पर्यावरण संरक्षण से जुड़े दो अहम मामलों में न्यायपालिका और नियामक संस्थाओं ने साफ संकेत दिया है कि अब प्राकृतिक धरोहरों और जलस्रोतों के साथ लापरवाही या अतिक्रमण को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
आगरा के संवेदनशील ताज ट्रेपेजियम जोन (टीटीजेड) में अवैध रूप से चल रहे दो हॉट मिक्स प्लांटों पर उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 12.18 लाख रुपए की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाने की सिफारिश की है।
यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया फैसले के बाद हुई है, जिसने प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वालों से सीधे हर्जाना वसूलने का अधिकार और मजबूती दी है।
वहीं, गौतमबुद्ध नगर में तालाबों और अन्य जलाशयों पर बढ़ते अतिक्रमण को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने जिला प्रशासन से विस्तृत और तथ्यपूर्ण रिपोर्ट मांगी है।
अदालत ने सभी जलाशयों का क्षेत्रफल, उन पर हुए अतिक्रमण, जिम्मेदार भू-माफियाओं और संबंधित विकास प्राधिकरणों की जवाबदेही स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं।
दोनों मामले इस बात को रेखांकित करते हैं कि पर्यावरणीय कानून अब केवल कागजों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रदूषण फैलाने वालों और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने वालों के खिलाफ जवाबदेही तय करने की दिशा में सख्ती लगातार बढ़ रही है।
ताजमहल और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की दिशा में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने एक बड़ी कार्रवाई की है। आगरा की खेरागढ़ तहसील के वीरई गांव में, जो संवेदनशील ताज ट्रेपेजियम जोन (टीटीजेड) के दायरे में आता है, नियमों की धज्जियां उड़ाकर चलाए जा रहे दो अवैध हॉट मिक्स प्लांटों पर प्रशासन का कड़ा डंडा चला है।
यह मामला खुशी इन्फोटेक और जी जी इन्फ्राटेक के दो हॉट मिक्स प्लांटों से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, ये प्लांट ताज ट्रेपेजियम जोन के भीतर पर्यावरण कानूनों, निर्धारित मानकों और नियमों का ताक पर रख चलाए जा रहे थे।
उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने 10 जुलाई 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दाखिल अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी।
क्या है पूरा मामला
रिपोर्ट में सामने आया है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 4 जून 2026 को वीरई गांव में निरीक्षण किया। यह जांच जी जी इन्फ्राटेक के मालिक की मौजूदगी में की गई। जांच के बाद बोर्ड ने कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। इस बड़ी कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले से ताकत मिली है।
21 मई 2026 को देश की शीर्ष अदालत ने एक ऐतिहासिक आदेश में स्पष्ट कर दिया था कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वालों से हर्जाना वसूलने के लिए प्रदूषण बोर्ड को किसी नए या विशेष कानून के इन्तजार की जरूरत नहीं है। वे इसके बिना भी पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगा और वसूल कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इसी आदेश के आधार पर यूपीपीसीबी के आगरा स्थित क्षेत्रीय कार्यालय ने 20 जून 2026 को लखनऊ मुख्यालय को पत्र भेजकर इन प्लांट्स पर 12,18,750 रुपए की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाने की सिफारिश की। यह राशि 14 अगस्त 2025 (पहले निरीक्षण की तारीख) से 24 फरवरी 2026 (बंद करने के आदेश के तहत प्लांट सील किए जाने की तारीख) तक कुल 195 दिनों की अवधि के लिए प्रस्तावित की गई है।
यह कार्रवाई इस बात का संकेत है कि ताजमहल जैसे विश्व धरोहर और उसके आसपास के क्षेत्र को प्रदूषण की भट्टी में झोंकने की इजाजत किसी को नहीं दी जाएगी।
गौतमबुद्ध नगर के जलाशयों का होगा पूरा हिसाब, एनजीटी ने जिला मजिस्ट्रेट से मांगा अतिक्रमण का रिकॉर्ड
गौतमबुद्ध नगर में दम तोड़ते और भू-माफियाओं के चंगुल में फंसे तालाबों और अन्य जलस्रोतों को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है। 14 जुलाई 2026 को हुई सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने गौतमबुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) को आठ सप्ताह के भीतर नई विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
एनजीटी ने कहा कि पिछली रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण जानकारियां नहीं थीं। इसलिए अब ऐसी रिपोर्ट पेश की जाए जिसमें जिले के सभी तालाबों और जलाशयों का पूरा ब्यौरा तालिका के रूप में दिया जाए।
दरअसल, गौतमबुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट ने 10 जुलाई 2026 को कोर्ट में एक रिपोर्ट सौंपी थी। लेकिन जब एनजीटी ने इसे खंगाला, तो इसमें कई अहम जानकारियां गायब थीं। रिपोर्ट के साथ जो सूची लगाई गई थी, उसमें यह तक साफ नहीं था कि कौन सा गांव किस अथॉरिटी के दायरे में आता है। ऐसे में अदालत ने नई रिपोर्ट तलब की है।
रिपोर्ट में क्या कुछ मांगी गई है जानकारी
इस रिपोर्ट में साफ तौर पर बताना होगा कि जिले में कितने तालाब और जलाशय हैं, साथ ही उनका पूरा विवरण भी साझा करना होगा। यह भी बताना होगा कि हर तालाब और जलस्रोत का कुल क्षेत्रफल कितना है। उन पर कितना अतिक्रमण हुआ है और साथ ही इन जीवनदायिनी जमीनों पर कब्जा करने वाले वो रसूखदार 'भू-माफिया' कौन हैं, यह भी जानकारी मांगी गई है।
साथ ही यह भी पूछा गया है कि जिला प्रशासन के तहत आने वाले तीनों प्राधिकरणों, नोएडा डेवलपमेंट अथॉरिटी, ग्रेटर नोएडा डेवलपमेंट अथॉरिटी और यमुना एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी के अधिकार क्षेत्र में कौन-कौन से तालाब आते हैं।
गौरतलब है कि ये तीनो प्राधिकरण अपने-अपने क्षेत्रों का प्रशासन संभालते हैं। ऐसे में जलाशयों की जिम्मेदारी और अतिक्रमण की जवाबदेही तय करने के लिए यह जानकारी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
समझना होगा कि जलाशय केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि भूजल, जैव विविधता और बाढ़ नियंत्रण की प्राकृतिक ढाल हैं। ऐसे में उन पर हुए अतिक्रमण का स्पष्ट रिकॉर्ड तैयार होना न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जल अधिकारों की सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।