वैज्ञानिकों ने रडार डेटा के विश्लेषण से शुक्र ग्रह के नीचे एक विशाल खाली लावा सुरंग के प्रमाण खोजे हैं।
यह खोज नासा के मैगेलन मिशन द्वारा एकत्र किए गए पुराने रडार आंकड़ों के गहन अध्ययन से संभव हुई।
सुरंग लगभग एक किलोमीटर चौड़ी और सैकड़ों मीटर गहरी हो सकती है, जो इसे असाधारण रूप से विशाल बनाती है।
शुक्र की कम गुरुत्वाकर्षण शक्ति और घना वातावरण बड़ी लावा सुरंगों के निर्माण में सहायक माने जाते हैं।
भविष्य के इनविजन और वेरिटास मिशन उन्नत रडार तकनीक से सतह के नीचे और संरचनाओं की खोज करेंगे।
वैज्ञानिकों ने शुक्र ग्रह के नीचे एक बहुत बड़ी खाली लावा सुरंग के सबूत खोजे हैं। यह खोज इटली के ट्रेंटो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने की है। इस खोज से पता चलता है कि शुक्र ग्रह के अंदर भी ज्वालामुखी गतिविधि हुई है और उसने ग्रह की सतह को आकार दिया है।
शुक्र ग्रह को पृथ्वी का “जुड़वां ग्रह” कहा जाता है, क्योंकि उसका आकार और बनावट पृथ्वी से मिलती-जुलती है। लेकिन शुक्र का वातावरण बहुत अलग है। वहां बहुत अधिक गर्मी है और घने बादल पूरे ग्रह को ढके रहते हैं। इसी कारण वैज्ञानिकों के लिए उसकी सतह को देखना बहुत कठिन है।
लावा सुरंग क्या होती है?
जब ज्वालामुखी से पिघला हुआ लावा बाहर निकलता है, तो वह जमीन पर बहता है। कुछ समय बाद लावा की ऊपरी परत ठंडी होकर सख्त हो जाती है, लेकिन अंदर का लावा बहता रहता है। जब लावा पूरी तरह बह जाता है, तो उसके पीछे एक खाली सुरंग बच जाती है। इसे ही लावा ट्यूब या लावा सुरंग कहा जाता है।
पृथ्वी, मंगल और चंद्रमा पर पहले भी लावा सुरंगों के संकेत मिल चुके हैं। अब वैज्ञानिकों को शुक्र ग्रह पर भी ऐसी सुरंग का प्रमाण मिला है। यह अध्ययन नेचर कम्युनिकेशंस नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
यह खोज कैसे हुई?
शुक्र ग्रह को सीधे कैमरे से देखना संभव नहीं है, क्योंकि उसके ऊपर बहुत घने बादल हैं। इसलिए वैज्ञानिक रडार तकनीक का उपयोग करते हैं। रडार बादलों को पार कर सकता है और सतह की जानकारी दे सकता है।
1990 से 1992 के बीच नासा के मैगलन अंतरिक्ष यान ने शुक्र ग्रह की सतह का नक्शा बनाया था। उसने सिंथेटिक अपर्चर रडार का उपयोग किया था। ट्रेंटो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने उसी पुराने रडार डेटा का दोबारा अध्ययन किया।
उन्होंने उन स्थानों को देखा जहां जमीन धंसी हुई दिखाई देती है। ऐसी जगहों पर अक्सर लावा सुरंग की छत गिर जाती है और ऊपर गड्ढा बन जाता है। इन्हीं संकेतों के आधार पर वैज्ञानिकों ने एक बड़ी भूमिगत संरचना की पहचान की।
सुरंग का आकार कितना बड़ा है?
वैज्ञानिकों के अनुसार यह सुरंग लगभग एक किलोमीटर चौड़ी हो सकती है। इसकी छत की मोटाई कम से कम 150 मीटर है। अंदर का खाली भाग कम से कम 375 मीटर गहरा है। यह सुरंग निक्स मॉन्स नामक क्षेत्र में पाई गई है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह सुरंग 45 किलोमीटर तक फैली हो सकती है, लेकिन अभी केवल उसका एक छोटा हिस्सा ही पक्का साबित किया जा सका है।
शुक्र पर इतनी बड़ी सुरंग क्यों बनी?
शुक्र ग्रह की कुछ विशेष परिस्थितियां बड़ी लावा सुरंग बनाने में मदद कर सकती हैं। वहां की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी से थोड़ी कम है। साथ ही वहां का वातावरण बहुत घना है। ये दोनों कारण मिलकर लावा को जल्दी ठंडा होने और मोटी परत बनाने में मदद करते हैं। इससे अंदर की सुरंग सुरक्षित रह सकती है।
शुक्र पर पाए गए लावा चैनल पृथ्वी की तुलना में बड़े और लंबे हैं। इसलिए वहां बड़ी लावा सुरंगों का होना संभव माना जा रहा है।
भविष्य के मिशन क्या करेंगे?
इस खोज की पुष्टि करने और और अधिक जानकारी पाने के लिए भविष्य में नए मिशन भेजे जाएंगे। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का इनविजन मिशन और नासा का वेरिटास मिशन शुक्र ग्रह का अध्ययन करेंगे।
इन मिशनों में आधुनिक और अधिक शक्तिशाली रडार लगाए जाएंगे। ये रडार सतह के नीचे कई सौ मीटर तक देख सकेंगे। इससे वैज्ञानिकों को और अधिक लावा सुरंगों का पता चल सकता है।
यह खोज क्यों महत्वपूर्ण है?
यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे हमें शुक्र ग्रह के अंदर होने वाली प्रक्रियाओं को समझने में मदद मिलेगी। अभी तक वैज्ञानिकों के पास केवल अनुमान थे, लेकिन अब उनके पास ठोस प्रमाण हैं।
यह खोज हमें यह भी सिखाती है कि सौर मंडल के अन्य ग्रहों पर भी ज्वालामुखी गतिविधियां हुई हैं। इससे ग्रहों के निर्माण और विकास को समझने में सहायता मिलेगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तो केवल शुरुआत है। आने वाले सालों में शुक्र ग्रह के बारे में और भी नई और रोमांचक जानकारियां सामने आ सकती हैं।