दिल्ली में कचरा प्रबंधन की बदहाल व्यवस्था से जुड़ी दो याचिकाओं पर 14 अक्टूबर 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में सुनवाई हुई।
पहले मामले में ट्रिब्यूनल ने सिंघोला डंप साइट पर जमा करीब 59,174 मीट्रिक टन गाद के निपटान को लेकर दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) से विस्तृत जानकारी मांगी।
निगम ने यहां प्रतिदिन 700 टन गाद और ताजा कचरे के प्रसंस्करण के लिए केंद्र स्थापित करने की योजना बताई है, लेकिन इसके शुरू होने और पहले से जमा गाद हटाने की समयसीमा स्पष्ट नहीं की। एनजीटी ने एमसीडी को नया हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।
दूसरे मामले में दक्षिण-पूर्वी दिल्ली की जंगपुरा-ए कॉलोनी में धार्मिक संस्थान और बाल गृह के पास स्थित कूड़े के ढलाव का मुद्दा उठा।
आवेदक ने इससे आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर संभावित खतरे की चिंता जताई। उनके वकील ने सुझाव दिया कि इस ढलाव को बंद कर कचरा पंत नगर स्थित पोर्टेबल कॉम्पैक्टर ट्रांसफर स्टेशन तक भेजा जा सकता है, जैसा जंगपुरा एक्सटेंशन में किया जा रहा है।
एमसीडी ने अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा। मामले की अगली सुनवाई 3 फरवरी 2027 को होगी। दोनों मामले इस सवाल को सामने लाते हैं कि कचरे का निपटान ऐसी व्यवस्था से कैसे हो, जिससे पर्यावरण के साथ-साथ आसपास रहने वाले लोगों, खासकर बच्चों, के स्वास्थ्य और स्वच्छता की रक्षा हो सके।
दिल्ली में नालों की सफाई से निकली गाद को हटाने के बजाय एक जगह जमा कर देना अब पर्यावरण और कचरा प्रबंधन से जुड़ा गंभीर सवाल बन गया है।
राजधानी के सिंघोला डंप साइट में जुलाई 2025 से अब तक करीब 59,174 मीट्रिक टन गाद जमा हो चुकी है। इसे हटाने और सुरक्षित तरीके से निपटाने की ठोस योजना क्या है, इसकी स्पष्ट जानकारी दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को नहीं दी है।
इस पर सख्त रुख अपनाते हुए एनजीटी ने 14 अक्टूबर 2026 को एमसीडी को नया हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। ट्रिब्यूनल ने निगम से सिंघोला में जमा कचरे और गाद को हटाने की पूरी योजना, काम की समयसीमा और निपटान के लिए उठाए जा रहे कदमों का ब्योरा मांगा है।
न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की पीठ ने कहा कि एमसीडी के हलफनामे में ठेके की प्रकृति, गाद को हटाने की समयसीमा, प्रस्तावित प्रसंस्करण केंद्र के विवरण और कचरे की सफाई के लिए की जा रही कार्रवाई की पर्याप्त जानकारी नहीं है।
एमसीडी ने 13 अक्टूबर 2026 को एनजीटी में एक स्थिति रिपोर्ट दाखिल की थी। इसमें निगम ने बताया कि मानसून से पहले नालों की सफाई का काम जरूरी होने के कारण जुलाई 2025 में सिंघोला में गाद जमा करना शुरू किया गया था।
निगम के मुताबिक, यहां केवल नालों से निकली गाद डाली गई है। यह गाद नालों में पानी का बहाव बनाए रखने के लिए हर साल की जाने वाली सफाई के दौरान निकाली गई थी। एमसीडी ने स्पष्ट किया कि सिंघोला में दूसरे प्रकार का कचरा या निर्माण एवं तोड़फोड़ से निकला मलबा नहीं डाला गया है।
हालांकि, नालों की सफाई से निकली गाद को एक जगह जमा करने के बाद उसके निपटान की व्यवस्था करना भी उतना ही जरूरी है। एमसीडी की रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2025 से अब तक सिंघोला में कुल 59,173.947 मीट्रिक टन गाद जमा की जा चुकी है।
एमसीडी ने एनजीटी को बताया कि सिंघोला में गाद के नए ढेर बनने से रोकने के लिए एक प्रसंस्करण और निपटान केंद्र स्थापित किया जा रहा है।
इस केंद्र की क्षमता हर दिन 700 टन ताजा कचरे और गाद को प्रोसेस करने की होगी। निगम के अनुसार, केंद्र शुरू होने के बाद वहां पहले से जमा करीब 59,174 मीट्रिक टन गाद को भी प्रोसेस कर उसका निपटान किया जाएगा। इस केंद्र की स्थापना का काम 7 जुलाई 2026 को एक ठेकेदार को सौंपा गया था।
लेकिन केंद्र कब तक तैयार होगा, गाद हटाने का काम कब शुरू होगा और पूरी जमा गाद के निपटान में कितना समय लगेगा, इन अहम सवालों के जवाब एमसीडी की रिपोर्ट में नहीं दिए गए। यही वजह है कि एनजीटी ने निगम से विस्तृत जानकारी मांगी है।
गौरतलब है कि सिंघोला में कचरे के ढेर बढ़ने का मामला पहले भी सामने आ चुका है। एनजीटी ने 4 नवंबर 2024 को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित खबर पर स्वतः संज्ञान लेते हुए इस मामले की सुनवाई शुरू की थी।
खबर में दिल्ली के सिंघोला और नरेला इलाकों में कचरा प्रबंधन की खराब व्यवस्था के कारण कचरे के दो नए पहाड़ बनने की समस्या उजागर की गई थी।
अब ट्रिब्यूनल ने एमसीडी से जमा गाद और कचरे को हटाने की स्पष्ट कार्ययोजना मांगी है। नालों को साफ रखना जरूरी है, लेकिन सफाई के नाम पर निकली गाद का लंबे समय तक खुले में जमा रहना भी चिंता का विषय है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि सफाई से पैदा हुआ कचरा एक जगह से हटकर दूसरी जगह पर्यावरण के लिए समस्या न बन जाए।
दिल्ली की जंगपुरा-ए कॉलोनी में कूड़े के ढलाव को लेकर लोगों की चिंता अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) तक पहुंच गई है। आवेदक का कहना है कि यह ढलाव एक धार्मिक संस्थान और बाल गृह के पास है, जिससे वहां रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर खतरा पैदा हो सकता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जिन जगहों पर बच्चों को सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए और लोग शांति की तलाश में आते हैं, उनके आसपास जमा होने वाले कचरे से निजात कब मिलेगी?
14 अक्टूबर 2026 को इस मामले की सुनवाई के दौरान नगर निगम दिल्ली (एमसीडी) के वकील ने निगम का पक्ष रखने के लिए अदालत से समय मांगा। अब इस मामले में अगली सुनवाई 3 फरवरी 2027 को होगी।
सुनवाई के दौरान आवेदक के वकील ने एक विकल्प भी सुझाया। उन्होंने बताया कि जंगपुरा एक्सटेंशन में पहले मौजूद कूड़े के ढलाव को बंद किया जा चुका है। अब वहां से निकलने वाला कचरा पंत नगर स्थित पोर्टेबल कॉम्पैक्टर ट्रांसफर स्टेशन (पीसीटीएस) के जरिए भेजा जाता है। वकील के मुताबिक, जंगपुरा-ए कॉलोनी में भी इसी व्यवस्था को अपनाया जा सकता है।
यहां के ढलाव को बंद करके कचरे को पंत नगर स्थित पीसीटीएस तक पहुंचाया जा सकता है। इससे कॉलोनी में कचरा जमा होने और उससे जुड़ी परेशानियों को कम करने में मदद मिल सकती है।
कूड़े का ढलाव महज कचरा जमा करने की जगह नहीं होता। अगर वहां नियमित रूप से कचरा जमा होता रहे और उसे समय पर न उठाया जाए तो आसपास रहने वाले लोगों को दुर्गंध, गंदगी और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है। बच्चों, बुजुर्गों और दूसरे संवेदनशील लोगों के लिए ऐसी परिस्थितियां विशेष चिंता का विषय बन सकती हैं।
दिल्ली में कूड़े के ढलाव आमतौर पर तीन तरफ से दीवारों से घिरे खुले स्थान होते हैं, जहां सफाई कर्मचारी रोजाना इकट्ठा किया गया कचरा डालते हैं। बाद में इसे बड़े ट्रकों में भरकर आगे ले जाया जाता है।
जंगपुरा-ए कॉलोनी के मामले में अब नजरें एमसीडी के रुख और आगे होने वाली सुनवाई पर हैं। लोगों की चिंता का समाधान केवल कचरा एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करना भी है, जिससे रिहायशी इलाकों में स्वच्छता बनी रहे और लोगों को अपने घरों के आसपास गंदगी और उससे पैदा होने वाले संभावित खतरों के बीच रहने को मजबूर न होना पड़े।