फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) 
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

ईवी की बैटरी न होगी खराब, न पकड़ेगी आग; आईआईटी गांधीनगर के वैज्ञानिकों ने बनाया ‘स्मार्ट’ चार्जिंग फॉर्मूला

आईआईटी गांधीनगर से जुड़े वैज्ञानिकों के मुताबिक यह स्मार्ट चार्जिंग प्रणाली बैटरी की वास्तविक स्थिति और मौसम को समझकर खुद को ढाल लेती है और उसे समय से पहले खराब होने और आग लगने से बचाती है।

Lalit Maurya

  • इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते दौर में फास्ट चार्जिंग एक बड़ी जरूरत बन चुकी है, लेकिन इसके साथ बैटरी की उम्र घटने और आग लगने जैसे जोखिम भी जुड़े रहते हैं।

  • ऐसे में आईआईटी गांधीनगर के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी स्मार्ट चार्जिंग तकनीक विकसित की है, जो बैटरी की वास्तविक स्थिति और मौसम के अनुसार खुद को ढालकर इन जोखिमों को कम कर सकती है।

  • जर्नल ऑफ एनर्जी स्टोरेज में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक यह "अडैप्टिव चार्जिंग सिस्टम" लिथियम प्लेटिंग नामक उस प्रक्रिया को रोकने में मदद करता है, जो बैटरी की क्षमता घटाने, उसकी उम्र कम करने और शॉर्ट-सर्किट या आग जैसी घटनाओं का कारण बन सकती है।

  • शोधकर्ताओं ने पांच चरणों वाली एक बुद्धिमान चार्जिंग रणनीति विकसित की है, जो बैटरी की उम्र और तापमान का आकलन कर चार्जिंग करंट को स्वतः नियंत्रित करती है। परीक्षणों में यह तकनीक -5 से 25 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान और अलग-अलग उम्र की बैटरियों में प्रभावी साबित हुई।

  • परिणामों से पता चला कि इससे बैटरी की चार्ज क्षमता में 10.65 फीसदी और चार्जिंग दक्षता में 0.55 फीसदी तक सुधार हुआ।

  • शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक ईवी बैटरियों को अधिक सुरक्षित और किफायती बना सकती है। ऐसे समय में जब भारत इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर तेजी से बढ़ रहा है, यह शोध भविष्य की स्मार्ट और भरोसेमंद ईवी तकनीक की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की दुनिया में एक सवाल लंबे समय से चुनौती बना हुआ है, क्या बैटरी को तेजी से चार्ज किया जा सकता है, वो भी बिना उसकी सेहत और उम्र को नुकसान पहुंचाए? इसी दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), गांधीनगर के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी क्रांतिकारी स्मार्ट चार्जिंग तकनीक विकसित की है, जो बैटरी की उम्र बढ़ाने के साथ चार्जिंग को भी अधिक तेज और कुशल बना सकती है।

इस बारे में अधिक जानकारी प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ एनर्जी स्टोरेज में प्रकाशित हुई है। अध्ययन के अनुसार, यह नई "अडैप्टिव चार्जिंग प्रणाली" बैटरी की वास्तविक स्थिति और मौसम के अनुसार खुद को स्वतः बदल लेती है। इससे लिथियम-आयन बैटरियों में होने वाली ‘लिथियम प्लेटिंग’ जैसी गंभीर समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है, जो बैटरी की क्षमता घटाने, उसकी उम्र कम करने और सुरक्षा जोखिम बढ़ाने के लिए जिम्मेदार मानी जाती है।

ऐसे में शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक ईवी बैटरियों को अधिक सुरक्षित तरीके से चार्ज करने में मदद कर सकती है। इससे बैटरी की कार्यक्षमता और उम्र दोनों बढ़ सकती हैं, साथ ही ओवरहीटिंग और आग लगने जैसे जोखिमों को भी कम किया जा सकता है।

क्या है समस्या? क्यों खराब होती हैं बैटरियां?

आमतौर पर जब स्मार्टफोन या इलेक्ट्रिक वाहनों को बहुत तेजी से चार्ज किया जाता है, अत्यधिक ठंड में इस्तेमाल किया जाता है या लंबे समय तक उच्च चार्ज स्तर पर रखा जाता है, तब लिथियम आयन बैटरी के भीतर सही तरीके से जमा होने के बजाय धातु की परत के रूप में एनोड की सतह पर जमने लगते हैं। इसे ‘लिथियम प्लेटिंग’ कहा जाता है।

आसान भाषा में समझें तो फास्ट चार्जिंग के दौरान लिथियम आयन बैटरी के मुख्य हिस्से (एनोड) में समाने के बजाय, उसके ऊपर एक धातु की परत के रूप में जमने लगते हैं। इससे बैटरी की क्षमता स्थाई रूप से कम हो सकती है। साथ ही यह बिल्कुल सुई जैसी नुकीली संरचनाएं बना देते हैं। ये सुइयां बैटरी के अंदरूनी हिस्सों को पंचर कर देती हैं, जिससे शॉर्ट-सर्किट होता है और बैटरी में आग लग सकती है।

अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता और आईआईटी गांधीनगर के शोधार्थी शिव शंकर सिन्हा के मुताबिक, आज हर कोई फास्ट चार्जिंग चाहता है, लेकिन अंधाधुंध फास्ट चार्जिंग बैटरी को वक्त से पहले बूढ़ा कर देती है। हमारी यह तकनीक सुरक्षा की जिम्मेदारी हार्डवेयर से हटाकर एक इंटेलिजेंट सॉफ्टवेयर को सौंपती है।

बैटरी की स्थिति के अनुसार बदलती है चार्जिंग

अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता और स्मार्ट पावर इलेक्ट्रॉनिक्स प्रयोगशाला की प्रमुख प्रोफेसर पल्लवी भारद्वाज ने इस बारे में प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि मौजूदा चार्जिंग प्रणालियां आमतौर पर तयशुदा चार्जिंग पैटर्न का उपयोग करती हैं। लेकिन बैटरियां स्थिर नहीं होतीं। उनका व्यवहार तापमान, उपयोग के इतिहास और उम्र के साथ बदलता रहता है।

इसी समस्या के समाधान के लिए शोधकर्ताओं ने पांच चरणों वाली "मल्टी-स्टेप कॉन्स्टेंट करंट" (एमएससीसी) चार्जिंग रणनीति विकसित की है। यह प्रणाली हर बार चार्जिंग शुरू होने से पहले बैटरी की वास्तविक उम्र (स्टेट ऑफ एज) और आसपास के तापमान का आकलन करती है और उसी के अनुसार चार्जिंग करंट को समायोजित (एडजस्ट) करती है।

अपनी इस तकनीक में शोधकर्ताओं ने एक ऐसा इंटेलिजेंट सॉफ्टवेयर एल्गोरिदम बनाया है जो बैटरी के लिए एक 'सुपरवाइजर' की तरह काम करता है। जैसे ही उसे पता चलता है कि किसी विशेष परिस्थिति में लिथियम प्लेटिंग शुरू होने वाली है, वह तुरंत चार्जिंग करंट को कम कर देती है, जिससे बैटरी को संभावित नुकसान से बचाया जा सके।

शोधकर्ताओं ने इस तकनीक का परीक्षण व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल होने वाली पैनासोनिक एनसीआर18650बी लिथियम-आयन बैटरीज पर किया। परीक्षण -5 डिग्री सेल्सियस से 25 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान और नई से लेकर 15 फीसदी तक क्षतिग्रस्त बैटरियों पर किया गया। निष्कर्ष दर्शाते हैं कि इसकी वजह से पारंपरिक चार्जिंग के मुकाबले बैटरी की चार्ज क्षमता में 10.65 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई।

चार्जिंग दक्षता में 0.55 फीसदी तक सुधार दर्ज किया गया। साथ ही, यह तकनीक अलग-अलग तापमानों और बैटरी की उम्र से जुड़ी परिस्थितियों में भी लिथियम प्लेटिंग को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने में सफल रही।

भारत के ईवी भविष्य के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह अध्ययन?

भारत में फेम योजना, एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (एसीसी) बैटरी कार्यक्रम और सार्वजनिक चार्जिंग नेटवर्क के तेजी से विस्तार के साथ इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग बढ़ रहा है। ऐसे में अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में लंबे समय तक टिकने वाली बैटरियों की जरूरत भी बढ़ेगी। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह स्मार्ट चार्जिंग तकनीक बैटरियों की उम्र बढ़ाने, ईवी मालिकों की लागत कम करने और भारत के उभरते बैटरी उद्योग को अधिक पर्यावरण अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

वैश्विक स्तर पर भी यह शोध महत्वपूर्ण है, क्योंकि उच्च ऊर्जा घनत्व वाली निकेल-समृद्ध लिथियम-आयन बैटरियां आज भी लंबी दूरी तय करने वाले अधिकांश इलेक्ट्रिक वाहनों की ऊर्जा का प्रमुख स्रोत हैं। ऐसे में तेज चार्जिंग और बैटरी की लंबी उम्र के बीच संतुलन बनाना भविष्य की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक बनता जा रहा है।

यह अध्ययन संकेत देता है कि आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक वाहनों की सफलता केवल बेहतर बैटरियों पर नहीं, बल्कि ऐसी स्मार्ट चार्जिंग प्रणालियों पर भी निर्भर करेगी जो वास्तविक समय में बैटरी की स्थिति को समझकर खुद को उसके अनुरूप ढाल सकें।