फूको के लोलक ने 1851 में पहली बार पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने को प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध किया।
पृथ्वी का घूर्णन दिवस हर साल आठ जनवरी को फूको के ऐतिहासिक प्रयोग की याद में मनाया जाता है।
पृथ्वी के घूर्णन से दिन और रात बनते हैं और 24 घंटे का समय चक्र निर्धारित होता है।
चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की घूर्णन गति को धीरे-धीरे कम कर रहा है।
जलवायु परिवर्तन, बर्फ पिघलने और समुद्र स्तर बढ़ने से पृथ्वी की धुरी और घूर्णन प्रभावित हो रहे हैं।
हर साल आठ जनवरी को पृथ्वी का घूर्णन दिवस (अर्थ रोटेशन डे) मनाया जाता है। यह दिन उस ऐतिहासिक वैज्ञानिक खोज की याद दिलाता है, जिसने यह स्पष्ट रूप से सिद्ध किया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। यह खोज 1851 में फ्रांसीसी भौतिक विज्ञानी लियोन फूको ने अपने प्रसिद्ध प्रयोग फूको के लोलक के माध्यम से की थी।
फूको का लोलक और ऐतिहासिक प्रयोग
फूको का लोलक एक भारी सीसे की गेंद होती है, जिसे बहुत लंबी रस्सी से लटकाया जाता है। जब यह लोलक झूलता है, तो उसका झूलने का तल धीरे-धीरे बदलता हुआ दिखाई देता है। वास्तव में लोलक अपनी दिशा में स्थिर रहता है, लेकिन उसके नीचे पृथ्वी घूमती रहती है। इसी कारण ऐसा प्रतीत होता है कि लोलक की दिशा बदल रही है।
साल 1851 में फूको ने यह प्रयोग पेरिस के पंथियन में वैज्ञानिकों, विद्वानों और आम जनता के सामने प्रस्तुत किया। यह पहला प्रत्यक्ष और सरल प्रयोग था, जिसने बिना किसी खगोलीय गणना के यह सिद्ध कर दिया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है।
आठ जनवरी को ही क्यों मनाया जाता है?
आठ जनवरी को पृथ्वी का घूर्णन दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि यह फूको द्वारा अपने प्रयोग के सार्वजनिक प्रदर्शन की वर्षगांठ से जुड़ा है। 2026 में इस ऐतिहासिक प्रदर्शन के 175 वर्ष पूरे होंगे, जो विज्ञान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
पृथ्वी लगभग हर 24 घंटे में अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करती है, जिससे दिन और रात का निर्माण होता है। यही कारण है कि हमारे जीवन की दैनिक लय - सूर्योदय, सूर्यास्त और समय की गणना, पृथ्वी के घूर्णन पर निर्भर करती है।
प्राचीन विचारों से आधुनिक विज्ञान तक
पृथ्वी के घूमने का विचार मानव सभ्यता को हजारों वर्षों से उलझाता रहा है। प्राचीन काल में अधिकांश यूरोपीय सिद्धांत भूकेन्द्रीय थे, जिनमें पृथ्वी को स्थिर और ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता था।
हालांकि ग्रीस के दार्शनिक हेराक्लाइड्स ने चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में यह सुझाव दिया था कि पृथ्वी घूम सकती है। भारत में आर्यभट ने पांचवीं शताब्दी ईस्वी में पृथ्वी के घूर्णन और तारों की प्रतीत होने वाली गति का उल्लेख किया।
16वीं शताब्दी में निकोलस कोपरनिकस ने यह सिद्धांत दिया कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है और अपनी धुरी पर भी घूमती है। बाद में जोहान्स केप्लर ने बताया कि ग्रहों की कक्षाएं वृत्ताकार नहीं बल्कि दीर्घवृत्ताकार होती हैं। गैलीलियो गैलीली ने दूरबीन से किए गए अवलोकनों द्वारा इस सिद्धांत का समर्थन किया। लेकिन इन सभी के बावजूद प्रत्यक्ष प्रयोगात्मक प्रमाण फूको के लोलक से ही मिला।
विज्ञान में फूको के प्रयोग का योगदान
फूको के प्रयोग ने खगोल विज्ञान को नई दिशा दी। इससे मौसम प्रणाली, समुद्री धाराओं और पृथ्वी की गतियों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिली। यह सूर्य और तारों की आकाश में दिखाई देने वाली गति को समझने का आधार भी बना। यह खोज मानव ज्ञान की उस बड़ी पहेली का एक महत्वपूर्ण टुकड़ा थी, जिसे हम आज भी जोड़ते जा रहे हैं।
चंद्रमा और पृथ्वी की धीमी होती गति
पृथ्वी का घूर्णन पूरी तरह स्थिर नहीं है। चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी के महासागरों में ज्वार-भाटा उत्पन्न करती है। समुद्र तल से होने वाला घर्षण पृथ्वी की घूर्णन ऊर्जा को थोड़ा-थोड़ा कम करता है।
नासा के अनुसार, इस प्रक्रिया के कारण पृथ्वी की गति बहुत धीरे-धीरे कम हो रही है और इसके बदले चंद्रमा पृथ्वी से दूर खिसक रहा है। इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे घूमती कुर्सी पर बैठा व्यक्ति अगर पैर जमीन पर रगड़ दे, तो उसकी गति धीरे-धीरे कम हो जाती है।
क्या जलवायु परिवर्तन भी असर डालता है?
हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन भी पृथ्वी के घूर्णन को प्रभावित कर रहा है। ग्लेशियरों का पिघलना, बर्फ की चादरों का सिकुड़ना और समुद्र स्तर का बढ़ना पृथ्वी पर द्रव्यमान के वितरण को बदल देता है।
इससे पृथ्वी की धुरी में हल्का-सा बदलाव आता है, जिसे ध्रुवीय गति कहा जाता है और दिन की लंबाई में भी अत्यंत सूक्ष्म वृद्धि होती है। साल 2000 के बाद यह प्रभाव तेज हुआ है, जिसका संबंध ग्रीनहाउस गैसों से होने वाली तेज बर्फ पिघलने से जोड़ा जा रहा है।
पृथ्वी का घूर्णन दिवस हमें याद दिलाता है कि हमारा ग्रह लगातार गतिशील है। फूको का लोलक न केवल एक वैज्ञानिक उपकरण है, बल्कि मानव जिज्ञासा और ज्ञान की खोज का प्रतीक भी है। यह दिन हमें विज्ञान, प्रकृति और पृथ्वी के प्रति हमारी जिम्मेदारी को समझने का अवसर देता है।