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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

राजस्थान की गर्मी से केरल की उमस तक, क्यों अलग है डेंगू के मच्छरों की आनुवंशिक कहानी?

वैज्ञानिकों को भारत के अलग-अलग हिस्सों में एडीज एजिप्टी मच्छरों की आनुवंशिक बनावट अलग मिली है, जिससे बीमारी फैलाने और कीटनाशकों के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।

Lalit Maurya

  • भारत में डेंगू फैलाने वाले एडीज एजिप्टी मच्छरों की आनुवंशिक कहानी पूरे देश में एक जैसी नहीं है।

  • भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए नए अध्ययन में राजस्थान की शुष्क गर्मी से लेकर केरल की नम तटरेखा और पूर्वोत्तर के इलाकों तक मच्छरों की आबादी में आनुवंशिक अंतर पाया गया है।

  • 13 भौगोलिक और जलवायु क्षेत्रों से लिए गए 126 नमूनों की जांच में 21 अलग-अलग हैप्लोटाइप मिले। हालांकि इनके डीएनए में कुल अंतर कम था, जो एक अपेक्षाकृत हाल के साझा पूर्वज की ओर इशारा करता है, लेकिन कुछ क्षेत्रों, खासकर ईटानगर, कोटा और तिरुवनंतपुरम की आबादियों में स्पष्ट आनुवंशिक दूरी दिखी।

  • दिलचस्प बात यह रही कि इस अंतर को समझाने में जलवायु की तुलना में भौगोलिक दूरी अधिक महत्वपूर्ण कारक रही। वैज्ञानिकों के मुताबिक, मच्छरों की सीमित आवाजाही और कम जीन प्रवाह इसके पीछे हो सकते हैं।

  • यह खोज इसलिए अहम है क्योंकि आनुवंशिक अंतर बीमारी फैलाने की क्षमता और कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोध को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में डेंगू नियंत्रण के लिए पूरे देश में एक जैसी रणनीति के बजाय स्थानीय मच्छर आबादी के आनुवंशिक स्वरूप, फैलाव और प्रतिरोध की निगरानी जरूरी होगी।

बारिश का मौसम आते ही घरों में जमा थोड़ा-सा पानी भी चिंता का कारण बन जाता है। कहीं गमले की तश्तरी में जमा पानी, कहीं कूलर और टंकी के आसपास नमी, यही छोटी-छोटी जगहें एडीज एजिप्टी मच्छरों के पनपने की जगह बन जाती हैं। यही मच्छर डेंगू के साथ चिकनगुनिया, जीका और येलो फीवर जैसी बीमारियां भी फैला सकता है।

लेकिन हैरानी की बात है कि राजस्थान की सूखी गर्मी से लेकर केरल की उमस भरी तटरेखा तक पनपने वाला यह मच्छर पूरे भारत में आनुवंशिक रूप से एक जैसा नहीं है।

वैज्ञानिकों ने इस बात का भी खुलासा किया है इनके आनुवंशिक अंतर को तय करने में जलवायु की तुलना में भौगोलिक दूरी ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

क्या कहती है भारत के मच्छरों की आनुवंशिक कहानी?

रिसर्च से पता चला है कि डेंगू का मच्छर सिर्फ मौसम के साथ नहीं बदलता, बल्कि वह जिस जगह में रहता और फैलता है, वहां की भौगोलिक परिस्थितियां भी उसके भीतर आनुवंशिक बदलाव ला सकती हैं।

भारत में डेंगू फैलाने वाले एडीज एजिप्टी मच्छरों पर हुए एक नए अध्ययन में यह हैरान कर देने वाली जानकारी सामने आई है। यह अध्ययन भोपाल स्थित आईसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन एनवायरमेंटल हेल्थ, गुरुकुल कांगड़ी (मानद) विश्वविद्यालय, हरिद्वार और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च इन ट्राइबल हेल्थ, भोपाल से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। इसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल एक्टा ट्रोपिका में प्रकाशित हुए हैं।

अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने देश के 13 अलग-अलग भौगोलिक और जलवायु क्षेत्रों से मच्छरों के 126 नमूने लिए। इनमें राजस्थान के कोटा से लेकर केरल के तिरुवनंतपुरम और पूर्वोत्तर के ईटानगर जैसे क्षेत्र शामिल थे। वैज्ञानिकों ने मच्छरों के डीएनए के एक छोटे हिस्से की जांच कर यह समझने की कोशिश की कि अलग-अलग जगहों के मच्छर आपस में कितने समान या अलग हैं।

इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने मच्छरों के माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए के एक छोटे हिस्से (साइटोक्रोम सी ऑक्सीडेज-1) की जांच की, ताकि उनके आनुवंशिक अंतर को समझा जा सके। इस जीन के आधार पर 126 मच्छरों में कुल 21 हैप्लोटाइप यानी आनुवंशिक रूप मिले।

हालांकि ज्यादातर मच्छरों में समानता काफी अधिक थी, लेकिन कुछ क्षेत्रों के मच्छरों में स्पष्ट अंतर भी दिखाई दिया।

126 मच्छरों में मिले 21 आनुवंशिक रूप, फिर भी साझा है एक पुरानी विरासत

अध्ययन में मच्छरों के आनुवंशिक रूपों में कुछ विविधता मिली, लेकिन उनके डीएनए में अंतर बेहद कम था। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इससे पता चलता है कि भारत में इन मच्छरों की आबादी का एक अपेक्षाकृत हाल का साझा पूर्वज रहा है और उनके डीएनए में अभी बहुत ज्यादा बदलाव नहीं हुए हैं।

साझा आनुवंशिक विरासत के बावजूद कहानी पूरी तरह एक जैसी नहीं है। कुछ क्षेत्रों में स्थानीय आनुवंशिक बदलाव साफ दिखाई दिए। विशेष रूप से ईटानगर, कोटा और तिरुवनंतपुरम की कुछ आबादियों के बीच आनुवंशिक अंतर अधिक पाया गया।

यानी देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले ये मच्छर एक ही मूल वंश से जुड़े होने के बावजूद स्थानीय परिस्थितियों और भौगोलिक अलगाव के कारण धीरे-धीरे अलग आनुवंशिक पहचान विकसित कर रहे हैं।

ईटानगर से कोटा और तिरुवनंतपुरम तक दिखा आनुवंशिक फर्क

भारत में एडीज एजिप्टी का सामना बेहद अलग-अलग परिस्थितियों से होता है, राजस्थान के शुष्क इलाकों से लेकर केरल के नम तटीय क्षेत्रों तक। इसके बावजूद अध्ययन में जलवायु क्षेत्रों के आधार पर मच्छरों की आनुवंशिक संरचना में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं मिला। इसके उलट, भौगोलिक दूरी आनुवंशिक अंतर को समझाने में ज्यादा प्रभावी कारक साबित हुई।

यानी दो जगहों का मौसम एक जैसा होने के बावजूद वहां के मच्छरों में अंतर हो सकता है, अगर उनके बीच मच्छरों का आना-जाना सीमित हो।

शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके पीछे मच्छरों की आवाजाही में आने वाली भौगोलिक बाधाएं और अलग-अलग आबादियों के बीच सीमित जीन प्रवाह हो सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो दो जगहों के बीच दूरी जितनी अधिक या आवागमन जितना सीमित होगा, वहां मच्छरों की आबादी के अलग आनुवंशिक स्वरूप विकसित होने की संभावना उतनी बढ़ सकती है।

जलवायु नहीं, मच्छरों की आवाजाही और भौगोलिक दूरी बनी बड़ी वजह

गौरतलब है कि एडीज एजिप्टी भारत में डेंगू के अलावा चिकनगुनिया और जीका जैसी बीमारियों को फैलाने वाला प्रमुख मच्छर है। कभी मुख्य रूप से शहरों तक सीमित माना जाने वाला यह मच्छर अब ग्रामीण इलाकों में भी पैर पसार रहा है।

इसके लिए भारत की अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियां महत्वपूर्ण हैं। कहीं गर्म और शुष्क वातावरण है, तो कहीं भारी बारिश और उमस।

इन अलग-अलग परिस्थितियों में मच्छर खुद को ढालते हुए अलग-अलग आबादियां बना सकते हैं। रिसर्च के दौरान शोधकर्ताओं को एक ऐसा आनुवंशिक समूह भी मिला जो देश के अध्ययन किए गए सभी क्षेत्रों में मौजूद था।

इससे संकेत मिलता है कि इस मच्छर की एक पुरानी आबादी तेजी से अलग-अलग इलाकों में फैली है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर अलग आनुवंशिक विशेषताएं भी विकसित हुई हैं।

क्यों मायने रखता है मच्छरों में यह अंतर?

सच कहें तो मच्छरों में होने वाले आनुवंशिक बदलाव केवल वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय नहीं हैं। इनका सीधा संबंध डेंगू जैसी बीमारियों से हो सकता है।

अलग-अलग आनुवंशिक विशेषताओं वाले मच्छरों में बीमारी फैलाने की क्षमता अलग हो सकती है। इसी तरह कुछ मच्छर कीटनाशकों के खिलाफ ज्यादा मजबूत हो सकते हैं। ऐसे में अगर किसी इलाके में ऐसे मच्छरों की संख्या बढ़ती है, तो उन्हें नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।

यही वजह है कि शोधकर्ताओं का कहना है कि पूरे भारत के लिए एक जैसी रणनीति बनाने के बजाय अलग-अलग क्षेत्रों में मच्छरों की स्थानीय आबादी और उनकी विशेषताओं को समझकर निगरानी और नियंत्रण की रणनीति तैयार करना जरूरी है।

बढ़ सकता है कीटनाशकों से बच निकलने वाले मच्छरों का खतरा

अध्ययन का एक अहम निष्कर्ष यह है कि केवल तापमान, बारिश और नमी को देखकर यह समझना पर्याप्त नहीं है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में डेंगू फैलाने वाले मच्छर कैसे बदल रहे हैं। मच्छरों के एक इलाके से दूसरे इलाके तक पहुंचने में दूरी, प्राकृतिक बाधाएं और उनका सीमित आवागमन भी बड़ी भूमिका निभा सकता है।

लंबे समय तक अलग-अलग रहने पर एक ही प्रजाति के मच्छरों की स्थानीय आबादी में धीरे-धीरे अंतर पैदा हो सकता है।

इसलिए डेंगू के खिलाफ लड़ाई में सिर्फ मच्छरों की संख्या कम करना ही पर्याप्त नहीं होगा। यह भी समझना होगा कि कौन से मच्छर कहां मौजूद हैं, वे कैसे फैल रहे हैं और उनमें कौन-से बदलाव आ रहे हैं।

स्थानीय समझ ही बनेगी सबसे मजबूत ढाल

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह अध्ययन भारत के अलग-अलग पारिस्थितिक और भौगोलिक क्षेत्रों में एडीज एजिप्टी की आनुवंशिक विविधता के लिए एक आधारभूत जानकारी देता है। भविष्य में ऐसी जानकारी क्षेत्र-विशेष के हिसाब से मच्छरों की निगरानी, कीटनाशकों के इस्तेमाल और नियंत्रण रणनीतियां तैयार करने में मदद कर सकती है।

आखिरकार, डेंगू का खतरा हमारे घरों के आसपास मंडराते एक छोटे से मच्छर से शुरू होता है, लेकिन उसका असर किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। एक मच्छर पूरे परिवार और समुदाय की सेहत को खतरे में डाल सकता है।

इसलिए एडीज एजिप्टी के बदलते आनुवंशिक स्वरूप को समझना महज वैज्ञानिक जिज्ञासा नहीं, बल्कि यह तय करने की कुंजी है कि किस इलाके में मच्छरों से कैसे और कितनी प्रभावी तरीके से लड़ा जाए।

आने वाले समय में डेंगू और दूसरी मच्छरजनित बीमारियों से बचाव के लिए स्थानीय स्तर पर सटीक निगरानी और रणनीति ही हमारी सबसे मजबूत ढाल बन सकती है।