आईआईटी रोपड़ के वैज्ञानिकों ने नैनोबबल्स की मदद से पैरासिटामोल के क्रिस्टल बनाने की नई और बेहतर तकनीक विकसित की।
महज 150 से 200 नैनोमीटर आकार के बुलबुले क्रिस्टल निर्माण तेज करके दवा उत्पादन की प्रक्रिया को बेहतर बना सकते हैं।
प्रयोगों में नैनोबबल्स तकनीक से पैरासिटामोल का उत्पादन कुछ कठिन परिस्थितियों में भी 65 प्रतिशत तक बढ़ाने में सफलता मिली।
ऑक्सीजन से बने नैनोबबल्स ने क्रिस्टल का आकार घटाने में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया, जिससे दवा के घुलने में मदद मिल सकती है।
नई तकनीक दवा निर्माण को किफायती और टिकाऊ बना सकती है, लेकिन औद्योगिक स्तर पर इसके इस्तेमाल के लिए आगे परीक्षण जरूरी हैं।
दवाइयों की दुनिया में कभी-कभी बहुत बड़े बदलाव बेहद छोटी चीजों से आते हैं। इस बार ऐसी ही एक खोज ने वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रोपड़ के शोधकर्ताओं ने दवाओं के निर्माण को बेहतर बनाने के लिए एक ऐसा तरीका विकसित किया है, जिसमें आंखों से दिखाई न देने वाले बेहद छोटे बुलबुलों की मदद ली जाती है। इन बुलबुलों को ‘नैनोबबल्स’ कहा जाता है।
शुरुआती प्रयोगों में सामने आया है कि इनकी मदद से पैरासिटामोल के छोटे और एकसमान क्रिस्टल तेजी से बनाए जा सकते हैं। इतना ही नहीं, कुछ परिस्थितियों में दवा के उत्पादन की मात्रा में भी 65 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह शोध केमिकल इंजीनियरिंग साइंस नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
क्या हैं नैनोबबल्स और कैसे करते हैं काम?
नैनोबबल्स बेहद सूक्ष्म गैस के बुलबुले होते हैं, जिनका आकार आमतौर पर नैनोमीटर में मापा जाता है। इस अध्ययन में इनका व्यास लगभग 150 से 200 नैनोमीटर था। एक नैनोमीटर मीटर का एक अरबवां हिस्सा होता है। यानी ये बुलबुले इतने छोटे हैं कि इन्हें नंगी आंखों से देखना संभव नहीं है।
शोधकर्ताओं ने पैरासिटामोल को इथेनॉल में घोलकर प्रयोग किए। इसके बाद ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों को घोल में प्रवाहित करके नैनोबबल्स तैयार किए गए। फिर तापमान को 25 डिग्री सेल्सियस से घटाकर 10 डिग्री सेल्सियस तक लाया गया और मिश्रण को अलग-अलग गति से हिलाया गया। इन परिस्थितियों में देखा गया कि क्रिस्टल कितनी जल्दी बनते हैं, उनका आकार कैसा होता है और कितना उत्पाद प्राप्त होता है।
छोटे क्रिस्टल क्यों हैं इतनी बड़ी बात?
दवा का असर केवल उसमें मौजूद रासायनिक पदार्थ पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उसके कणों के आकार पर भी निर्भर कर सकता है। आम तौर पर छोटे कणों का सतह-क्षेत्र उनके आयतन की तुलना में अधिक होता है। इससे दवा को उचित परिस्थितियों में घुलने में मदद मिल सकती है।
पैरासिटामोल जैसी दवाओं के क्रिस्टल का आकार नियंत्रित करना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे दवा के घुलने की गति और निर्माण की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। हालांकि छोटे क्रिस्टल बनने का मतलब यह नहीं है कि दवा हर स्थिति में तुरंत असर करेगी। शरीर में उसका प्रभाव दवा की बनावट, खुराक और अन्य कई कारणों पर भी निर्भर करता है।
बुलबुले कैसे बदल देते हैं क्रिस्टल बनने का तरीका?
जब किसी घोल का तापमान घटाया जाता है या उसमें ऐसा दूसरा तरल मिलाया जाता है, जिससे दवा की घुलने की क्षमता कम हो जाए, तो घोल में क्रिस्टल बनने की स्थिति पैदा होती है। इस प्रक्रिया को क्रिस्टलीकरण कहा जाता है।
नैनोबबल्स इस प्रक्रिया में शुरुआती केंद्रों की तरह काम कर सकते हैं, जहां दवा के अणु इकट्ठा होकर क्रिस्टल बनाना शुरू करते हैं। उनकी सतह पर मौजूद विद्युत आवेश भी अणुओं के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। इससे क्रिस्टल बनने के लिए जरूरी ऊर्जा बाधा कम हो सकती है और क्रिस्टल बनने की प्रक्रिया जल्दी शुरू हो सकती है।
इसके अलावा नैनोबबल्स घोल में मिश्रण को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। इससे क्रिस्टलों के अनियंत्रित रूप से आपस में चिपकने की समस्या कम हो सकती है और अपेक्षाकृत छोटे तथा एकसमान कण प्राप्त हो सकते हैं।
ऑक्सीजन वाले बुलबुले रहे सबसे आगे
अध्ययन में तीन अलग-अलग गैसों से बनाए गए नैनोबबल्स की तुलना की गई। इनमें ऑक्सीजन वाले बुलबुलों ने क्रिस्टल का आकार घटाने में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया। गैस की घुलनशीलता और बुलबुलों की स्थिरता जैसे गुण इस अंतर के संभावित कारण हो सकते हैं।
एक और महत्वपूर्ण बात यह रही कि कुछ ऐसी परिस्थितियों में भी क्रिस्टल बनने लगे, जहां सामान्य तरीकों से परिणाम हासिल करना मुश्किल था। गर्म तापमान और कम मात्रा में एंटी-सॉल्वेंट होने पर भी नैनोबबल्स ने क्रिस्टलीकरण शुरू करने में मदद की। एंटी-सॉल्वेंट ऐसा तरल होता है, जिसे मिलाने पर किसी पदार्थ की घुलनशीलता कम हो जाती है।
उद्योग तक पहुंचने से पहले कई चुनौतियां
यह तकनीक जितनी उम्मीद जगाती है, इसे बड़े कारखानों में लागू करना उतना ही चुनौतीपूर्ण हो सकता है। औद्योगिक स्तर पर नैनोबबल्स की संख्या और स्थिरता को लगातार नियंत्रित करना, क्रिस्टलों का एकसमान आकार बनाए रखना और अलग-अलग परिस्थितियों में समान परिणाम हासिल करना जरूरी होगा।
यदि आगे के परीक्षणों में यह तरीका सफल साबित होता है, तो दवा कंपनियों को कम ऊर्जा में बेहतर गुणवत्ता वाले क्रिस्टल बनाने और उत्पादन बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। फिलहाल, इसे दवा निर्माण के क्षेत्र में एक आशाजनक शोध के रूप में देखना चाहिए। भविष्य में यही नन्हे बुलबुले दवाओं को अधिक प्रभावी ढंग से तैयार करने और उत्पादन प्रक्रिया को किफायती बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।