मुला नदी पर संयुक्त समिति की रिपोर्ट ने एक गंभीर पर्यावरणीय संकट को उजागर किया है। कभी पुणे की जीवनरेखा रही यह नदी आज घरेलू और औद्योगिक सीवेज के बोझ तले दम तोड़ रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, बिना उपचार के छोड़ा जा रहा गंदा पानी नदी की जल गुणवत्ता को लगातार खराब कर रहा है, जिससे घुलित ऑक्सीजन का स्तर घट रहा है और मछलियों सहित जलीय जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
जांच में यह भी सामने आया कि कई छोटे आवासीय और व्यावसायिक परिसरों में सीवेज उपचार की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, जिसके कारण गंदा पानी सीधे नालों के माध्यम से नदी में पहुंच रहा है।
संयुक्त समिति ने 100 प्रतिशत सीवेज उपचार, सीवर नेटवर्क के विस्तार, नए और उन्नत एसटीपी, इंटरसेप्टर लाइनें तथा समयबद्ध निगरानी जैसी ठोस सिफारिशें की हैं।
यह रिपोर्ट केवल एक प्रदूषित नदी की कहानी नहीं, बल्कि जल संसाधनों, जैव विविधता और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर मंडरा रहे बड़े खतरे की चेतावनी है। अब सबसे बड़ी चुनौती इन सिफारिशों को कागजों से निकालकर जमीन पर लागू करने की है, क्योंकि समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो मुला नदी को पुनर्जीवित करना और कठिन हो जाएगा।
मुला नदी, जो कभी पुणे और उसके आसपास के इलाकों की जीवनदायिनी थी, आज खुद अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रही है। शहरों और उद्योगों से निकलने वाला गंदा पानी (सीवेज) नदी में जहर घोल रहा है, जिससे इसका अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। 8 जुलाई 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में सौंपी गई एक संयुक्त समिति की रिपोर्ट में यह दर्दनाक हकीकत सामने आई है।
रिपोर्ट में सामने आया है कि पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ क्षेत्र में आने वाले कस्बों और उद्योगों से निकलने वाले घरेलू सीवेज की वजह से मूला नदी की जलगुणवत्ता खराब हो रही है।
यह रिपोर्ट नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में उस मामले की सुनवाई के बाद प्रस्तुत की गई, जिसकी शुरुआत 23 सितंबर 2024 को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित खबर के आधार पर हुई थी। इस खबर में बताया गया था कि मूला नदी में बड़ी संख्या में मछलियों की मौत का मुख्य कारण नदी में छोड़ा जा रहा घरेलू और औद्योगिक गंदा पानी है।
मछलियों की मौत से खुला प्रदूषण का राज
इससे पानी में मौजूद ऑक्सीजन (डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन) का स्तर घट रहा है, जो जलीय जीवों के लिए जीवनदायी होती है। प्रदूषकों पर पनपने वाले बैक्टीरिया ऑक्सीजन की खपत बढ़ा देते हैं, जिससे मछलियां दम घुटने से मर जाती हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए 24 फरवरी 2026 को एनजीटी ने एक संयुक्त समिति के गठन का निर्देश दिया था।
समिति को मुला नदी में बढ़ते प्रदूषण का अध्ययन कर यह बताने को कहा गया कि नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए कितने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की जरूरत है, मौजूदा एसटीपी को अपग्रेड करने की आवश्यकता है या नहीं, और भविष्य में शहर की आबादी को ध्यान में रखते हुए इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों से कितनी धनराशि चाहिए। एनजीटी ने समिति को अन्य जरूरी उपाय भी सुझाने के निर्देश दिए गए थे।
जांच में सामने आई नदी की बदहाल तस्वीर
संयुक्त समिति कोर्ट के निर्देशानुसार 1 जून 2026 को मुला नदी और उसके आसपास के क्षेत्रों का निरीक्षण किया। इस दौरान सदस्यों ने हिंजेवाड़ी से लेकर पुणे के संगम ब्रिज तक नदी और उसके आसपास के क्षेत्र का दौरा कर स्थिति का जायजा लिया।
समिति ने जांच के दौरान पाया कि पुणे नगर निगम (पीएमसी) और पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम (पीसीएमसी) के अधिकार क्षेत्र में आने वाले महालुंगे, बालेवाड़ी और वाकड़ जैसे इलाकों के कई रिहायशी और व्यावसायिक क्षेत्रों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) नहीं हैं। हालांकि जहां सीवर नेटवर्क नहीं है, वहां भवन निर्माण की अनुमति केवल सेप्टिक टैंक की शर्त पर दी जाती है।
समिति ने यह भी पाया कि मुला नदी के बाएं किनारे स्थित कई बड़ी निर्माण परियोजनाओं (20,000 वर्गमीटर से अधिक) में अपने स्वयं के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) हैं और इन परियोजनाओं में ट्रीटमेंट के बाद साफ किए पानी का उपयोग बागवानी, फ्लशिंग तथा अन्य आंतरिक कार्यों में किया जाता है।
लेकिन 20,000 वर्गमीटर से छोटी इमारतों में सीवेज उपचार की समुचित व्यवस्था नहीं है। वहां से बिना ट्रीटमेंट के निकलने वाला घरेलू गंदा पानी सीधे नालों में छोड़ा जा रहा है, जो अंततः मुला नदी में जाकर मिल जाता है।
समिति ने सुझाया नदी बचाने का रोडमैप
ऐसे में संयुक्त समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्थानीय निकायों को समयबद्ध कार्ययोजना के तहत नदी में छोड़े जाने वाले 100 फीसदी सीवेज का उपचार सुनिश्चित करने की सिफारिश की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा नालों से सीवेज को रोककर ट्रीटमेंट प्लांट तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाए या जहां संभव हो, वहीं इन-सीटू ट्रीटमेंट की व्यवस्था विकसित की जाए ताकि प्रदूषण का बोझ कम हो सके।
इसके अलावा, पूरे क्षेत्र में 100 फीसदी सीवर नेटवर्क, नदी किनारे इंटरसेप्टर लाइनें, प्रस्तावित एसटीपी का जल्द से जल्द निर्माण तथा मौजूदा ट्रीटमेंट प्लांट की नियमित निगरानी और प्रभावी संचालन सुनिश्चित करने की भी सिफारिश रिपोर्ट में की गई है।
देखा जाए तो मुला नदी की बिगड़ती सेहत केवल एक नदी पर मंडराता संकट नहीं है, बल्कि यह लोगों के जल संसाधन, जैव विविधता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चेतावनी है। यदि बिना ट्रीटमेंट के सीवेज का प्रवाह जल्द न रोका गया और सीवेज प्रबंधन व्यवस्था को समयबद्ध तरीके से मजबूत नहीं किया गया, तो नदी को पुनर्जीवित करना और भी कठिन हो जाएगा।
ऐसे में अब एनजीटी के निर्देशों को धरातल पर उतारना संबंधित एजेंसियों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। कागजी योजनाओं से आगे बढ़कर ठोस और समयबद्ध कार्रवाई ही मूला नदी को प्रदूषण से बचा सकती है।