प्लास्टिक प्रदूषण अब सिर्फ सड़कों, नदियों और समुद्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जंगल की ऊंची छतरी और वहां रहने वाले वन्यजीवों तक भी पहुंच चुका है।
मैक्सिको के लॉस टुक्स्टलस बायोस्फीयर रिजर्व में संकटग्रस्त मेक्सिकन हाउलर बंदरों के मल के 66 नमूनों में से 90 फीसदी से अधिक में माइक्रोप्लास्टिक के कण पाए गए। वैज्ञानिकों ने 31 अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक पॉलिमर की पहचान की, जिनमें पॉलीएथिलीन और बोतलों व पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाला पीईटी भी शामिल है।
ये बंदर अपना अधिकांश जीवन पेड़ों की ऊंची डालियों पर बिताते हैं और पत्तियां व फल खाते हैं। ऐसे में उनकी मौजूदगी में माइक्रोप्लास्टिक मिलना इस बात का संकेत है कि हवा, बारिश, पत्तियों और भोजन के जरिए प्लास्टिक प्रदूषण जंगल की सबसे ऊंची परतों तक पहुंच रहा है। हालांकि अध्ययन यह साबित नहीं करता कि इन कणों से बंदरों को बीमारी हो रही है।
यह खोज इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ये बंदर पहले ही जंगलों के विनाश और मानवीय दबाव से संकट में हैं। अब वैज्ञानिकों के सामने यह समझने की चुनौती है कि माइक्रोप्लास्टिक उनके स्वास्थ्य और भविष्य पर कितना असर डाल सकता है।
जंगल का वह हिस्सा जो जमीन से बहुत ऊपर, ऊंचे पेड़ों की टहनियों पर बसता है, उसे हमेशा शहरी कचरे, सड़कों के किनारे पड़े प्लास्टिक और जलती पॉलिथीन के धुएं से दूर माना जाता था। लेकिन प्रकृति का यह 'सुरक्षित आशियाना' भी अब इंसानी लापरवाही से अछूता नहीं रहा।
वैज्ञानिकों को मैक्सिको के एक संरक्षित जंगल में विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके 'मेक्सिकन हाउलर बंदरों' में माइक्रोप्लास्टिक्स की मौजूदगी के सबूत मिले हैं। रिसर्च में इन बंदरों के मल के 66 में से 90 फीसदी से अधिक नमूनों में प्लास्टिक के बेहद बारीक कण मिले हैं।
गौरतलब है कि ये बंदर अपना अधिकांश समय पेड़ों की ऊंची डालियों पर बिताते हैं और मुख्य रूप से पत्तियां और फल खाते हैं। यानी प्लास्टिक प्रदूषण अब केवल समुद्र, नदियों और जमीन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि जंगल की ऊंची छतरी तक पहुंच चुका है।
यह अध्ययन मैक्सिको के वेराक्रूज स्थित लॉस टुक्स्टलास बायोस्फीयर रिजर्व में किया गया। शोधकर्ताओं के मुताबिक, अमेरिका महाद्वीप में किसी संकटग्रस्त प्राइमेट में माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क का यह अब तक का सबसे पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण है।
जंगल की ऊंची छतरी भी प्लास्टिक से सुरक्षित नहीं
बता दें कि माइक्रोप्लास्टिक प्लास्टिक के बेहद छोटे टुकड़े, रेशे या कण होते हैं। इनका आकार इतना छोटा होता है कि वे आसानी से दिखाई नहीं देते। हालांकि हवा, पानी और मिट्टी के साथ ये लंबी दूरी तक पहुंच सकते हैं। वहीं हाउलर बंदरों की जिंदगी का बड़ा हिस्सा पेड़ों पर ही गुजरता है।
उनकी लंबी, पकड़ बनाने वाली पूंछ और पेड़ों पर रहने की आदत उसे जमीन से काफी दूर रखती है। इसलिए वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि शायद यह जीवनशैली उन्हें जमीन के आसपास मौजूद प्रदूषण से कुछ हद तक बचाती होगी। लेकिन जो निष्कर्ष सामने आए हैं वे बिल्कुल इसके उलट हैं।
शोधकर्ता मारिया फर्नांडा अल्वारेज-वेलास्केज और उनकी टीम ने बिना बंदरों को पकड़े उनके मल के नमूने एकत्र किए। प्रयोगशाला में एटीआर-एफटीआईआर नामक इन्फ्रारेड तकनीक से इन कणों की पहचान की गई। यह तकनीक किसी पदार्थ की रासायनिक पहचान बताती है, जिससे यह पुष्टि करने में मदद मिलती है कि मिला हुआ कण वास्तव में प्लास्टिक है या मिट्टी, पौधे अथवा कोई अन्य पदार्थ।
66 में से 90 फीसदी से ज्यादा नमूनों में मिले प्लास्टिक के कण
जांच में 66 नमूनों में से 90 फीसदी से अधिक में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी की पुष्टि हुई। वैज्ञानिकों ने इसमें प्लास्टिक के 31 अलग-अलग प्रकार के पॉलिमर की पहचान की है। इनमें पॉलीएथिलीन सबसे अधिक पाया गया। स्टडी में कुछ ऐसे प्लास्टिक भी मिले, जिनका इस्तेमाल आमतौर पर पेय पदार्थों की बोतलों और पैकेजिंग में होता है। इनमें पीईटी भी शामिल था।
प्लास्टिक के कुछ प्रकारों को अध्ययन में रासायनिक खतरे से जुड़ी श्रेणियों में रखा गया। हालांकि वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि इसका मतलब यह नहीं है कि बंदरों को प्लास्टिक से कोई बीमारी हो रही है। इनके मल में माइक्रोप्लास्टिक का मिलना यह बताता है कि बंदर इनके संपर्क में आए और संभवतः इन्हें निगल गए। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि ये कण उनके शरीर के अंगों में जमा हो गए हैं या बीमारी पैदा कर रहे हैं।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ हैजर्डस मैटेरियल्स एडवांसेज में प्रकाशित हुए हैं।
आखिर पेड़ों की इतनी ऊंचाई तक कैसे पहुंचा प्लास्टिक?
इस अध्ययन में सामने आया सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर प्लास्टिक के ये कण पेड़ों की इतनी ऊंचाई तक कैसे पहुंचे। शोधकर्ताओं का इस बारे में अनुमान है कि हवा माइक्रोप्लास्टिक को दूर-दराज तक ले जा सकती है। ये कण पेड़ों की पत्तियों और फलों पर जम सकते हैं और भोजन करते समय बंदरों के शरीर में पहुंच सकते हैं।
साथ ही बारिश भी इन कणों को पेड़ों की सतह या पानी के छोटे स्रोतों तक पहुंचा सकती है। बंदरों का एक-दूसरे की सफाई करना यानी ग्रूमिंग भी एक संभावित रास्ता हो सकता है। जहां फर पर चिपके प्लास्टिक के कण मुंह तक पहुंच सकते हैं। इसके साथ ही सांसों के जरिए भी माइक्रोप्लास्टिक के शरीर में जाने की आशंका है। हालांकि मौजूदा अध्ययन इन सभी रास्तों में से किसी एक को निश्चित रूप से साबित नहीं करता।
यानी जंगल की ऊंची छतरी शायद हवा में तैरते प्रदूषण को रोक नहीं पाती। जो प्लास्टिक जमीन से उड़ता है, वह पत्तियों पर बैठ सकता है और फिर उसी पत्ती या फल के साथ बंदर के पेट तक पहुंच सकता है।
इससे पहले ब्राजील में भी मिला था संकेत
देखा जाए तो यह खोज पूरी तरह अप्रत्याशित भी नहीं है। इससे पहले सितंबर 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में ब्राजील के अमेजन क्षेत्र में रहने वाले दो रेड हाउलर बंदरों के पेट में हरे रंग के प्लास्टिक रेशे पाए गए थे। वह पेड़ों पर रहने वाले प्राइमेट में माइक्रोप्लास्टिक के निगलने का शुरुआती प्रमाण था। हालांकि
मैक्सिको का नया अध्ययन इससे आगे जाता है, क्योंकि इसमें अधिक संख्या में नमूने लिए गए और प्लास्टिक की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक प्रयोगशाला तकनीक का इस्तेमाल किया गया।
कचरा जलाने से जंगल तक पहुंच सकता है प्लास्टिक
शोधकर्ताओं ने अध्ययन में जंगल के आसपास के कचरे के स्रोतों पर भी ध्यान दिया है। प्लास्टिक की बोतलें, पैकेजिंग, बैग और अन्य कचरा अगर खुले में फेंका या जलाया जाए तो उसके छोटे कण हवा में फैल सकते हैं।
हवा इन कणों को जंगल की ओर ले जा सकती है। वहां वे पत्तियों, फलों और पानी पर जमा हो सकते हैं। हालांकि वैज्ञानिकों ने अभी किसी एक स्रोत को माइक्रोप्लास्टिक का निश्चित कारण नहीं बताया है। जंगल के आसपास का कचरा, सिंथेटिक फाइबर, खुले में कचरा जलाना और दूर से आने वाला वायु प्रदूषण, इन सभी की इसमें भूमिका हो सकती है।
पहले से संकट में हैं ये बंदर
मैक्सिकन हाउलर बंदर पहले ही अस्तित्व के संकट से गुजर रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण जंगलों का खत्म होना और उनका छोटे-छोटे हिस्सों में बंट जाना है। शिकार और अन्य मानवीय दबाव भी इनके लिए खतरा बन रहे हैं।
वहीं अब माइक्रोप्लास्टिक का संपर्क इस संकटग्रस्त प्रजाति के सामने एक और सवाल खड़ा कर रहा है। हालांकि वैज्ञानिक अभी यह नहीं जानते कि माइक्रोप्लास्टिक का इन बंदरों की सेहत पर कितना असर पड़ रहा है। क्या इससे उनकी प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है? क्या पाचन, पोषण या प्रजनन पर असर पड़ता है? क्या लंबे समय में इनके अस्तित्व पर कोई प्रभाव पड़ सकता है? इन सवालों के जवाब अभी खोजे जाने बाकी हैं।
जंगल बचाने का मतलब अब सिर्फ पेड़ों को बचाना नहीं
देखा जाए तो संरक्षित जंगलों में पेड़ों और वन्यजीवों की रक्षा बेहद जरूरी है, लेकिन यह अध्ययन संरक्षण की एक नई तस्वीर सामने रखता है। अगर हवा के साथ प्लास्टिक जंगल की छतरी तक पहुंच सकता है, तो जंगल को केवल उसकी सीमा के भीतर सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं होगा। उसके आसपास के कचरे, खुले में कचरा जलाने और प्लास्टिक के इस्तेमाल को भी नियंत्रित करना होगा।
शोधकर्ताओं का सुझाव है कि जंगल के आसपास कचरा जलाने पर रोक, बेहतर कचरा प्रबंधन और वन क्षेत्रों के पास डंपिंग को रोकना तत्काल कदम हो सकते हैं। स्थानीय समुदायों को सरल भाषा में इस समस्या की जानकारी देना भी जरूरी है। लेकिन समस्या का समाधान केवल जंगल के आसपास नहीं है। प्लास्टिक का उत्पादन, इस्तेमाल और निपटान—इन सभी स्तरों पर बदलाव की जरूरत है।
अभी कई सवालों के जवाब खोजने हैं बाकी
वैज्ञानिक अब हवा, पानी, मिट्टी, पत्तियों और फलों के नमूनों की भी जांच करना चाहते हैं। अलग-अलग मौसमों और स्थानों पर अध्ययन से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि माइक्रोप्लास्टिक बंदरों तक सबसे ज्यादा कब और किस रास्ते से पहुंचता है। साथ ही बंदरों की सेहत, पोषण, प्रजनन और लंबे समय तक जीवित रहने की क्षमता पर इसके प्रभावों को भी समझना जरूरी होगा।
फिलहाल अध्ययन का सन्देश बेहद स्पष्ट है, प्लास्टिक अब सिर्फ समुद्र के किनारे, नदियों में या शहरों की सड़कों पर नहीं है। वह जंगल की उन ऊंची डालियों तक भी पहुंच चुका है, जहां संकटग्रस्त जीव अपना जीवन बिताते हैं।
जंगल की हरियाली के पीछे छिपा यह खतरा हमें याद दिलाता है कि प्रदूषण की कोई सीमा नहीं होती। इंसान का फेंका हुआ एक छोटा-सा प्लास्टिक का टुकड़ा हवा के साथ उड़कर उस दुनिया के उस कोने तक पहुंच सकता है, जिसे हम अब तक प्रदूषण से सुरक्षित समझते आए हैं।