रेगिस्तान में उगने वाले कैक्टस को अब तक धीमी गति से बढ़ने वाला और स्थिर पौधा माना जाता था, लेकिन नए अध्ययन ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है इस सुस्त पौधे के भीतरी विकास की रफ्तार बेहद तेज है।
यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के वैज्ञानिकों द्वारा 750 से अधिक कैक्टस प्रजातियों पर किए गए शोध में सामने आया है कि कैक्टस धरती पर सबसे तेजी से विकसित होने वाले पौधों के समूहों में शामिल हैं। अध्ययन के मुताबिक, नई प्रजातियों के निर्माण के पीछे फूलों का बड़ा आकार या खास परागणकर्ता नहीं, बल्कि फूलों के आकार और बनावट का तेजी से बदलना मुख्य वजह है।
शोधकर्ताओं ने 2 मिलीमीटर से 37 सेंटीमीटर तक लंबे फूलों का विश्लेषण किया, लेकिन पाया कि फूलों का आकार नई प्रजातियों की रफ्तार तय नहीं करता। इसके उलट, जिन कैक्टस प्रजातियों के फूल तेजी से बदल रहे थे, उनमें नई प्रजातियां बनने की संभावना कहीं ज्यादा थी।
यह खोज चार्ल्स डार्विन की उस पुरानी धारणा को भी चुनौती देती है, जिसमें विशेष प्रकार के फूलों और परागणकर्ताओं को विकास का प्रमुख कारण माना गया था।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह अध्ययन संरक्षण रणनीतियों के लिए भी अहम है, खासकर तब जब दुनिया की करीब 33 फीसदी कैक्टस प्रजातियां विलुप्ति के खतरे का सामना कर रही हैं।
रेगिस्तान की तपती रेत में उगने वाला कैक्टस (नागफनी) भले ही धीमा और स्थिर दिखाई देता हो, लेकिन वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है इस सुस्त पौधे के भीतरी विकास की रफ्तार बेहद तेज है।
नए अध्ययन के मुताबिक, कैक्टस आश्चर्यजनक तेजी से नई प्रजातियां बना रहे हैं। यह खोज न सिर्फ कैक्टस को लेकर हमारी पुरानी धारणाओं को चुनौती देती है, बल्कि यह भी बताती है कि शांत दिखने वाले रेगिस्तान वास्तव में प्रकृति के तेज बदलावों के केंद्र हैं। वैज्ञानिकों ने पाया है कि कैक्टस धरती पर सबसे तेजी से विकसित होने वाले पौधों के समूहों में शामिल हैं और इनमें नई प्रजातियां बनने की रफ्तार बेहद तेज है।
750 से ज्यादा कैक्टस प्रजातियों पर किए अध्ययन में सामने आया है कि नई प्रजातियों के बनने के पीछे फूलों का बड़ा आकार या खास परागणकर्ता (पॉलिनेटर) जिम्मेदार नहीं हैं। इसकी असली वजह है, समय के साथ कैक्टस के फूलों के आकार और बनावट का तेजी से बदलना। यह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल बायोलॉजी लेटर्स में प्रकाशित हुए हैं।
डार्विन के सिद्धांत को क्यों मिली चुनौती?
हैरान कर देने वाली बात है कि यह अध्ययन चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत को भी चुनौती देता है। दशकों से जीवविज्ञानी मानते आ रहे थे कि पौधों की नई प्रजातियों के विकास के पीछे फूलों का खास आकार और परागण करने वाले जीव (जैसे मधुमक्खियां या तितलियां) बड़ी भूमिका निभाते हैं। डार्विन ने भी ऑर्किड के पौधों पर रिसर्च कर यही बात कही थी।
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 750 से अधिक कैक्टस प्रजातियों के फूलों की लंबाई का विश्लेषण किया है। इसमें कुछ फूल महज 2 मिलीमीटर छोटे थे, जबकि कुछ विशाल फूल 37 सेंटीमीटर तक लंबे पाए गए। यानी इनके आकार में करीब 185 गुणा अंतर था।
धीमे नहीं, बेहद तेजी से बदल रहे हैं कैक्टस
हालांकि, इतने बड़े अंतर के बावजूद वैज्ञानिकों को यह नहीं मिला कि फूलों का आकार नई प्रजातियों के बनने की रफ्तार को प्रभावित करता है। इसके उलट, जिन कैक्टस प्रजातियों के फूलों का आकार और रूप तेजी से बदल रहा था, उनमें नई प्रजातियां विकसित होने की संभावना कहीं अधिक थी। अध्ययन में यह पैटर्न हाल के विकासक्रम से लेकर करोड़ों साल पुराने विकास के इतिहास तक लगातार दिखाई दिया।
यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग और अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता जेमी थॉम्पसन का कहना है, “लोग कैक्टस को धीमी गति से बढ़ने वाले पौधे मानते हैं, लेकिन अध्ययन में सामने आया है कि कैक्टस परिवार धरती पर सबसे तेजी से विकसित होने वाले पौधों में से एक है।“
उन्होंने प्रेस विज्ञप्ति में आगे बताया, "वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि लंबे और ज्यादा विशेष प्रकार के फूलों वाले कैक्टस सबसे अधिक नई प्रजातियां बनाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। असली फर्क इस बात से पड़ा कि फूल कितनी तेजी से अपना आकार बदलते हैं।"
उनके मुताबिक, जिन कैक्टस के फूल तेजी से विकसित होते हैं, उनमें नई प्रजातियों में विभाजित होने की संभावना कहीं ज्यादा होती है।
संरक्षण के लिए भी अहम संकेत
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस खोज का सीधा असर संरक्षण रणनीतियों पर पड़ सकता है। चूंकि फूलों का विकास लाखों वर्षों में नई प्रजातियों के निर्माण में मदद करता रहा है, इसलिए अब संरक्षण योजनाओं में किसी प्रजाति की ‘विकास की गति’ को भी शामिल करना जरूरी होगा। हालांकि, वैज्ञानिकों ने चेताया है कि तेजी से विकसित होने की क्षमता यह गारंटी नहीं देती कि कोई प्रजाति जलवायु परिवर्तन से बच जाएगी।
पृथ्वी पर बदलती जलवायु की रफ्तार कई कैक्टस प्रजातियों के अनुकूलन से भी तेज है। फिर भी यह समझने में मदद मिल सकती है कि किन प्रजातियों को सबसे ज्यादा संरक्षण की जरूरत है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो दुनिया में कैक्टस की करीब 1,850 ज्ञात प्रजातियां हैं। पिछले दो से 3.5 करोड़ वर्षों में ये पूरे अमेरिका महाद्वीप में तेजी से फैली हैं और इन्हें पौधों के सबसे तेजी से विविधता बढ़ाने वाले समूहों में गिना जाता है। इस अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने 'कैक्ट इको डीबी' नाम का एक नया ओपन-एक्सेस डेटाबेस भी तैयार किया है। सात वर्षों की मेहनत से बने इस डेटाबेस में कैक्टस की विशेषताओं, आवासों और उनके विकासक्रम से जुड़ी विस्तृत जानकारी शामिल है।
खतरे में हैं कैक्टस एक-तिहाई प्रजातियां
वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह डेटाबेस भविष्य में यह समझने में मदद करेगा कि जलवायु परिवर्तन के दौर में कैक्टस प्रजातियां कैसे प्रतिक्रिया दे सकती हैं। फिलहाल दुनिया की करीब एक-तिहाई यानी करीब 33 फीसदी कैक्टस प्रजातियां विलुप्ति होने के कगार पर हैं।
वैज्ञानिकों के लिए यह खोज एक बड़ा संकेत है कि प्रकृति को केवल उसकी बाहरी गति से नहीं समझा जा सकता, क्योंकि धीमे दिखने वाले जीव भी भीतर से तेजी से बदल रहे होते हैं।