प्रदूषण

मेरठ में बिना अनुमति के चल रही लेदर फैक्ट्री, संयुक्त समिति ने रिपोर्ट में किए गंभीर खुलासे

बिना अनुमति के चल रही इस लेदर यूनिट से जुड़े मामले में पर्यावरण संरक्षण के साथ करीब 150 आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की आजीविका का सवाल भी सामने आया है।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • मेरठ के डूंगर गांव में बिना जरूरी अनुमति के चल रही ‘हापुड़िया लेदर सोसायटी’ की लेदर प्रोसेसिंग यूनिट को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में पेश संयुक्त समिति की रिपोर्ट ने कई गंभीर पर्यावरणीय खामियां सामने रखी हैं।

  • ‘रेड’ श्रेणी में आने वाली इस इकाई ने संचालन की अनिवार्य सहमति यानी सीटीओ के लिए आवेदन तक नहीं किया था। निरीक्षण के दौरान पर्याप्त जल निकासी और पर्यावरणीय बुनियादी ढांचे का अभाव मिला।

  • समिति के मुताबिक इकाई के संचालन के दौरान बिना उपचार किया गया अपशिष्ट करीब 2.5 किलोमीटर लंबी नालियों से होकर अजीमपुर गांव के तालाब में पहुंचता था। हालांकि, उपलब्ध सरकारी रिपोर्टों में अब तक इस अपशिष्ट से फसलों, मिट्टी, इंसानों या पशुओं को नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है।

  • मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू करीब 150 आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की आजीविका है, जो पारंपरिक तरीके से खाल प्रोसेसिंग के काम से जुड़े हैं।

  • समिति ने इकाई को दोबारा शुरू करने से पहले सभी जरूरी मंजूरियां लेने और अजीमपुर तालाब के पुनर्जीवन की सिफारिश की है। इसमें तालाब की सफाई, गाद निकालने और अपशिष्ट के सीधे प्रवाह को रोकने के लिए बाईपास नाला बनाने का सुझाव शामिल है।

  • मामला पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका के बीच संतुलन की चुनौती को रेखांकित करता है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष पेश की गई एक संयुक्त समिति की रिपोर्ट ने मेरठ में चल रही एक लेदर फैक्ट्री को लेकर गंभीर खुलासे किए हैं।

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के डूंगर गांव में चल रही यह फैक्ट्री, ‘हापुड़िया लेदर सोसायटी’ की एक लेदर प्रोसेसिंग यूनिट है। रिपोर्ट के मुताबिक चमड़ा प्रोसेस करने वाली यह यूनिट ‘रेड’ केटेगरी में आती है, लेकिन इसके पास उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) की ओर से संचालन की सहमति यानी कंसेंट टू ऑपरेट (सीटीओ) नहीं थी।

यह रिपोर्ट 5 सितंबर 2026 को एनजीटी में पेश की गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक संयुक्त समिति ने 9 जुलाई 2026 को इस यूनिट और उसके आसपास के क्षेत्र का निरीक्षण किया था। उस समय इकाई बंद मिली और वहां चमड़ा की प्रोसेसिंग का काम नहीं हो रहा था। हालांकि, इस निरीक्षण में कई पर्यावरणीय खामियां सामने आईं।

समिति के मुताबिक इकाई इस फैक्ट्री में न तो उचित सीमेंटेड या ब्लैक-टॉप सड़क थी और न ही पर्याप्त मात्रा में पौधे रोपे गए थे। निरीक्षण के दौरान भारी बारिश हो रही थी। परिसर से बड़ी मात्रा में बारिश का पानी बहकर मुख्य सड़क पर पहुंच रहा था और वहां से आगे खेतों में जा रहा था। समिति ने पाया कि परिसर में बारिश के पानी की निकासी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मेरठ क्षेत्रीय कार्यालय के रिकॉर्ड के अनुसार, इस इकाई ने कभी भी अनुमति (सीटीओ) के लिए आवेदन नहीं किया था। जबकि जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 की धारा 25 के तहत ‘रेड’ केटेगरी की ऐसी फैक्ट्री को चलाने के लिए सीटीओ अनिवार्य है।

बिना उपचार के तालाब तक पहुंच रहा अपशिष्ट

समिति ने पाया कि फैक्ट्री में निकलने वाले अपशिष्ट जल के उपचार के लिए पर्याप्त एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) नहीं था। रिपोर्ट के मुताबिक, फैक्ट्री चलने के दौरान बिना उपचार किया गया गंदा पानी करीब एक किलोमीटर लंबी बंद और डेढ़ किलोमीटर लंबी खुली नाली से होकर बहता था।

यह पानी आखिरकार पास के अजीमपुर गांव के तालाब में पहुंच जाता था। यानी चमड़े की प्रोसेसिंग से निकलने वाला अपशिष्ट सीधे उस जलस्रोत तक पहुंच रहा था, जिस पर आसपास के ग्रामीण निर्भर हैं।

करीब 150 परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी

निरीक्षण के दौरान समिति को बताया गया कि हापुड़िया लेदर सोसायटी के करीब 150 सदस्य परिसर में खाल को प्रोसेस करने का काम करते हैं। यह काम पारंपरिक तौर पर हाथ से किया जाता है। इसमें कच्ची खाल के साथ चूना, बबूल की छाल और लकड़ी का बुरादा इस्तेमाल किया जाता है।

समिति के मुताबिक यह गतिविधि छोटे स्तर की, व्यक्तिगत और कुटीर प्रकृति की है। इससे जुड़े करीब 150 परिवार आर्थिक रूप से कमजोर तबके से हैं और उनकी आजीविका इस काम पर निर्भर है।

यही वजह है कि मामले में पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के साथ-साथ आजीविका का सवाल भी जुड़ गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस गतिविधि से जुड़े लोगों ने अपनी आजीविका बचाने के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष भी मामले उठाए हैं।

फसलों, मिट्टी और स्वास्थ्य पर नुकसान की पुष्टि नहीं

हालांकि, संयुक्त समिति को उपलब्ध सरकारी रिपोर्टों में अब तक यूनिट के कारण फसलों, मिट्टी, इंसानों या पशुओं को नुकसान होने की पुष्टि नहीं हुई है।

मेरठ के उप कृषि निदेशक के कार्यालय के अनुसार, पिछले दस वर्षों में पूठखास और अजीमपुर गांवों में इस इकाई के अपशिष्ट के कारण फसलों को नुकसान पहुंचने की कोई घटना दर्ज नहीं हुई है।

कृषि विभाग की रिपोर्ट में संबंधित खेतों की मिट्टी की जांच में भी ऐसा प्रदूषण नहीं मिला, जिससे फसलों को नुकसान होने की बात सामने आए।

मेरठ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी और मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी की रिपोर्ट में भी चमड़ा प्रसंस्करण गतिविधि या अपशिष्ट के कारण इंसानों अथवा पशुओं को किसी तरह के नुकसान की सूचना नहीं मिली है। निरीक्षण के समय आसपास के खेतों में गन्ना, धान और ज्वार की फसलें खड़ी थीं।

अजीमपुर तालाब पर मंडरा रहा है दबाव

इसके बावजूद अजीमपुर का तालाब इस पूरे मामले का अहम हिस्सा है। रिपोर्ट के मुताबिक तालाब उथला है और उसकी लगभग पूरी सतह पर घनी जलीय वनस्पति फैली हुई है। यहां पहले जलीय जीवों को नुकसान पहुंचने की घटनाओं की सूचना भी दी गई थी।

चमड़ा प्रोसेसिंग इकाई से निकलने वाला बिना उपचार किया अपशिष्ट जिस नाले से होकर आता था, वह सीधे इसी तालाब में मिलता था।

इसलिए समिति ने तालाब की बहाली और अपशिष्ट के सीधे गिरने को रोकने के लिए सुधारात्मक कदम उठाने की सिफारिश की है।

दोबारा संचालन से पहले कई मंजूरियां जरूरी

संयुक्त समिति ने स्पष्ट किया है कि ‘रेड’ श्रेणी की इस इकाई को दोबारा शुरू करने से पहले व्यापक जांच और जरूरी कानूनी मंजूरियां हासिल करनी होंगी।

इसके लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को जल अधिनियम, 1974 के तहत सीटीओ देने से पहले पूरी जांच करनी होगी। इसके अलावा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से पर्यावरणीय मंजूरी और उत्तर प्रदेश राज्य भूजल प्रबंधन एवं विनियमन प्राधिकरण से भूजल दोहन की अनिवार्य अनुमति भी लेनी होगी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी तक पर्यावरण को हुए नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई जा सकती है, लेकिन इस गतिविधि से जुड़े परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं। ऐसे में क्षतिपूर्ति की राशि तय करना व्यावहारिक रूप से मुश्किल होगा।

तालाब के पुनर्जीवन की सिफारिश

संयुक्त समिति ने अपनी रिपोर्ट में अजीमपुर तालाब के पुनर्जीवन का काम कराने की भी सिफारिश की है। इसमें तालाब की सफाई, गाद निकालना और एक बाईपास नाले का निर्माण शामिल है, ताकि भविष्य में अपशिष्ट तालाब के पानी में सीधे न मिल सके।

समिति ने सुझाव दिया है कि प्रशासनिक निर्णय के आधार पर इस काम का खर्च परियोजना संचालक या जिम्मेदार परिवारों से लिया जा सकता है और अंतिम राशि को पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति के रूप में माना जा सकता है।

मेरठ की यह तस्वीर पर्यावरणीय नियमों और ग्रामीण आजीविका के बीच मौजूद उस कठिन संतुलन को सामने लाती है, जहां एक ओर प्रदूषण रोकने के लिए नियमों का पालन जरूरी है, तो दूसरी ओर उसी गतिविधि से जुड़े कमजोर परिवारों की रोजी-रोटी का सवाल भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।