गंगा के बाढ़ क्षेत्र से लेकर आगरा की ऐतिहासिक नहरों तक, अतिक्रमण और जलधाराओं के अस्तित्व का संकट अदालतों तक पहुंच गया है।
बिहार में गंगा के किनारों पर बने अवैध निर्माण हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को 12 सप्ताह की अतिरिक्त मोहलत दी है। बाढ़ का पानी नहीं उतरने के कारण प्रशासन फिलहाल कार्रवाई पूरी नहीं कर पा रहा है। अदालत ने यह राहत प्राकृतिक आपदा से पैदा हुई परिस्थितियों को देखते हुए दी है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होगी।
दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश के आगरा में ऐतिहासिक नहर प्रणाली की जलधाराओं पर अतिक्रमण और प्रदूषण का मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) पहुंच गया है।
याचिकाकर्ता ने सिकंदरा डिस्ट्रिब्यूटरी और मघाटी माइनर की बिगड़ती स्थिति पर चिंता जताते हुए ऐतिहासिक दस्तावेजों, तस्वीरों और उपग्रह चित्रों के जरिए इनके संरक्षण का मुद्दा उठाया है।
एनजीटी ने आगरा नगर निगम, जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 4 जनवरी 2027 को होगी।
दोनों मामले नदियों और ऐतिहासिक जलधाराओं को अतिक्रमण से मुक्त रखने, प्रदूषण रोकने और उनके संरक्षण के लिए प्रभावी कार्रवाई की जरूरत रेखांकित करते हैं।
गंगा के किनारों को अतिक्रमण मुक्त करने की कार्रवाई में बाढ़ का पानी बाधा बन गया है। बिहार के पटना में नौजर से नूरपुर घाट के बीच नदी के बाढ़ क्षेत्र में बने अवैध निर्माणों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को 12 सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने 8 अक्टूबर 2026 को दिए आदेश में यह राहत दी। सुनवाई के दौरान बिहार सरकार की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि इलाके में बाढ़ की स्थिति अभी सामान्य नहीं हुई है और नदी का जलस्तर भी नहीं घटा है। ऐसे में प्रशासन के लिए अदालत के निर्देशों के मुताबिक सभी अवैध निर्माणों को हटाना फिलहाल संभव नहीं हो पा रहा है।
स्थिति को देखते हुए अदालत ने प्राकृतिक आपदा के मद्देनजर अधिकारियों को अतिक्रमण हटाने की पूरी प्रक्रिया संपन्न करने के लिए 12 सप्ताह का समय दिया। अब इस मामले में अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होगी।
गौरतलब है कि पूरा मामला गंगा के बाढ़ क्षेत्र में अवैध निर्माण और अतिक्रमण से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले नदी के किनारों से सभी अवैध निर्माण हटाने के निर्देश दिए थे। अब प्रशासन को बाढ़ का पानी उतरने और हालात अनुकूल होने के बाद इस कार्रवाई को पूरा करना होगा।
उत्तर प्रदेश के आगरा में ऐतिहासिक आगरा नहर प्रणाली की जलधाराओं पर अतिक्रमण और उनके धीरे-धीरे गायब होने का मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) पहुंच गया है।
आरोप है कि सिकंदरा डिस्ट्रिब्यूटरी और मघाटी माइनर सहित नहर प्रणाली की कुछ जलधाराएं अतिक्रमण और प्रदूषण की चपेट में हैं। इससे न केवल इन जलधाराओं के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो रहा है, बल्कि उनके संरक्षण को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
एनजीटी ने 12 अक्टूबर 2026 को इस मामले पर सुनवाई करते हुए संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है। साथ अधिकरण ने प्रतिवादियों से भी जवाब मांगा है। इस मामले की अगली सुनवाई 4 जनवरी 2027 को होगी।
गौरतलब है कि आवेदक अजय प्रताप सिंह ने अपनी याचिका में 1905 के आगरा गजेटियर, खंड आठ का हवाला देते हुए कहा कि इसमें संबंधित नहर और जलधाराओं का उल्लेख मिलता है।
उन्होंने 5 अक्टूबर 1954 की अधिसूचना का भी संदर्भ दिया, जिसके तहत निर्धारित क्षेत्र में आगरा नहर की सिकंदरा डिस्ट्रिब्यूटरी को संरक्षित वन घोषित किए जाने की बात कही गई है।
आवेदक ने नहर की मौजूदा स्थिति दर्शाने के लिए तस्वीरें और उपग्रह से प्राप्त चित्र भी प्रस्तुत किए। उनका कहना है कि संबंधित जलधारा न केवल प्रदूषण से प्रभावित है, बल्कि उस पर अतिक्रमण भी किया गया है। इन साक्ष्यों के जरिए उन्होंने नहर की बिगड़ती स्थिति और उसके अस्तित्व पर मंडराते खतरे की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित किया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने आगरा नगर निगम के नगर आयुक्त, आगरा के जिलाधिकारी, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष और ताज ट्रेपेजियम जोन के अध्यक्ष सहित अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है। सभी प्रतिवादियों को अपना जवाब दाखिल करना होगा।
ऐसे में अब अगली सुनवाई में ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि संबंधित विभाग इन ऐतिहासिक जलधाराओं पर अतिक्रमण और प्रदूषण के आरोपों पर क्या जवाब देते हैं और उनके संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।