और कमजोर पौधों की पहचान की गई।
लक्ष्य स्वादिष्ट, व्यावसायिक और रोग-प्रतिरोधी नई केले की किस्में विकसित कर किसानों को स्थायी समाधान देना है।
केला दुनिया के सबसे लोकप्रिय फलों में से एक है। यह स्वादिष्ट होता है, सस्ता होता है और हर जगह आसानी से मिल जाता है। लेकिन आज केला एक बड़ी बीमारी से खतरे में है। वैज्ञानिकों ने अब एक जंगली केले में ऐसा खास जीन खोजा है जो इस बीमारी से लड़ सकता है। यह खोज बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
यह शोध क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने किया है। उनका मानना है कि यह खोज भविष्य में केले की फसलों को बचाने में मदद कर सकती है।
पनामा रोग क्या है?
केले को जो बीमारी नुकसान पहुंचा रही है, उसे फ्यूजेरियम विल्ट या पनामा रोग कहा जाता है। यह एक फफूंद (फंगस) से फैलने वाली बीमारी है। यह फफूंद मिट्टी में रहती है और केले के पौधों की जड़ों पर हमला करती है।
जब पौधा संक्रमित हो जाता है, तो उसकी पत्तियां पीली पड़ जाती हैं। धीरे-धीरे पौधा सूख जाता है और मर जाता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह फफूंद मिट्टी में कई सालों तक जिंदा रह सकती है। अगर एक खेत में यह बीमारी आ जाए, तो वहां लंबे समय तक केले उगाना मुश्किल हो जाता है।
रेस 4 का खतरा
पनामा रोग की कई किस्में होती हैं। इनमें से रेस 4 सबसे खतरनाक मानी जाती है। इसका एक रूप सब-ट्रॉपिकल रेस 4 (एसटीआर4) है। यह उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में फसलों को नुकसान पहुंचाता है।
ट्रॉपिकल रेस 4 (टीआ4) नाम का दूसरा रूप भी बहुत खतरनाक है। यह कई देशों में फैल चुका है, जिनमें ऑस्ट्रेलिया भी शामिल है। यह बीमारी खासकर कैवेंडिश केले की फसल को नुकसान पहुंचाती है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा उगाया और बेचा जाता है।
जंगली केला “कैलकटा 4”
वैज्ञानिकों ने एक जंगली केले की किस्म में इस बीमारी के खिलाफ प्राकृतिक ताकत पाई। इस जंगली केले का नाम “कैलकटा 4” है। यह एक जंगली और बीज वाला केला है।
शोधकर्ताओं ने कैलकटा 4 को दूसरे कमजोर केले के पौधों के साथ मिलाया। फिर उन्होंने नई पीढ़ी के पौधों को उगाया। जब पौधे बड़े हुए, तो उन्हें एसटीआर4 फफूंद के संपर्क में लाया गया।
कुछ पौधे बीमार हो गए, लेकिन कुछ स्वस्थ रहे। वैज्ञानिकों ने दोनों तरह के पौधों का डीएनए जांचा। जांच में पता चला कि बीमारी से बचाने वाला गुण क्रोमोसोम 5 में मौजूद है।
यह खोज बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। पहली बार रेस 4 के खिलाफ जीन की सही जगह का पता चला है।
पांच साल की मेहनत
हॉर्टिकल्चर रिसर्च में प्रकाशित शोध में कहा गया है कि यह एक-दो महीने में नहीं हुआ। इसमें पूरे पांच साल लगे। केले का पौधा जल्दी फल नहीं देता। हर नई पीढ़ी को बड़ा होने में लगभग 12 महीने लगते हैं।
वैज्ञानिकों ने कई बार पौधों को उगाया, उनकी जांच की और फिर अगली पीढ़ी तैयार की। उन्होंने आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया, जैसे जीन की जांच और डीएनए की तुलना। लगातार मेहनत के बाद उन्हें सफलता मिली।
कैलकटा 4 को सीधे क्यों नहीं उगाया जा सकता?
अब सवाल यह है कि जब कैलकटा 4 में बीमारी से लड़ने की ताकत है, तो उसे ही क्यों न उगाया जाए?
समस्या यह है कि कैलकटा 4 का फल खाने लायक नहीं है। उसका स्वाद अच्छा नहीं होता और वह बाजार के लिए सही नहीं है। इसलिए किसान उसे सीधे नहीं उगा सकते।
वैज्ञानिकों का लक्ष्य यह है कि वे इस अच्छे जीन को स्वादिष्ट और बाजार में बिकने वाले केले में शामिल करें।
आगे क्या होगा?
अब वैज्ञानिक ऐसे खास संकेत (मॉलिक्यूलर मार्कर) बनाना चाहते हैं, जिनसे यह पता चल सके कि कौन सा पौधा बीमारी के खिलाफ मजबूत है। इससे पौधों को शुरू में ही पहचानना आसान होगा।
इससे समय और पैसा दोनों बचेंगे। किसान जल्दी मजबूत पौधे उगा सकेंगे। भविष्य में ऐसे केले तैयार किए जा सकते हैं जो स्वादिष्ट भी हों और बीमारी से सुरक्षित भी।
दुनिया के लिए क्यों जरूरी है यह खोज?
केला सिर्फ एक फल नहीं है। यह करोड़ों लोगों का मुख्य भोजन है। कई देशों की अर्थव्यवस्था भी केले पर निर्भर है।
आज दुनिया में अधिकतर कैवेंडिश केले उगाए जाते हैं। ये लगभग एक जैसे होते हैं। इस वजह से अगर एक बीमारी हमला करे, तो पूरी फसल खतरे में पड़ सकती है।
जंगली केले से मिला यह नया जीन उम्मीद की किरण है। यह प्राकृतिक तरीका है, जिससे बिना रसायनों के फसल को बचाया जा सकता है।
जंगली केले “कैलकटा 4” में मिला यह खास जीन भविष्य में केले की फसलों को बचा सकता है। पनामा रोग जैसी खतरनाक बीमारी से लड़ने के लिए यह एक मजबूत कदम है।
वैज्ञानिकों की पांच साल की मेहनत ने नई उम्मीद दी है। अगर सब कुछ ठीक रहा, तो आने वाले समय में हमें ऐसे केले मिल सकते हैं जो स्वादिष्ट भी होंगे और बीमारी से सुरक्षित भी। यह खोज किसानों, उपभोक्ताओं और पूरी दुनिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।