करीब 5,500 साल पहले, जब न शहर थे, न भीड़भाड़ और न ही पिस्सुओं के जरिए फैलने वाली महामारियों का दौर, तब भी प्लेग इंसानी बस्तियों में मौत का सन्नाटा ला रहा था।
नेचर में प्रकाशित नई स्टडी में पूर्वी साइबेरिया की बैकाल झील के पास मिले प्राचीन मानव अवशेषों के डीएनए से इस बीमारी के शुरुआती और बेहद घातक रूपों का पता चला है।
शोधकर्ताओंको 46 में से 18 यानी करीब 40 फीसदी अवशेषों में प्लेग फैलाने वाले बैक्टीरिया 'यर्सिनिया पेस्टिस' के प्रमाण मिले हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि मृतकों में बड़ी संख्या बच्चों और किशोरों की थी। कई कब्रों में भाई-बहन और माता-पिता के साथ उनके बच्चों के एक साथ दफन होने के संकेत मिले, जो बताते हैं कि बीमारी ने हजारों साल पहले भी पूरे परिवारों को एक साथ उजाड़ा होगा।
रिसर्च के मुताबिक प्राचीन प्लेग के जीवाणुओं में मिला एक खास ‘सुपरएंटीजन’ उनकी घातकता की संभावित वजह हो सकता है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि उस दौर में संक्रमित मरमोट जैसे जंगली कृंतकों से प्लेग इंसानों तक पहुंचा होगा। यह खोज बताती है कि प्लेग की जानलेवा कहानी शहरों और ब्लैक डेथ से बहुत पहले शुरू हो चुकी थी।
अक्सर प्लेग का नाम सुनते ही घनी बस्तियों, चूहों से भरे शहर और मध्यकालीन यूरोप की उन खौफनाक गलियों की तस्वीर सामने आई है, जहां इस महामारी ने लाखों जिंदगियों को निगल लिया था। लेकिन विज्ञान ने इतिहास की एक ऐसी कड़वी सच्चाई से पर्दा उठाया है, जो हमारी सोच को पूरी तरह बदल सकती है।
रिसर्च से पता चला है कि इस बीमारी की कहानी कहीं पुरानी है। प्रतिष्ठित जर्नल नेचर में प्रकाशित इस अध्ययन से पता चला है कि करीब 5,500 साल पहले जब दुनिया में न बड़े शहर थे और न ही आज जैसी घनी बस्तियां तब भी यह घातक बीमारी इंसानों की जान ले रही थी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक प्लेग एक बेहद संक्रामक बीमारी है, जो 'यर्सिनिया पेस्टिस' नामक बैक्टीरिया के कारण होती है। यह एक जूनोटिक बैक्टीरिया है, जो आमतौर पर छोटे स्तनधारियों जैसे चूहे, बिल्ली आदि जीवों और उनके पिस्सू यानी टिक्स में पाया जाता है।
क्यों जानलेवा है प्लेग
यह बीमारी संक्रमित जानवरों के बीच टिक्स के माध्यम से फैलती है, जिसकी चपेट में इंसान भी आ सकते हैं। इसी तरह संक्रमित व्यक्ति या जीवों के संपर्क में आने वाला भी इस बीमारी से संक्रमित हो सकता है। यह बैक्टीरिया इंसानी शरीर के लिंफ नोड्स (लसीका ग्रंथियां), रक्त और फेफड़ों पर हमला करता है।
प्लेग के दो मुख्य प्रकार होते हैं। इनमें पहला ब्यूबोनिक, जबकि दूसरा न्यूमोनिक प्लेग होता है। हालांकि इन दोनों में ब्यूबोनिक प्लेग अधिक सामान्य है। इसका नाम इस बीमारी के कारण लिम्फ नोड्स में होने वाली सूजन (बुबोज) के कारण पड़ा है। इसकी वजह से बगल, कमर और गर्दन में गांठें हो जाती हैं।
अपने अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पूर्वी साइबेरिया की बैकाल झील के पास चार प्राचीन कब्रिस्तानों में दबे इंसानी कंकालों के डीएनए की जांच की। दांतों से सुरक्षित मिले प्राचीन बैक्टीरिया के जीनोम को जब दोबारा बनाया गया, तो चौंकाने वाला सच सामने आया। शोधकर्ताओं के मुताबिक, उस समय प्लेग छोटे और घूम-घूमकर रहने वाले समुदायों के लिए भी घातक साबित हो रहा था।
प्राचीन डीएनए से खुला राज
जांच में शामिल 46 में से 18 लोगों यानी करीब 40 फीसदी के अवशेषों में प्लेग फैलाने वाले बैक्टीरिया 'यर्सिनिया पेस्टिस' के होने के प्रमाण मिले हैं। देखा जाए तो संक्रमण की यह दर मध्यकालीन समय के कब्रिस्तानों में मिले प्लेग के संक्रमण के प्रमाणों से भी अधिक है।
शोधकर्ताओं ने डीएनए के साथ-साथ पुरातात्विक साक्ष्यों और रेडियोकार्बन डेटिंग को मिलाकर यह समझने की कोशिश की कि इन समुदायों में बीमारी कैसे फैली और लोगों की मौत कब हुई।
सबसे दर्दनाक पहलू यह था कि इन प्राचीन कब्रों में बड़ी संख्या में छोटे बच्चों और कम उम्र के किशोरों के अवशेष मिले थे। पुरातत्वविदों के लिए 1990 के दशक से यह एक अनसुलझी पहेली थी कि इतने कम समय में इतने सारे बच्चों की मौत कैसे हो गई? इस नई स्टडी ने उस सदियों पुरानी पहली को सुलझा दिया है।
जब बीमारी ने एक साथ पूरे परिवारों को उजाड़ दिया
रेडियोकार्बन डेटिंग से पता चला कि कई लोगों को बहुत कम अंतराल में दफनाया गया था, जबकि कई कब्रों में भाई-बहन और माता-पिता अपने बच्चों के साथ एक ही समय पर दफनाए गए थे, यानी देखते-देखते पूरा परिवार इस महामारी का शिकार हो गया था।
यानी हजारों साल पहले भी यह बीमारी केवल एक-दो लोगों को नहीं, बल्कि पूरे परिवारों को एक साथ उजाड़ रही थी।
अब तक वैज्ञानिकों का मानना था कि शुरुआती प्लेग कमजोर रहा होगा, क्योंकि उस समय के बैक्टीरिया में वे जेनेटिक गुण नहीं थे जो बाद में चूहों और पिस्सुओं के जरिए फैलने वाली 'ब्यूबोनिक प्लेग' को सुपर-स्प्रेडर बनाते थे। लेकिन नई खोज ने उस भ्रम को तोड़ दिया है।
यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन के प्रोफेसर और अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता एस्के विलर्सलेव का कहना है, "शुरुआती दौर का प्लेग हल्का था या उग्र, इस पर काफी बहस होती रही है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि ये प्राचीन स्ट्रेन पहले से ही बेहद घातक थे।" मतलब कि प्लेग के इन शुरुआती रूपों में भी इंसानों को गंभीर रूप से बीमार करने और मौत का कारण बनने वाली क्षमता मौजूद थी।
प्राचीन प्लेग में मौजूद था एक खास तरह का ‘सुपरएंटीजन’
शोधकर्ताओं ने पाया कि इन प्राचीन स्ट्रेन में एक अनोखा 'सुपरएंटीजन' मौजूद था, यानी एक ऐसा टॉक्सिन पैदा करने वाला जेनेटिक कारक, जो आधुनिक इतिहास के प्लेग में नहीं देखा गया। यह तत्व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को इस कदर भड़का देता है कि शरीर में गंभीर सूजन और अन्य जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस आनुवंशिक विशेषता ने संक्रमण को और अधिक घातक बनाने में भूमिका निभाई होगी।
कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के शोधकर्ता मार्टिन सिकारा के अनुसार, यह खोज शुरुआती प्लेग के बारे में समझ को बदलती है। उनके मुताबिक, पिस्सुओं के जरिए प्रभावी तरीके से फैलने की क्षमता विकसित होने से पहले ही इन प्राचीन जीवाणुओं में ऐसे कई कारक मौजूद थे, जो संक्रमण को बेहद घातक बना सकते थे।
कैसे इंसानों तक पहुंचा प्लेग?
अध्ययन से यह भी संकेत मिलता है कि प्लेग की शुरुआती उत्पत्ति मध्य या उत्तर-पूर्वी एशिया में हुई हो सकती है। बाद में यह जंगली चूहों जैसे जानवरों की आबादी के जरिए यूरेशिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंचा होगा। बैकाल झील के आसपास रहने वाले शिकारी-संग्रहकर्ता समुदायों का मरमोट जैसे बड़े बिल बनाने वाले जीवों से करीबी संपर्क था। ये जानवर आज भी प्लेग के जीवाणु के वाहक हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि उस दौर में संक्रमित मरमोट के संपर्क में आने से प्लेग सीधे इंसानों तक पहुंचा होगा। इसका मतलब है कि शहरों, भीड़भाड़ और पिस्सुओं के जरिए फैलने वाली महामारियों के जन्म से हजारों साल पहले ही प्लेग छोटे मानव समुदायों में मौत का कारण बन रहा था।
गौरतलब है कि प्लेग एक जूनोटिक डिजीज है। ओशिनिया को छोड़कर सभी महाद्वीपों में इसके पाए जाने के सबूत मिले हैं। देखा जाए तो जहां भी इंसान और जानवरों की आबादी सह-अस्तित्व में है, वहां इंसानों में प्लेग का खतरा मौजूद है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक इंसानों में प्लेग मामले अफ्रीका, एशिया, यूरोप और दक्षिण अमेरिका में सामने आए हैं।
क्या अभी भी है इस बीमारी का खतरा
लेकिन 1990 के बाद से, अधिकांश इंसानी मामले अफ्रीका में ही दर्ज किए गए। स्थानिक तौर पर इनका सबसे ज्यादा खतरा डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, मेडागास्कर और पेरू में है। मेडागास्कर में महामारी के मौसम में सितंबर से अप्रैल के बीच तकरीबन हर साल ब्यूबोनिक प्लेग के मामले सामने आते हैं।
अमेरिका की बात करें तो वहां हर साल इंसानों में औसतन प्लेग के सात मामले सामने आते हैं। इनमें से 80 फीसदी ब्यूबोनिक प्लेग के होते हैं।
गौरतलब है कि भारत में भी 1994 में ब्यूबोनिक प्लेग के मामले सामने आए थे। सीडीसी के मुताबिक 26 अगस्त से पांच अक्टूबर 1994 के बीच, भारत के आठ राज्यों में न्यूमोनिक या ब्यूबोनिक प्लेग के कुल 5,150 संदिग्ध मामले सामने आए थे।
इनकी वजह से 53 मौतें भी दर्ज की गईं थी। इसमें से 54 फीसदी मामले महाराष्ट्र में, 27 फीसदी गुजरात, 14.5 फीसदी दिल्ली में जबकि बाकी 169 मामले (3.3%) आंध्रप्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड किए गए थे।
यह खोज प्लेग के इतिहास को नए सिरे से समझने में मदद करती है, एक ऐसी बीमारी का इतिहास, जिसने मध्यकालीन यूरोप में तबाही मचाने से बहुत पहले ही इंसानी परिवारों के बीच मौत का सन्नाटा पैदा करना शुरू कर दिया था। यह बताती है कि कुदरत के प्रकोप और महामारियों का साया इंसान पर हमेशा से भारी रहा है।