नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का यह आदेश केवल नर्मदा में दूध बहाने के एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देशभर में धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की जरूरत का महत्वपूर्ण संदेश देता है।
सीहोर जिले में एक धार्मिक आयोजन के दौरान 11 हजार लीटर दूध और 210 साड़ियां नर्मदा में प्रवाहित किए जाने के बाद उठे विवाद पर वैज्ञानिक जांच में भले ही नदी की जल गुणवत्ता पर तत्काल प्रतिकूल असर के प्रमाण नहीं मिले, लेकिन विशेषज्ञों ने साफ किया कि दूध एक जैविक पदार्थ है और इसकी बड़ी मात्रा किसी भी जल स्रोत के लिए पर्यावरणीय दृष्टि से उचित नहीं है।
एनजीटी ने भी माना कि वर्तमान में दूध अर्पित करने पर रोक लगाने वाला कोई कानून नहीं है, लेकिन ऐसी प्रथाओं से बचना जरूरी है, खासकर उन नदियों, तालाबों और झीलों में जहां पानी का प्रवाह कम होता है।
अधिकरण ने मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और स्थानीय प्रशासन को बड़े धार्मिक आयोजनों पर निगरानी रखने, पूर्व अनुमति, निर्धारित घाटों के उपयोग और प्रभावी कचरा प्रबंधन जैसी व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। यह फैसला स्पष्ट करता है कि आस्था का सम्मान तभी सार्थक है, जब उसके साथ प्रकृति और नदियों की स्वच्छता का भी समान रूप से संरक्षण किया जाए।
धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर देते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कहा है कि बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान नर्मदा में बड़ी मात्रा में दूध नहीं बहाया जाना चाहिए।
17 जुलाई 2026 के अपने आदेश में एनजीटी ने मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) को निर्देश दिया कि वह स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर ऐसे आयोजनों पर कड़ी निगरानी रखे, ताकि नदी को अनावश्यक प्रदूषण से बचाया जा सके।
11 हजार लीटर दूध बहाने पर उठा विवाद
यह मामला मध्य प्रदेश के सीहोर जिले की नशरुल्लागंज तहसील स्थित सतदेव पंचायत में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम से जुड़ा है। आरोप है कि इस कार्यक्रम के समापन पर श्रद्धालुओं द्वारा 11,000 लीटर दूध नदी में विसर्जित कर दिया गया।
इसके साथ ही धारा में 210 साड़ियां के प्रवाहित किए जाने की बात भी सामने आई है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इतनी बड़ी मात्रा में दूध नदी में प्रवाहित करने से जल गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
बता दें कि इस मामले में 18 मई 2026 को एनजीटी ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और मध्य प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस जारी कर पूछा था कि क्या नदियों में दूध जैसी सामग्री प्रवाहित करने को लेकर कोई नियम या गाइडलाइंस हैं? और यदि नहीं हैं, तो क्या इसके लिए नए नियम बनाने की जरूरत है?
वैज्ञानिक जांच में क्या कुछ आया सामने?
इस कड़ी में मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की संयुक्त समिति ने 16 जुलाई 2026 को अपनी रिपोर्ट में बताया कि वैज्ञानिक जांच और विश्लेषण के आधार पर नर्मदा जैसी सतत रूप से बहने वाली नदी में इस घटना से जल गुणवत्ता पर प्रत्यक्ष प्रतिकूल प्रभाव के प्रमाण नहीं मिले। इसकी वजह नदी की तेज प्रवाह क्षमता, जल की अधिक मात्रा और प्राकृतिक रूप से स्वयं को शुद्ध करने की क्षमता बताई गई।
हालांकि, समिति ने स्पष्ट किया कि दूध एक जैविक पदार्थ है, जिसकी वजह से पानी में ऑक्सीजन की खपत बढ़ती है। ऐसे में इसे बड़ी मात्रा में किसी भी जल स्रोत में डालना पर्यावरण की दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तालाब, झील, जलाशय या कम प्रवाह वाले जल स्रोतों में ऐसी गतिविधियां कहीं अधिक नुकसान पहुंचा सकती हैं, क्योंकि वहां पानी के प्राकृतिक रूप से शुद्ध होने और पदार्थों के घुलने की क्षमता सीमित होती है।
धार्मिक आयोजनों के लिए नए नियमों की जरूरत
संयुक्त समिति ने नर्मदा की सुरक्षा के लिए कई अहम सिफारिशें भी की हैं। समिति ने कहा है कि नदी किनारे होने वाले सभी बड़े धार्मिक आयोजनों के लिए स्थानीय प्रशासन से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य किया जाए और ऐसे आयोजन केवल निर्धारित घाटों पर ही होने चाहिए।
इन घाटों पर फूल, नारियल, कपड़े और अन्य पूजा सामग्री को अलग-अलग एकत्र करने की उचित व्यवस्था पहले से उपलब्ध होनी चाहिए। इसके अलावा बड़े आयोजनों के दौरान आयोजकों को स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर ठोस कचरा प्रबंधन, स्वच्छता, भीड़ नियंत्रण और नदी संरक्षण के लिए अतिरिक्त इंतजाम सुनिश्चित करने होंगे, ताकि आस्था के साथ-साथ नर्मदा का पर्यावरण भी सुरक्षित रह सके।
आस्था के साथ-साथ पर्यावरण भी अहम
एनजीटी ने अपने आदेश में कहा कि फिलहाल ऐसा कोई कानून नहीं है जो धार्मिक अनुष्ठानों में दूध अर्पित करने पर रोक लगाता हो। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि नदियों में हजारों लीटर दूध बहाने जैसी प्रथाओं से बचना चाहिए, क्योंकि यदि पानी ठहरा हुआ हो या उसका प्रवाह कम हो, तो इससे जल के प्रदूषित होने का खतरा बढ़ सकता है।
अदालत ने कहा कि आस्था का सम्मान जरूरी है, लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि हमारी धार्मिक परंपराएं नदियों की स्वच्छता और पर्यावरण की कीमत पर न निभाई जाएं।