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सुप्रीम कोर्ट की दोटूक: सीवर लाइन बिछाना अदालतों का काम नहीं, प्रशासनिक व्यवस्थाएं खुद निभाएं जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जलभराव और सीवर जैसी बुनियादी समस्याओं का समाधान अदालतें नहीं, बल्कि संबंधित सरकारी एजेंसियां और प्रशासनिक संस्थाएं करें।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि सीवर लाइन, जलनिकासी और बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याओं का समाधान निकालना अदालतों का नहीं, बल्कि प्रशासनिक एजेंसियों और स्थानीय निकायों का काम है।

  • अपने आदेश में अदालत ने कहा कि न्यायपालिका का दायरा कानून के तहत न्याय सुनिश्चित करना है, न कि प्रशासनिक संस्थाओं की भूमिका निभाना।

  • यह मामला दिल्ली के ग्रीन पार्क एक्सटेंशन और आसपास के इलाकों में जलभराव और खराब ड्रेनेज व्यवस्था से जुड़ा है।

  • दिल्ली हाई कोर्ट ने 18 जून, 2025 को अंतरिम आदेश जारी कर दिल्ली जल बोर्ड, नगर निगम और एम्स को कई निर्देश दिए थे, जिसे एम्स ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। शीर्ष अदालत ने माना कि हाई कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर खुद समाधान निकालने की जिम्मेदारी संभाल ली थी।

  • सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का अंतरिम आदेश रद्द करते हुए सभी संबंधित एजेंसियों को मिलकर ठोस और व्यावहारिक योजना तैयार करने का निर्देश दिया। अदालत ने मानसून से पहले त्वरित कार्रवाई पर जोर देते हुए कहा कि जलभराव और खराब ड्रेनेज व्यवस्था लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक और न्यायिक सीमाओं को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। 14 मई, 2026 को दिए अपने आदेश में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सीवर लाइन बिछाने या दूसरे बुनियादी ढांचे से जुड़े मुद्दों का प्रबंधन और प्रशासन देखना अदालतों का काम नहीं है। ऐसी समस्याओं का समाधान करना संबंधित सरकारी एजेंसियों और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि भीड़भाड़ वाली कॉलोनियों में बुनियादी सुविधाओं की कमी से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए न तो हाई कोर्ट और न ही सुप्रीम कोर्ट को प्रशासनिक संस्थाओं की भूमिका निभानी चाहिए। अदालतों का काम नीतियां बनाना या प्रशासनिक उपाय तय करना नहीं, बल्कि कानून के दायरे में रहकर न्याय सुनिश्चित करना है।

क्या है पूरा मामला?

गौरतलब है कि यह मामला तब सामने आया जब अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने दिल्ली हाई कोर्ट के 18 जून 2025 के अंतरिम आदेश को चुनौती दी। हाई कोर्ट ने उस आदेश में ग्रीन पार्क एक्सटेंशन और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की परेशानियों को दूर करने के लिए खुद पहल करते हुए दिल्ली जल बोर्ड, नगर निगम और एम्स को कई निर्देश जारी किए थे।

ये निर्देश ग्रीन पार्क एक्सटेंशन से अरबिंदो तक सीवर लाइन के डिजाइन और निर्माण से जुड़े मामले में दिए गए थे। हालांकि बाद में, 27 अक्टूबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के अंतरिम आदेश के अमल पर रोक लगा दी। इसके बाद मामले पर विस्तार से सुनवाई हुई और केंद्र सरकार को भी इस मुद्दे पर विचार करने के लिए पक्षकार बनाया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में दिल्ली सरकार पहले ही पक्षकार है। इसके अलावा दिल्ली जल बोर्ड, नगर निगम और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड सहित कई स्थानीय एजेंसियां भी मामले से जुड़ी हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि ग्रीन पार्क, ग्रीन पार्क एक्सटेंशन और आसपास के इलाकों के लोग जल निकासी की खराब व्यवस्था के कारण भारी परेशानियों का सामना कर रहे हैं। इन क्षेत्रों में मौजूद ड्रेनेज व्यवस्था बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अब पर्याप्त नहीं रह गई है। इसी कमी के कारण इलाके में गंभीर जलभराव की समस्या भी पैदा हो रही है।

हालांकि साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि इन समस्याओं का समाधान करना और कानून के अनुसार जरूरी कदम उठाना संबंधित सरकारी एजेंसियों और अधिकारियों की जिम्मेदारी है।

हाई कोर्ट ने पार की अपनी सीमा

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि इन समस्याओं पर ध्यान देना और कानून के तहत व्यावहारिक समाधान तैयार करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है। इस प्रक्रिया में सभी संबंधित पक्षों की भागीदारी जरूरी होगी, लेकिन समाधान निकालने का काम प्रशासनिक एजेंसियों को ही करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हालांकि यह रिट याचिका अभी भी हाई कोर्ट में लंबित है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अंतरिम आदेश जारी करते समय हाई कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर प्रशासनिक एजेंसियों की भूमिका निभाने की कोशिश की और खुद समाधान निकालने की जिम्मेदारी संभाल ली।

इसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के 18 जून, 2025 को दिए अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया है।

साथ ही अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे मामले के सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार करें और उचित समय के भीतर हाई कोर्ट को बताएं कि कॉलोनियों के निवासियों की समस्याओं के समाधान के लिए क्या योजना तैयार की गई है।

अदालत ने कहा कि यह काम जल्द किया जाना जरूरी है, क्योंकि मानसून का मौसम करीब है। ऐसे में कमजोर ड्रेनेज व्यवस्था के कारण जलभराव की समस्या और बढ़ सकती है, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर भी खतरा पैदा हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश: ‘अदालत नहीं, प्रशासन निकाले समाधान’

सुप्रीम कोर्ट ने मामले से जुड़ी सभी संबंधित एजेंसियों को साथ मिलकर काम करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि अधिकारी सभी पहलुओं पर विचार करें, सभी हितधारकों को भरोसे में लें और समस्या के प्रभावी व त्वरित समाधान के लिए ठोस योजना और व्यावहारिक उपाय तैयार करें।

साथ ही, अदालत ने निर्देश दिया कि संबंधित अधिकारी 20 जुलाई 2026 को होने वाली अगली सुनवाई से पहले दिल्ली हाई कोर्ट के समक्ष विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करें। इस रिपोर्ट में यह बताया जाए कि समस्या के समाधान के लिए क्या योजना बनाई गई है और उसे लागू करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट इस योजना पर हो रहे अमल की निगरानी कर सकता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि संबंधित एजेंसियां अपने काम में कोई कमी न छोड़ें।