सीईएनएस के शोधकर्ताओं की खोज से भविष्य में स्मार्ट नैनो सामग्री और उन्नत जैविक सेंसर विकसित करने की नई संभावनाएं खुलेंगी। प्रतीकात्मक छवि, साभार आईस्टॉक
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

बेंगलुरु के वैज्ञानिकों का कमाल: प्रकाश तकनीक व बीमारी की पहचान करने वाले सेंसर होंगे और स्मार्ट

शोध के अनुसार, पेप्टाइड अणु में सिर्फ एक कार्बन का बदलाव बना सकता है स्मार्ट नैनो सामग्री, बीमारी की पहचान करने वाले सेंसर व आधुनिक प्रकाश तकनीक के विकास की नई राह।

Dayanidhi

  • बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने पेप्टाइड अणु में एक छोटा रासायनिक बदलाव कर उसकी संरचना और कार्यप्रणाली में बड़ा अंतर दिखाया।

  • सिर्फ एक मेथिलीन समूह जोड़ने से अणुओं की पैकिंग, प्रकाश उत्सर्जन और नैनो स्तर पर संगठन का तरीका बदल गया।

  • सीईएनएस के शोधकर्ताओं की खोज से भविष्य में स्मार्ट नैनो सामग्री और उन्नत जैविक सेंसर विकसित करने की नई संभावनाएं खुलेंगी।

  • पेप्टाइड की मूल संरचना बदले बिना वैज्ञानिकों ने आणविक व्यवहार नियंत्रित करने की एक सरल और प्रभावी रणनीति प्रस्तुत की।

  • शोध के निष्कर्ष रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री की पत्रिका पॉलिमर केमिस्ट्री में प्रकाशित हुए, जो नई तकनीकों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

कभी-कभी विज्ञान की दुनिया में बड़े बदलाव के लिए किसी बड़े प्रयोग या भारी-भरकम रासायनिक बदलाव की जरूरत नहीं होती। अणु की बनावट में किया गया एक छोटा-सा फेरबदल भी कमाल कर सकता है। बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसा ही करके दिखाया है। उन्होंने पेप्टाइड आधारित अणुओं की बनावट में सिर्फ एक छोटा-सा बदलाव किया और इससे उनके एक-दूसरे के साथ जुड़ने, रोशनी छोड़ने और नैनो स्तर पर संरचनाएं बनाने के तरीके में बड़ा अंतर देखने को मिला।

यह खोज भविष्य में ऐसे स्मार्ट पदार्थ बनाने का रास्ता खोल सकती है, जिनका इस्तेमाल बीमारी की पहचान करने वाले सेंसर, मेडिकल इमेजिंग, आधुनिक प्रकाश तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में किया जा सकेगा।

एक छोटे से बदलाव की बड़ी कहानी

यह शोध बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज (सीईएनएस) के वैज्ञानिकों ने किया है। यह संस्थान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अंतर्गत काम करता है। शोध का नेतृत्व डॉ. गौतम घोष ने किया। उनके साथ पीएचडी शोधार्थी सौरव मोयरा ने काम किया। इस अध्ययन में बेंगलुरु के जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (जेएनसीएएसआर) और पश्चिम बंगाल के घाताल रवींद्र शतवार्षिकी महाविद्यालय के शोधकर्ता शामिल रहे।

शोधकर्ताओं ने पेप्टाइड और रोशनी के प्रति संवेदनशील पायरिन नामक एक फ्लोरोसेंट अणु के बीच सिर्फ एक मेथिलीन समूह यानी –सीएच2– जोड़ा। आसान भाषा में कहें तो अणु की संरचना में एक कार्बन परमाणु और उससे जुड़े दो हाइड्रोजन परमाणुओं वाला छोटा-सा हिस्सा जोड़ा गया। देखने में यह बदलाव बेहद मामूली था, लेकिन इसके नतीजे चौंकाने वाले रहे।

पेप्टाइड क्या हैं और ये खास क्यों हैं?

पेप्टाइड छोटे अणु होते हैं, जो अमीनो अम्लों से मिलकर बनते हैं। अमीनो अम्ल ही प्रोटीन की बुनियादी इकाइयां हैं। प्रकृति में ये शरीर की कई महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाओं में भूमिका निभाते हैं।

पेप्टाइड की एक खासियत यह भी है कि ये सही परिस्थितियों में अपने आप एक-दूसरे के साथ जुड़कर व्यवस्थित संरचनाएं बना सकते हैं। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में 'सुप्रामॉलिक्यूलर सेल्फ-असेंबली' कहा जाता है। इसे ऐसे समझिए, जैसे छोटे-छोटे टुकड़े अपने आप मिलकर एक खास डिजाइन बना लें।

लेकिन वैज्ञानिकों के सामने चुनौती यह है कि इन अणुओं को अपनी जरूरत के मुताबिक किस तरह व्यवस्थित किया जाए। मनचाही संरचना बनाना और उसके गुणों को नियंत्रित करना आसान नहीं है।

एक कार्बन ने कैसे बदल दिया पूरा खेल?

शोध में सामने आया कि –सीएच2– समूह जोड़ने से अणु के अलग-अलग हिस्सों की आपसी दिशा और स्थिति बदल गई। इस छोटे से बदलाव ने अणुओं के एक-दूसरे के पास आने और व्यवस्थित होने के तरीके को प्रभावित किया।

नतीजा यह हुआ कि उनकी आणविक पैकिंग, सुप्रामॉलिक्यूलर चिरैलिटी, फ्लोरोसेंस के बने रहने की अवधि और नैनो स्तर पर बनने वाली संरचनाओं में अंतर दिखाई दिया। चिरैलिटी का मतलब है किसी संरचना का ऐसा गुण, जिसमें वह अपने दर्पण प्रतिबिंब पर पूरी तरह नहीं बैठती, जैसे हमारा बायां और दायां हाथ।

फ्लोरोसेंस की अवधि बताती है कि उत्तेजित होने के बाद कोई अणु कितनी देर तक प्रकाश उत्सर्जित करता है। इस गुण में बदलाव प्रकाश आधारित तकनीकों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

सबसे खास बात यह रही कि इन बदलावों के लिए पेप्टाइड की मूल रासायनिक संरचना को पूरी तरह बदलने की जरूरत नहीं पड़ी। सिर्फ एक छोटे से स्पेसर ने अणुओं के व्यवहार को प्रभावित कर दिया।

भविष्य की तकनीक के लिए नई उम्मीद

इस खोज का महत्व केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है। भविष्य में ऐसे पेप्टाइड आधारित नैनो पदार्थ विकसित किए जा सकते हैं, जिनके गुणों को जरूरत के अनुसार नियंत्रित किया जा सके। ऐसे पदार्थ जैविक सेंसर बनाने, शरीर के भीतर की प्रक्रियाओं की इमेजिंग करने, स्मार्ट प्रकाशीय सामग्री विकसित करने और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में नई संभावनाएं पैदा कर सकते हैं।

हालांकि इन संभावित उपयोगों को व्यावहारिक तकनीक में बदलने के लिए आगे और शोध की जरूरत होगी। इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका पॉलिमर केमिस्ट्री में प्रकाशित हुए हैं, जिसे रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री प्रकाशित करती है।

कुल मिलाकर यह शोध विज्ञान का एक अहम पहलू को सामने लाता है, जिसमें कहा गया है कि किसी अणु में बदलाव कितना बड़ा है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह बदलाव उसकी बनावट और व्यवहार को कैसे प्रभावित करता है। कभी-कभी एक छोटा-सा रासायनिक कदम ही भविष्य की बड़ी तकनीकों की नींव बन सकता है।