प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
प्रदूषण

जम्मू-कश्मीर: मानसबल झील में घुल रहा प्रदूषण का जहर, सरकारी जांच की विश्वसनीयता पर उठे सवाल

सीपीसीबी द्वारा लिए पानी के सभी सात नमूने क्लास-बी मानकों पर खरे नहीं मिले, जबकि 14 गांवों से झील में पहुंच रहे सीवेज की जांच अधूरी रहने और रिपोर्टों में विरोधाभास पर याचिकाकर्ता ने सवाल उठाए हैं।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • जम्मू-कश्मीर की खूबसूरत मानसबल झील पर प्रदूषण का खतरा गहराता जा रहा है। झील के किनारे बसे घरों से निकलने वाला गंदा पानी बिना साफ किए सीधे झील में छोड़ा जा रहा है, जबकि किनारों पर फेंका गया कचरा भी झील की सेहत बिगाड़ रहा है।

  • चिंता की बात यह है कि प्रदूषण की जांच करने वाले सरकारी बोर्डों की रिपोर्टों पर ही सवाल उठ गए हैं।

  • याचिकाकर्ता राजा मुजफ्फर भट ने 17 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में दाखिल जवाब में कहा कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और जम्मू-कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण समिति की रिपोर्ट झील में प्रदूषण की वास्तविक स्थिति नहीं बतातीं।

  • सीपीसीबी द्वारा लिए गए पानी के सभी सात नमूने खुले में स्नान के लिए निर्धारित क्लास-बी मानकों पर खरे नहीं उतरे। वहीं, दूसरे बोर्ड के चार निगरानी स्थलों पर कुल कोलीफॉर्म का स्तर 640 से 1,000 सीएफयू प्रति 100 मिलीलीटर दर्ज किया गया, जो निर्धारित 500 की सीमा से अधिक है।

  • याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि लार नहर के जरिए 14 गांवों से झील में पहुंच रहे सीवेज की पूरी जांच नहीं की गई। प्रदूषण के संभावित स्रोतों से नमूने लेने में भी कमियां रहीं और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई या पर्यावरणीय मुआवजे का स्पष्ट ब्योरा नहीं दिया गया।

  • ऐसे में सवाल है कि जब प्रदूषण के संकेत सामने हैं, तो झील को बचाने और जवाबदेही तय करने के लिए ठोस कदम कब उठाए जाएंगे?

जम्मू-कश्मीर की खूबसूरत मानसबल झील पर प्रदूषण का खतरा गहराता जा रहा है। कभी अपने निर्मल जल और प्राकृतिक सुंदरता के लिए पहचानी जाने वाली यह आर्द्रभूमि अब घरों से निकले गंदे पानी और कचरे के बोझ से जूझ रही है।

चिंता की बात यह भी है कि झील की सेहत का आकलन करने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और जम्मू-कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण समिति (जेएंडके पीसीसी) की ओर से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दाखिल रिपोर्टों पर ही सवाल उठ खड़े हुए हैं।

इस मामले में याचिकाकर्ता राजा मुजफ्फर भट ने 17 अक्टूबर 2026 को एनजीटी में दाखिल अपने जवाब में कहा है कि दोनों बोर्डों की रिपोर्ट मानसबल झील में प्रदूषण की वास्तविक स्थिति को सामने नहीं लातीं।

उनके मुताबिक, जांच में न तो झील में पहुंच रहे सीवेज के स्रोतों की पर्याप्त पड़ताल की गई और न ही प्रदूषण फैलाने वाले निकायों की जवाबदेही तय करने के लिए ठोस कार्रवाई का ब्योरा दिया गया है।

झील में सीधे पहुंच रहा घरों से निकला गंदा पानी

दोनों बोर्डों ने अपनी रिपोर्टों में स्वीकार किया है कि झील के किनारे बसे घरों से निकलने वाला बिना साफ किया गंदा पानी सीधे झील में छोड़ा जा रहा है। झील के तटों पर मिश्रित कचरा फेंके जाने की बात भी सामने आई है। सीपीसीबी के अनुसार, इस कचरे का कुछ हिस्सा पानी में भी डूबा हुआ है।

वहीं पानी की गुणवत्ता से जुड़े आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं। सीपीसीबी ने झील से लिए पानी के सभी सात नमूनों को खुले में स्नान के लिए निर्धारित 'क्लास-बी' मानकों के अनुरूप नहीं पाया।

वहीं, जेएंडके पीसीसी के चार निगरानी स्थलों में से दो पर जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) का स्तर निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरा।

गौरतलब है कि बीओडी पानी में मौजूद जैविक प्रदूषण और उसे विघटित करने के लिए सूक्ष्मजीवों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली ऑक्सीजन की मात्रा का संकेत देती है। इसका अधिक होना जलीय जीवन के लिए खतरे का संकेत माना जाता है।

14 गांवों के सीवेज की जांच अधूरी

याचिकाकर्ता ने सीपीसीबी की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें लार नहर के जरिए 14 गांवों के बिना साफ किए सीवेज के मानसबल झील में पहुंचने की भी पूरी जांच नहीं की गई। उनके मुताबिक, सीपीसीबी ने ठोस कचरे और घरेलू गंदे पानी का तो आकलन किया, लेकिन झील और लार नहर में सीवेज कहां से और कितना पहुंच रहा है, इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं दी।

रिपोर्ट में लार नहर और झील के आसपास की बस्तियों से आने वाले मल-मूत्रजनित प्रदूषण की पहचान के लिए सूक्ष्मजीव संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण भी नहीं किया गया। इससे यह पता लगाने में मुश्किल होती है कि पानी में मानव और पशुओं के मल से जुड़े हानिकारक सूक्ष्मजीव किस हद तक मौजूद हैं।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि घरेलू गंदे पानी के उपचार के लिए अब तक की गई कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है। इसके अलावा, 14 गांवों से निकलने वाले सीवेज के उपचार के लिए प्रस्तावित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की क्षमता का विवरण भी रिपोर्ट में नहीं है।

पानी के नमूनों पर भी उठे सवाल

जम्मू-कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण समिति की रिपोर्ट पर आपत्ति जताते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि पानी के नमूने लेने का तरीका झील में प्रदूषण की सही तस्वीर सामने लाने के लिए पर्याप्त नहीं था।

उनके मुताबिक, समिति ने मुख्य रूप से झील के खुले पानी से नमूने लिए, लेकिन कोंडाबल, चेसमा मानसबल, ग्रतबल और जरोकबल बाग में उन सतही नालों से नमूने नहीं लिए, जिन्हें समिति ने स्वयं गंदे पानी के निकास बिंदुओं के रूप में पहचाना था। लार नहर और झील को पानी देने वाले प्राकृतिक झरनों से भी नमूने नहीं लिए गए।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि खुले पानी में गंदे पानी के मिलने से प्रदूषकों की मात्रा कम हो सकती है। इसलिए केवल वहां से नमूने लेने पर यह पता नहीं चलता कि नालों से झील में प्रवेश करने वाले प्रदूषण का वास्तविक भार कितना है। प्रदूषण के स्रोतों पर जांच किए बिना झील की सेहत का सही आकलन करना मुश्किल है।

रिपोर्ट के निष्कर्षों में विरोधाभास का आरोप

याचिकाकर्ता ने जेएंडके पीसीसी की रिपोर्ट के निष्कर्षों में भी विरोधाभास की ओर इशारा किया है। रिपोर्ट में एक ओर स्वीकार किया गया है कि बिना उपचार के घरेलू सीवेज खुले नालों के जरिए सीधे झील में पहुंच रहा है, ठोस कचरे के प्रबंधन की स्थिति बेहद असंतोषजनक है और झील पारिस्थितिक दबाव का सामना कर रही है।

दूसरी ओर, रिपोर्ट में सूक्ष्मजीव संबंधी मानकों के आधार पर झील के पानी को मानकों के अनुरूप बताया गया है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, यह निष्कर्ष केवल फीकल कोलीफॉर्म के आंकड़ों पर आधारित है, जबकि टोटल कोलीफॉर्म के आंकड़ों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। रिपोर्ट में चारों निगरानी स्थलों पर टोटल कोलीफॉर्म का स्तर 640 से 1,000 सीएफयू प्रति 100 मिलीलीटर दर्ज किया गया, जो क्लास-बी के 500 सीएफयू प्रति 100 मिलीलीटर के निर्धारित मानक से अधिक है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि रिपोर्ट में इस अंतर की स्पष्ट व्याख्या नहीं की गई। ऐसे में पानी की गुणवत्ता को लेकर निकाला गया निष्कर्ष सवालों के घेरे में है।

प्रदूषण मिला, लेकिन जिम्मेदारी तय करने का ब्योरा नहीं

याचिकाकर्ता ने एक और अहम कमी की ओर ध्यान दिलाया है। दोनों बोर्डों ने झील के किनारों पर ठोस कचरा फेंके जाने और बिना साफ किए घरेलू गंदा पानी छोड़े जाने की बात स्वीकार की है, लेकिन उनकी रिपोर्टों में जिम्मेदार प्राधिकरणों से पर्यावरणीय मुआवजा वसूलने या इस दिशा में की गई कार्रवाई का आकलन नहीं मिलता।

यह समझना होगा कि मानसबल झील केवल पानी का एक स्रोत नहीं, बल्कि क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत और जलीय पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें लगातार गंदा पानी और कचरा पहुंचने से जल की गुणवत्ता, जलीय जीवों और आसपास के पर्यावरण पर असर पड़ सकता है।

ऐसे में चुनौती सिर्फ प्रदूषण दर्ज करने की नहीं, बल्कि उसके स्रोतों की पहचान करने, सीवेज के उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित करने और जिम्मेदार संस्थाओं की जवाबदेही तय करने की भी है।

याचिकाकर्ता की आपत्तियां इसी सवाल को सामने लाती हैं कि जब सरकारी रिपोर्टें खुद झील में प्रदूषण की पुष्टि कर रही हैं, तो उसे रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाई का स्पष्ट ब्योरा कहां है?