भारतीय वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष विज्ञान में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए एक अत्यंत दुर्लभ और सघन तारकीय ‘बाइनरी सिस्टम’ की खोज की है, जिसमें एक ‘ब्लू स्ट्रैगलर’ तारा और उसका साथी ‘ब्राउन ड्वार्फ’ शामिल हैं। यह जोड़ा अब तक पाए गए सबसे छोटे कक्षीय समय वाले तारकीय प्रणालियों में से एक है, जो मात्र 5.6 घंटे में एक-दूसरे की परिक्रमा पूरी करता है।
यह खोज इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि यह सिस्टम उस दुर्लभ क्षेत्र में मिला है जिसे खगोल विज्ञान में ‘ब्राउन ड्वार्फ डेजर्ट’ कहा जाता है, जहां ऐसे पिंडों का मिलना लगभग असंभव माना जाता था।
ब्लू स्ट्रैगलर तारे लंबे समय से वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बने हुए हैं, क्योंकि ये अपने समूह के अन्य तारों की तुलना में अधिक चमकीले और युवा दिखाई देते हैं, जिससे तारकीय विकास के पारंपरिक सिद्धांतों पर सवाल उठते हैं। नए अध्ययन में पाया गया यह सिस्टम अब तक किसी ब्लू स्ट्रैगलर का सबसे हल्का साथी भी रखता है, जिसका द्रव्यमान सूर्य के मुकाबले मात्र 0.056 गुणा है।
यह शोध तारों के निर्माण, उनके आपसी प्रभाव और अत्यंत कठोर परिस्थितियों में उनके अस्तित्व को समझने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो भविष्य के खगोलीय मॉडलों को और अधिक सटीक बनाने में मदद करेगा।
भारतीय वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में एक बड़ी सफलता हासिल की है। ब्रह्मांड के रहस्यों को खंगालते हुए वैज्ञानिकों ने पहली बार एक ऐसे अनोखे और बेहद छोटे 'बाइनरी सिस्टम' (तारों के जोड़े) की खोज की है, जो सितारों के पैदा होने और उनके विकास से जुड़े पुराने सिद्धांतों को पूरी तरह बदल सकती है।
देश के शोधकर्ताओं ने पहली बार अंतरिक्ष में एक 'ब्लू स्ट्रैग्लर' (चमकीले युवा तारे) और उसके साथी 'ब्राउन ड्वार्फ' (बौने तारे) के एक ऐसे अनोखे जोड़े (बाइनरी सिस्टम) की खोज की है। ये दोनों तारे एक-दूसरे के बहुत करीब हैं और बहुत तेजी से एक-दूसरे के चारों ओर घूमते हैं। इसलिए यह अब तक मिले सबसे ‘तंग’ (बहुत छोटे कक्षा वाले) तारकीय जोड़ों में से एक है।
तारों के ‘नियम’ तोड़ता रहस्यमयी बाइनरी सिस्टम
खगोलविदों के लिए 'ब्लू स्ट्रैग्लर' तारे हमेशा से एक बड़ा रहस्य रहे हैं, क्योंकि ये तारे अपने समूह के बाकी तारों की तुलना में बहुत अधिक गर्म, चमकीले और युवा दिखाई देते हैं। आम नियमों के मुताबिक एक समूह के सभी तारों की उम्र एक समान होनी चाहिए, लेकिन ये तारे सामान्य खगोलीय नियमों को चुनौती देते हैं।
वैज्ञानिक भाषा में कहें तो ये तारे अंतरिक्ष के 'वैम्पायर' (पिशाच) की तरह काम करते हैं, जो अपने आस-पास मौजूद साथी तारों की ऊर्जा और हाइड्रोजन को सोखकर खुद को हमेशा जवान और चमकीला बनाए रखते हैं।
असम की गुवाहाटी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में हुई इस ऐतिहासिक रिसर्च में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (आईआईए), बेंगलुरु, आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज), नैनीताल के साथ-साथ इटली के आईएनएएफ-कैटानिया एस्ट्रोफिजिकल ऑब्जर्वेटरी के शोधकर्ता भी शामिल थे। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल 'मंथली नोटिसेज ऑफ द रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी' में प्रकाशित हुए हैं।
इस नई खोज की सबसे हैरान कर देने वाली बात इस बाइनरी सिस्टम का आकार और इसकी रफ्तार है। वैज्ञानिकों ने पाया कि यह पूरा सिस्टम अंतरिक्ष के एक ऐसे दुर्लभ इलाके में स्थित है जिसे 'ब्राउन ड्वार्फ डेजर्ट' कहा जाता है। इस क्षेत्र में ऐसे तारों का अस्तित्व मिलना लगभग असंभव माना जाता था।
5.6 घंटे में पूरी कर लेते हैं परिक्रमा
इसके अलावा, यह जोड़ा ब्रह्मांड के सबसे कम समय में चक्कर काटने वाले सिस्टम्स में से एक है। ये दोनों तारे इतने करीब हैं कि महज 5.6 घंटे में एक-दूसरे की पूरी परिक्रमा पूरी कर लेते हैं। इस खोज में मिला 'ब्राउन ड्वार्फ' (बौना तारा) अब तक किसी ब्लू स्ट्रैग्लर के चक्कर लगाने वाला सबसे हल्का खगोलीय पिंड है, जिसका द्रव्यमान सूर्य की तुलना में सिर्फ 0.056 गुना है।
यह एक ऐसा पिंड है जो किसी ग्रह से तो बहुत बड़ा है, लेकिन इसमें इतनी ऊर्जा नहीं है कि इसमें हाइड्रोजन जलकर यह एक असली चमकीला तारा बन सके।
वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह अध्ययन न केवल तारों के विकास को समझने में मदद करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि अत्यंत कठिन परिस्थितियों में तारे कैसे बनते, बदलते और जीवित रहते हैं। साथ ही इस सफलता से भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों और दूरबीनों से मिलने वाले डेटा को समझने के लिए नए सैद्धांतिक मॉडल तैयार करने में मदद मिलेगी।