नासा के क्यूरियोसिटी मार्स रोवर से खोजी गई पॉलीगॉन दरारों की नजदीकी तस्वीर, मधुमक्खी के छत्ते जैसे टेक्सचर को दिखाती है। फोटो साभार: नासा
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

मंगल ग्रह पर क्यूरियोसिटी रोवर को मिला अनोखा नजारा, विशाल क्षेत्र में दिखे मधुमक्खी के छत्ते जैसे निशान

मंगल की धरती पर क्यूरियोसिटी रोवर की बड़ी खोज, हजारों रहस्यमयी ज्यामितीय निशानों ने वैज्ञानिकों की बढ़ाई उत्सुकता

Dayanidhi

  • क्यूरियोसिटी रोवर ने मंगल की वैले ग्रांडे घाटी में पहली बार बड़े क्षेत्र में फैली बहुभुज दरारों की खोज की।

  • मंगल की सतह पर मिले मधुमक्खी छत्ते जैसे निशान, वैज्ञानिक इनके बनने की प्रक्रिया को समझने में जुटे।

  • नासा के रोवर ने प्राचीन जल गतिविधियों के संकेत खोजे, मंगल के पुराने वातावरण पर नई जानकारी मिली।

  • माउंट शार्प की चढ़ाई के दौरान क्यूरियोसिटी को मिले अनोखे भूगर्भीय संकेत, वैज्ञानिकों में उत्साह बढ़ा।

  • मंगल पर पानी और जीवन की संभावनाओं से जुड़े सुराग, नई खोजों से ग्रह का इतिहास समझने में मदद मिलेगी।

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के क्यूरियोसिटी रोवर ने मंगल ग्रह पर एक ऐसी खोज की है, जिसने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है। रोवर ने मंगल की एक घाटी, जिसे वैज्ञानिकों ने “वैले ग्रांडे” नाम दिया है, में जमीन पर बने अनोखे ज्यामितीय निशान देखे हैं। ये निशान देखने में मधुमक्खी के छत्ते जैसे लगते हैं। वैज्ञानिक इन्हें “पॉलीगोनल फ्रैक्चर” यानी बहुभुज आकार की दरारें कहते हैं।

क्यूरियोसिटी रोवर ने जून महीने में इस इलाके की 360 डिग्री तस्वीरें भेजीं। इन तस्वीरों में ये खास आकार दूर-दूर तक फैले हुए दिखाई दिए। वैज्ञानिकों के अनुसार, इससे पहले मंगल पर ऐसे निशान छोटे-छोटे हिस्सों में देखे गए थे, लेकिन वैले ग्रांडे में पहली बार इतने बड़े क्षेत्र में इनका पता चला है।

चारों तरफ फैले हैं रहस्यमयी निशान

क्यूरियोसिटी द्वारा भेजी गई तस्वीरों में ये बहुभुज आकार की दरारें हर दिशा में दिखाई दे रही हैं। ये पास की एक पहाड़ी जैसी चट्टान, जिसे “मिराफ्लोरेस” नाम दिया गया है, के किनारों तक फैली हुई हैं। यह चट्टान करीब छह मीटर ऊंची है और इसके ऊपर रेत की मोटी परत मौजूद है।

नासा के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह दृश्य बहुत खास है। मिशन के वैज्ञानिक ने कहा कि क्यूरियोसिटी ने मंगल पर कई सुंदर और रहस्यमयी स्थान देखे हैं, लेकिन इतने बड़े क्षेत्र में फैले ये बहुभुज निशान बेहद आश्चर्यजनक हैं। वैज्ञानिक इनकी बनावट और रासायनिक संरचना का अध्ययन कर रहे हैं ताकि इनके बनने की सही वजह पता लगाई जा सके।

कैसे बने होंगे ये निशान?

वैज्ञानिकों का मानना है कि मंगल की सतह पर बने ये आकार कई अलग-अलग कारणों से बन सकते हैं। कुछ जगहों पर ऐसे निशान सूखी हुई मिट्टी में बनने वाली दरारों के कारण बने होते हैं। जब किसी झील या नदी का पानी सूख जाता है, तो मिट्टी सिकुड़कर इस तरह के पैटर्न बना सकती है।

इसके अलावा तापमान में बदलाव, गर्मी और ठंड के बार-बार आने-जाने या जमीन के दबाव में बदलाव से भी ऐसी आकृतियां बन सकती हैं। जब जमीन के अंदर मौजूद पानी दबाव के कारण बाहर निकलता है, तब भी इस तरह की दरारें बन सकती हैं।

मंगल पर पानी और जीवन की संभावना के संकेत

क्यूरियोसिटी रोवर वर्ष 2012 में मंगल पर पहुंचा था। तब से यह लगातार मंगल की सतह और चट्टानों का अध्ययन कर रहा है। इस रोवर ने कई महत्वपूर्ण खोजें की हैं। इनमें प्राचीन जल स्रोतों के संकेत, खास खनिज, सल्फर के क्रिस्टल और उल्कापिंडों के अवशेष शामिल हैं।

वैज्ञानिकों को पहले भी ऐसे प्रमाण मिले हैं कि अरबों साल पहले मंगल पर नदियां और झीलें मौजूद थीं। उस समय मंगल का वातावरण आज की तुलना में काफी अलग था। वहां पानी, कुछ जरूरी रसायन और जीवन के लिए आवश्यक तत्व मौजूद थे।

क्यूरियोसिटी ने मंगल की चट्टानों में कार्बन आधारित अणु भी खोजे हैं। ये अणु पृथ्वी पर डीएनए और आरएनए जैसे महत्वपूर्ण जैविक पदार्थों से जुड़े होते हैं। हालांकि वैज्ञानिक अभी यह निश्चित रूप से नहीं बता सकते कि ये अणु किसी जीवित प्रक्रिया से बने थे या प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रियाओं से।

मंगल के इतिहास को समझने में मिलेगी मदद

क्यूरियोसिटी रोवर इस समय माउंट शार्प नामक विशाल पर्वत की ओर बढ़ रहा है। यह पर्वत करीब पांच किलोमीटर ऊंचा है और मंगल के गेल क्रेटर के अंदर स्थित है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस क्षेत्र की चट्टानों में मंगल के पुराने वातावरण और पानी से जुड़े कई रहस्य छिपे हैं।

वैले ग्रांडे में मिले ये नए बहुभुज निशान वैज्ञानिकों को मंगल के मौसम, पानी और भूगर्भीय बदलावों को समझने में मदद कर सकते हैं। यह खोज एक बार फिर साबित करती है कि मंगल ग्रह आज भले ही सूखा और शांत दिखाई देता हो, लेकिन अरबों साल पहले वहां एक सक्रिय और बदलती हुई दुनिया मौजूद थी।

क्यूरियोसिटी रोवर आगे भी मंगल की यात्रा जारी रखेगा और वैज्ञानिकों को लाल ग्रह के अतीत के बारे में नई जानकारियां देता रहेगा।