नई तकनीक ने प्रदूषित पेयजल में पीएफएएस की मात्रा 87 प्रतिशत तक कम करने में सफलता हासिल की। फोटो साभार: आईस्टॉक
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

चुंबकीय कणों की मदद से पानी से हटेंगे 'फॉरएवर केमिकल्स', वैज्ञानिकों की नई सफल खोज

चुंबकीय नैनोकणों की मदद से वैज्ञानिकों ने पानी से पीएफएएस और फ्लोरीन युक्त माइक्रोप्लास्टिक हटाने की नई तकनीक विकसित की, जिससे पानी का शुद्धिकरण आसान होगा।

Dayanidhi

  • जर्मनी के वैज्ञानिकों ने चुंबकीय नैनोकणों की मदद से पानी से पीएफएएस हटाने की नई तकनीक विकसित की।

  • नई तकनीक ने प्रदूषित पेयजल में पीएफएएस की मात्रा 87 प्रतिशत तक कम करने में सफलता हासिल की।

  • शोध में पहली बार फ्लोरीन युक्त माइक्रोप्लास्टिक को भी चुंबकीय विधि से पानी से हटाया गया।

  • तकनीक का सफल परीक्षण नदी के पानी, पेयजल और कपड़ों की धुलाई से निकले गंदे पानी पर किया गया।

  • वैज्ञानिकों के अनुसार, चुंबकीय आयरन ऑक्साइड कणों का दोबारा उपयोग संभव है, जिससे पानी शुद्ध करने की लागत घट सकती है।

आज के समय में पानी का प्रदूषण दुनिया की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बन गया है। खासकर पीएफएएस नाम के रसायन वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय हैं। इन्हें "फॉरएवर केमिकल्स" भी कहा जाता है, क्योंकि ये प्राकृतिक रूप से बहुत धीरे-धीरे नष्ट होते हैं। ये रसायन लंबे समय तक मिट्टी, पानी और जीवों के शरीर में बने रहते हैं। यही कारण है कि इन्हें पानी से हटाना भी आसान नहीं होता।

रोजमर्रा की चीजों में होता है इस्तेमाल

पीएफएएस का उपयोग कई घरेलू और औद्योगिक उत्पादों में किया जाता है। वाटरप्रूफ कपड़े, नॉन-स्टिक बर्तन, कॉस्मेटिक उत्पाद और कई अन्य सामानों में इन रसायनों का इस्तेमाल होता है। समय के साथ ये रसायन पानी के स्रोतों तक पहुंच जाते हैं और पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। इनका असर इंसानों और जानवरों के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।

वैज्ञानिकों ने खोजा नया तरीका

जर्मनी के फ्रेडरिक-अलेक्जेंडर यूनिवर्सिटी (एफएयू), यूनिक्लिनिकम एरलांगेन और बवेरियन हेल्थ एंड फूड सेफ्टी अथॉरिटी के वैज्ञानिकों ने मिलकर पानी को साफ करने का एक नया तरीका विकसित किया है। शोधकर्ताओं ने विशेष प्रकार के चुंबकीय आयरन ऑक्साइड नैनोकण तैयार किए हैं, जिनकी सतह को इस तरह बनाया गया है कि वे पीएफएएस रसायनों को आसानी से अपनी ओर आकर्षित कर सकें। यह शोध मटीरियल्स टुडे नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

चुंबक से होगी सफाई

इस तकनीक में पहले इन चुंबकीय नैनोकणों को प्रदूषित पानी में मिलाया जाता है। पानी में मौजूद पीएफएएस इन कणों से चिपक जाते हैं। इसके बाद एक साधारण चुंबक की मदद से इन कणों को पानी से बाहर निकाल लिया जाता है। इस तरह पीएफएएस भी पानी से हट जाते हैं। यह प्रक्रिया सरल होने के साथ-साथ काफी प्रभावी भी मानी जा रही है।

माइक्रोप्लास्टिक पर भी असर

इस शोध की सबसे खास बात यह है कि यह तकनीक केवल पीएफएएस तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिकों ने पहली बार यह भी दिखाया कि यही तरीका फ्लोरीन युक्त माइक्रोप्लास्टिक को हटाने में भी सफल है। ऐसे माइक्रोप्लास्टिक अक्सर वाटरप्रूफ कपड़ों की धुलाई और कुछ कॉस्मेटिक उत्पादों के कारण पानी में पहुंच जाते हैं। ये बहुत छोटे होते हैं और इन्हें हटाना कठिन माना जाता है।

असली पानी पर हुआ सफल परीक्षण

वैज्ञानिकों ने केवल प्रयोगशाला में ही नहीं, बल्कि वास्तविक पानी के नमूनों पर भी इस तकनीक का परीक्षण किया। इसके लिए उन्होंने प्रदूषित पेयजल, नदी के पानी, मिट्टी की सफाई से निकले गंदे पानी और आउटडोर कपड़ों की धुलाई के पानी का उपयोग किया। सभी नमूनों में इस तकनीक ने अच्छे परिणाम दिए।

प्रदूषित पेयजल में पीएफएएस की मात्रा लगभग 87 प्रतिशत तक कम हो गई। इसके बाद पानी में इन रसायनों का स्तर जर्मनी द्वारा तय नई सीमा, यानी 100 नैनोग्राम प्रति लीटर से भी नीचे पहुंच गया। साथ ही फ्लोरीन युक्त माइक्रोप्लास्टिक को भी सफलतापूर्वक पानी से अलग कर लिया गया।

दोबारा भी किए जा सकते हैं इस्तेमाल

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तकनीक में इस्तेमाल होने वाले कुछ चुंबकीय आयरन ऑक्साइड कणों को साफ करके दोबारा उपयोग किया जा सकता है। इससे लागत कम होगी और पर्यावरण पर भी अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा। इसके अलावा आयरन ऑक्साइड को अपेक्षाकृत सुरक्षित और कम विषैला पदार्थ माना जाता है, जिससे यह तकनीक बड़े स्तर पर अपनाने के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।

भविष्य के लिए उम्मीद

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में पानी को साफ करने का एक महत्वपूर्ण साधन बन सकती है। हालांकि अभी बड़े पैमाने पर इसके उपयोग से पहले और परीक्षण किए जाएंगे, ताकि इसकी लागत, लंबे समय तक काम करने की क्षमता और सुरक्षित उपयोग का पूरा आकलन किया जा सके।

यदि आगे के शोध भी सफल रहते हैं, तो यह नई तकनीक दुनिया भर में पीएफएएस और फ्लोरीन युक्त माइक्रोप्लास्टिक जैसे खतरनाक प्रदूषकों से पानी को साफ करने में अहम भूमिका निभा सकती है। इससे स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने और पर्यावरण की रक्षा करने में बड़ी मदद मिलने की उम्मीद है।