वैज्ञानिकों ने खोजा एनजीटीएस-38 बी नामक विशाल एक्सोप्लैनेट, जो बृहस्पति से करीब पांच गुना भारी और 180 दिन में कक्षा पूरी करता है। फोटो साभार: नासा
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

वैज्ञानिकों ने खोजा बृहस्पति से भी बड़ा दुर्लभ ग्रह, 180 दिनों में लगाता है अपने तारे का चक्कर

बृहस्पति से पांच गुना भारी दुर्लभ ग्रह की खोज, 180 दिनों में लगाता है तारे का चक्कर, वैज्ञानिकों के लिए नई अंतरिक्ष खोज का बना केंद्र

Dayanidhi

  • वैज्ञानिकों ने खोजा एनजीटीएस-38 बी नामक विशाल एक्सोप्लैनेट, जो बृहस्पति से करीब पांच गुना भारी और 180 दिन में कक्षा पूरी करता है।

  • नासा के टीईएसएस मिशन से मिला ग्रह का संकेत, बाद में चिली की दूरबीनों से हुई खोज की पुष्टि और विस्तृत अध्ययन।

  • एनजीटीएस-38 बी को सुपर-जुपिटर श्रेणी में रखा गया, वैज्ञानिकों के अनुसार यह ग्रह आकार और द्रव्यमान में बेहद असाधारण है।

  • लंबी कक्षा वाले इस ग्रह की खोज अंतरिक्ष अनुसंधान में महत्वपूर्ण उपलब्धि, भविष्य में नए ग्रह खोजने में मिलेगी सहायता।

  • विशाल ग्रह के अध्ययन से वैज्ञानिकों को ग्रहों के निर्माण, विकास और संभावित चंद्रमाओं या छल्लों के बारे में जानकारी मिलेगी।

वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में एक ऐसे दुर्लभ ग्रह की खोज की है, जो हमारे सौरमंडल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति से भी कई गुना भारी है। इस नए ग्रह का नाम एनजीटीएस-38 बी रखा गया है। यह एक बाहरी ग्रह यानी एक्सोप्लैनेट है, जो हमारे सौरमंडल से बाहर किसी दूसरे तारे की परिक्रमा करता है।

यह ग्रह अपने तारे का एक चक्कर पूरा करने में करीब 180 दिन लगाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इतने लंबे समय की कक्षा वाले ग्रहों को खोजना बहुत मुश्किल होता है। यही वजह है कि एनजीटीएस-38 बी की खोज को अंतरिक्ष विज्ञान में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

बृहस्पति से लगभग पांच गुना भारी

एनजीटीएस-38 बी आकार में बृहस्पति से करीब आठ प्रतिशत बड़ा है, लेकिन इसका वजन बृहस्पति से लगभग पांच गुना अधिक है। ऐसे विशाल ग्रहों को वैज्ञानिक “सुपर-जुपिटर” यानी बृहस्पति से बड़े ग्रहों की श्रेणी में रखते हैं। यह शोध मंथली नोटिस ऑफ दि रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

यह ग्रह अपने तारे से काफी दूरी पर स्थित है। हालांकि इसका तारा हमारे सूर्य से बड़ा और अधिक गर्म है, इसलिए यह ग्रह पृथ्वी से ज्यादा गर्म है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह ग्रह ठंडे वातावरण वाले विशाल ग्रहों को समझने का अच्छा अवसर प्रदान करता है।

एक छोटी सी चमक में छिपा था संकेत

इस ग्रह की खोज की शुरुआत वर्ष 2020 में हुई, जब नासा के अंतरिक्ष यान टीईएसएस ने इसके संकेत देखे। टीईएसएस अंतरिक्ष में ऐसे ग्रहों की तलाश करता है, जो अपने तारे के सामने से गुजरते समय उसकी रोशनी को थोड़ा कम कर देते हैं।

जब कोई ग्रह अपने तारे और पृथ्वी के बीच से गुजरता है, तो तारे की चमक में हल्की कमी आती है। इस घटना को “ट्रांजिट” कहा जाता है। एनजीटीएस-38 बी का पहला संकेत केवल एक ट्रांजिट से मिला था। इसके बाद वैज्ञानिकों ने चिली में लगे नेक्स्ट जनरेशन ट्रांजिट सर्वे (एनजीटीएस) दूरबीनों की मदद से इस तारे पर लंबे समय तक नजर रखी। करीब 200 रातों के अवलोकन के बाद वैज्ञानिक दूसरी बार ग्रह के ट्रांजिट को पकड़ सके।

वर्षों की मेहनत से मिली सफलता

इस खोज का नेतृत्व क्वीन’स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता ने किया। उनके अनुसार, कम समय में अपने तारे का चक्कर लगाने वाले ग्रहों को खोजना आसान होता है, लेकिन 180 दिन की कक्षा वाले ग्रह को खोजना बहुत बड़ी चुनौती है।

वैज्ञानिकों ने केवल ग्रह के गुजरने से ही जानकारी हासिल नहीं की, बल्कि तारे की गति में होने वाले छोटे बदलावों को भी मापा। ग्रह के गुरुत्वाकर्षण के कारण तारे में हल्की हलचल होती है। इस बदलाव का अध्ययन करके वैज्ञानिकों ने ग्रह का वजन और उसकी कक्षा की जानकारी प्राप्त की।

ग्रह की कक्षा है थोड़ी अलग

हमारे सौरमंडल के कई ग्रह लगभग गोलाकार कक्षा में घूमते हैं, लेकिन एनजीटीएस-38 बी की कक्षा थोड़ी अंडाकार है। इसका मतलब है कि कभी यह अपने तारे के पास आता है और कभी उससे काफी दूर चला जाता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्रह जब अपने तारे के सबसे करीब होता है, तब वह बुध ग्रह की सूर्य से दूरी से थोड़ा ही ज्यादा दूर होता है। वहीं सबसे दूर जाने पर यह लगभग पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी जितनी दूर पहुंच जाता है।

भविष्य के शोध के लिए महत्वपूर्ण खोज

एनजीटीएस-38 बी का विशाल आकार और अपने तारे से दूरी वैज्ञानिकों के लिए खास रुचि का विषय है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इतना बड़ा ग्रह संभवतः अपने आसपास चंद्रमा या छल्ले जैसी संरचनाएं बनाए रख सकता है, हालांकि अभी तक इसके किसी चंद्रमा या छल्ले की पुष्टि नहीं हुई है।

इस खोज से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि बड़े ग्रह कैसे बनते हैं और समय के साथ उनमें क्या बदलाव आते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि लंबे समय वाली कक्षाओं में घूमने वाले ग्रहों की खोज भविष्य में पृथ्वी जैसे दूसरे ग्रहों को खोजने की दिशा में भी मददगार साबित होगी। एनजीटीएस-38 बी पृथ्वी जैसा ग्रह नहीं है, लेकिन इसकी खोज यह दिखाती है कि पिछले कुछ दशकों में अंतरिक्ष में नए ग्रहों को खोजने की हमारी क्षमता कितनी तेजी से बढ़ी है।