कहीं लक्जरी न बन जाए साफ पानी; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
स्वच्छता

स्कूल में न पानी, न शौचालय, न साबुन: दुनिया में अब भी बुनियादी हाइजीन से दूर 54.5 करोड़ बच्चे

रिपोर्ट से पता चला है कि 2030 तक स्कूलों में पेयजल की सार्वभौमिक पहुंच हासिल करने के लिए प्रगति की मौजूदा रफ्तार को चार गुणा बढ़ाना होगा। इसी तरह स्वच्छता के मामले में इसे पांच गुणा तेज करना होगा।

Lalit Maurya

  • दुनिया भर में करोड़ों बच्चे हर दिन स्कूल तो पहुंचते हैं, लेकिन वहां उन्हें पीने का सुरक्षित पानी, इस्तेमाल करने लायक शौचालय और हाथ धोने के लिए साबुन-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिलतीं।

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ की नई रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में 42.9 करोड़ स्कूली बच्चे ऐसे थे जिनके स्कूल में बुनियादी पेयजल सुविधा नहीं थी। वहीं 46 करोड़ बच्चे बुनियादी स्वच्छता सुविधा से और 54.5 करोड़ बच्चे साबुन-पानी के साथ हाथ धोने की सुविधा से वंचित थे।

  • पिछले एक दशक में स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ है। 2015 में जहां दुनिया के 67 फीसदी स्कूलों में बुनियादी पेयजल सुविधा थी, 2025 में यह बढ़कर 78 फीसदी हो गई। लेकिन मौजूदा रफ्तार 2030 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

  • अगर यही गति बनी रही तो 2030 तक भी करीब 31.4 करोड़ बच्चे स्कूल में बुनियादी पेयजल सुविधा से वंचित रह सकते हैं।

  • इस असमानता की सबसे बड़ी मार गरीब देशों और उप-सहारा अफ्रीका के बच्चों पर पड़ रही है। कम आय वाले देशों में केवल 54 फीसदी स्कूलों में बुनियादी पानी, 50 फीसदी में स्वच्छता और 35 फीसदी में हाथ धोने की सुविधा है। उप-सहारा अफ्रीका में ये आंकड़े क्रमशः 46, 43 और 39 फीसदी हैं।

  • रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक सार्वभौमिक पहुंच हासिल करने के लिए पेयजल और हाइजीन की प्रगति की मौजूदा रफ्तार को चार गुना, जबकि स्वच्छता की रफ्तार को पांच गुना बढ़ाना होगा। यह केवल सुविधाओं का सवाल नहीं, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य, गरिमा और शिक्षा के अधिकार से जुड़ा मुद्दा है।

दुनिया भर में करोड़ों बच्चे हर सुबह आंखों में सपने और बेहतर भविष्य की उम्मीद लिए स्कूल पहुंचते हैं। उन्हें उम्मीद होती है कि स्कूल उन्हें पढ़ने, आगे बढ़ने और अपने सपनों को उड़ान देने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ माहौल देगा। लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा चिंताजनक है।

आज भी करोड़ों बच्चों के लिए स्कूल में पढ़ाई शुरू होने से पहले ही बुनियादी जरूरतों का संकट खड़ा हो जाता है। उनके स्कूलों में पीने के लिए सुरक्षित पानी नहीं, इस्तेमाल करने लायक शौचालय नहीं और साबुन-पानी से हाथ धोने तक की सुविधा उपलब्ध नहीं है।

यानी जिन जगहों को बच्चों के भविष्य की नींव मजबूत करनी चाहिए, वहां आज भी लाखों-करोड़ों बच्चे अपनी सबसे जरूरी जरूरतों के लिए जूझ रहे हैं।

स्कूल में बुनियादी सुविधाओं से वंचित करोड़ों बच्चे

एक नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 2025 में दुनिया के करीब 42.9 करोड़ स्कूली बच्चे ऐसे थे, जिनके स्कूल में पीने के पानी की बुनियादी सुविधा तक उपलब्ध नहीं थी। इनमें करीब 17.1 करोड़ बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ रहे थे, जहां पानी का बेहतर स्रोत तो मौजूद था, लेकिन जरूरत के समय पानी उपलब्ध नहीं होता था।

वहीं करीब 25.8 करोड़ बच्चों के स्कूलों में पेयजल की कोई बुनियादी सुविधा ही मौजूद नहीं थी। यानी करोड़ों बच्चों के लिए स्कूल की चारदीवारी के भीतर भी एक गिलास सुरक्षित पानी मिलना तय नहीं था। यह जानकारी विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनिसेफ के संयुक्त निगरानी कार्यक्रम (जेएमपी) द्वारा जारी नई रिपोर्ट ‘प्रोग्रेस ऑन ड्रिंकिंग वाटर, सैनिटेशन एंड हाइजीन इन स्कूल्ज 2015–2025’ में सामने आई है।

इस रिपोर्ट में स्कूलों में पानी, स्वच्छता और साफ-सफाई से जुड़ी सुविधाओं की वैश्विक तस्वीर को सामने रखा गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक यह सही है कि पिछले एक दशक में इस दिशा में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन दुनिया अभी भी 2030 तक सभी स्कूलों में इन बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लक्ष्य से काफी पीछे है।

स्कूलों में सिर्फ पेयजल सुविधाओं का ही आकाल नहीं है। रिपोर्ट से पता चला है कि 2025 में करीब 46 करोड़ बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ रहे थे जहां स्वच्छता से जुड़ी उपयोग करने लायक बुनियादी सुविधा तक उपलब्ध नहीं थी।

वहीं 54.5 करोड़ बच्चों के स्कूलों में साबुन और पानी के साथ हाथ धोने की सुविधा मौजूद नहीं थी। यानी स्कूल में पढ़ने वाले हर बच्चे के लिए जो सुविधाएं सामान्य और अनिवार्य होनी चाहिए थीं, वे आज भी करोड़ों बच्चों के लिए उपलब्ध नहीं हैं।

हर पांच में से एक स्कूल में पानी की बुनियादी सुविधा नहीं

रुझान दर्शाते हैं कि 2025 में दुनिया के करीब 78 फीसदी स्कूलों में पीने के पानी की बुनियादी सुविधा मौजूद थी। इसका मतलब है कि 22 फीसदी स्कूल अब भी इस सुविधा से वंचित हैं ।

रिपोर्ट के मुताबिक जहां 2015 में वैश्विक स्तर पर 67 फीसदी स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा मौजूद थी। वहीं एक दशक में यह आंकड़ा बढ़कर 78 फीसदी पर पहुंच गया। हालांकि, सुधार की जो मौजूदा रफ्तार है उसके लिहाज से देखें तो अभी भी हम 2030 में हर स्कूल तक पीने का पानी उपलब्ध कराने के लक्ष्य को हासिल करने से दूर हैं।

आंकड़े दर्शाते हैं कि इस रफ्तार से 2030 तक दुनिया के करीब 84 फीसदी स्कूलों में ही पेयजल की बुनियादी सुविधा पहुंच पाएगी। इसका अर्थ है कि तब भी करीब 31.4 करोड़ स्कूली बच्चे इस सुविधा से वंचित रह सकते हैं।

कमजोर देशों में स्थिति और गंभीर

रिपोर्ट दर्शाती है कि स्कूलों में साफ-सफाई और पीने के पानी जैसी सुविधाओं की उपलब्धता देशों की आर्थिक स्थिति के साथ भी गहराई से जुड़ी हुई है। उदाहरण के लिए आर्थिक रूप से कमजोर देशों में 2025 में केवल 54 फीसदी स्कूलों में पीने के पानी की बुनियादी सुविधा मौजूद थी।

वहीं करीब 50 फीसदी स्कूलों में बुनियादी स्वच्छता और सिर्फ 35 फीसदी स्कूलों में हाथ धोने की सुविधा उपलब्ध थी।

इसके उलट, उच्च आय वाले देशों में इन तीनों सुविधाओं की पहुंच 99 फीसदी से अधिक है। यह अंतर साफ तौर पर बताता है कि स्कूल में साफ पानी, शौचालय और हाथ धोने की सुविधा केवल शिक्षा का मुद्दा नहीं है। यह गरीबी, असमानता, स्वास्थ्य और बच्चों की गरिमा से भी जुड़ा सवाल है।

उप-सहारा अफ्रीका में संकट सबसे गहरा

क्षेत्रीय स्तर पर सबसे गंभीर स्थिति उप-सहारा अफ्रीका में देखी गई है। यहां 2025 में महज 46 फीसदी स्कूलों में पीने के पानी की बुनियादी सुविधा उपलब्ध थी। इसी तरह स्वच्छता से जुड़ी बुनियादी सुविधा सिर्फ 43 फीसदी और हाथ धोने की सुविधा केवल 39 फीसदी स्कूलों में उपलब्ध थी।

आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया भर के स्कूलों में पेयजल से जुड़ी सुविधा से वंचित करीब 42.9 करोड़ बच्चों में से 25 करोड़ उप-सहारा अफ्रीका में रह रहे हैं। यानी ऐसे हर पांच बच्चों में करीब तीन इसी क्षेत्र से हैं।

कुछ क्षेत्रों ने तेज प्रगति की, लेकिन तस्वीर असमान

वहीं राहत की बात यह है कि 2015 से 2025 के बीच मध्य और दक्षिण एशिया के स्कूलों में पीने के पानी की पहुंच 56 फीसदी से बढ़कर 86 फीसदी हो गई। वहीं उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया में यह 73 फीसदी से बढ़कर 94 फीसदी तक पहुंच गई है।

इसके विपरीत, उप-सहारा अफ्रीका में सुधार बेहद धीमा रहा और कवरेज केवल 42 से बढ़कर 46 फीसदी पर ही पहुंची है। इसी तरह ओशिनिया में यह 52 से 55 फीसदी और पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया में 87 से 91 फीसदी हुई है। एक अलग रुझान यह देखा गया है कि दक्षिण अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र में इस अवधि में कवरेज 73 फीसदी से घटकर 68 फीसदी रह गई।

2030 का लक्ष्य हासिल करने के लिए कई गुना बढ़ानी होगी रफ्तार

बता दें कि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास के लक्ष्यों के तहत 2030 तक दुनिया के करीब सभी स्कूलों में पाने के पानी और साफ-सफाई एवं स्वच्छता से जुड़ी बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन चिंता की बात है कि मौजूदा प्रगति इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

रिपोर्ट के मुताबिक स्कूलों में बुनियादी पेयजल की सार्वभौमिक पहुंच हासिल करने के लिए मौजूदा प्रगति की रफ्तार को चार गुणा बढ़ाना होगा। इसी तरह स्वच्छता के मामले में इसे पांच गुणा तेज करना होगा। रिपोर्ट ने चिंता जताई है कि अगर मौजूदा रफ्तार में बदलाव नहीं आया तो 2030 में भी करीब 10 फीसदी स्कूलों में पानी, 7 फीसदी में स्वच्छता और 12 फीसदी में हाथ धोने की बुनियादी सुविधा उपलब्ध नहीं होगी।

सच कहें तो स्कूल में साफ पानी या इस्तेमाल लायक शौचालय होना किसी अतिरिक्त सुविधा की तरह नहीं देखा जा सकता। यह बच्चों के स्वास्थ्य, सम्मान और पढ़ाई के लिए जरूरी बुनियादी जरूरत है।

खासकर बच्चियों के लिए सुरक्षित और साफ शौचालय का न होना स्कूल में उनकी नियमित उपस्थिति और गरिमा को प्रभावित कर सकता है। इसी तरह पानी और साबुन की कमी संक्रमण और बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकती है।

देखा जाए तो इस रिपोर्ट का संदेश बेहद स्पष्ट है, 2030 तक का लक्ष्य अब केवल पांच साल दूर है, लेकिन दुनिया को अभी अपनी रफ्तार कई गुना बढ़ानी होगी। वरना करोड़ों बच्चे स्कूल तो पहुंचेंगे, लेकिन वहां उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ उन बुनियादी सुविधाओं के अभाव का सामना करना पड़ेगा, जिन्हें दुनिया के कई हिस्सों में सामान्य और जरूरी माना जाता है।