नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के हालिया दो आदेशों ने थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली फ्लाई ऐश और प्रदूषित पानी के प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
7 अगस्त 2026 को एनजीटी ने झारखंड के चतरा जिले में एनटीपीसी के टंडवा प्लांट से गढ़ी और दामोदर नदियों में प्रदूषण के आरोपों की जांच के लिए संयुक्त समिति गठित करने का निर्देश दिया।
समिति मौके की स्थिति की जांच कर यह पता लगाएगी कि बिना ट्रीट किया पानी और फ्लाई ऐश नदी में छोड़े जाने से कितना प्रदूषण हुआ और उसे रोकने के लिए क्या कदम जरूरी हैं।
आरोप है कि गढ़ी नदी का पानी ग्रामीणों और पशुओं के लिए उपयोगी नहीं रह गया है और नदी के दामोदर में मिलने से प्रदूषण का दायरा बढ़ सकता है।
वहीं, 5 अगस्त को एनजीटी ने 31 दिसंबर 2021 की ऐश उपयोग अधिसूचना की भी समीक्षा के निर्देश दिए। ट्रिब्यूनल ने मंत्रालय और फ्लाई ऐश उत्पाद निर्माताओं के संगठन से पूछा कि अधिसूचना में बाद में कोई संशोधन हुआ है या नहीं।
मामले में फ्लाई ऐश से ईंट, ब्लॉक और टाइल जैसे उत्पाद बनाने को प्राथमिकता देने तथा निर्माण कार्यों में इनके अनिवार्य इस्तेमाल की मांग भी उठी है।
झारखंड के चतरा जिले में नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन (एनटीपीसी) के थर्मल पावर प्लांट से नदियों में प्रदूषण के मामले को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने गंभीरता से लिया है।
7 अगस्त 2026 को ट्रिब्यूनल ने इस मामले की जांच के लिए एक संयुक्त समिति गठित करने का निर्देश दिया। समिति यह पता लगाएगी कि टंडवा और आसपास के क्षेत्र में बिना ट्रीट किया गंदा पानी छोड़े जाने की वजह से गढ़ी और दामोदर नदियों में कितना प्रदूषण हुआ है।
एनजीटी ने समिति को मौके पर वास्तविक स्थिति की जांच करने और प्रदूषण रोकने के लिए जरूरी सुधारात्मक उपाय सुझाने को कहा है।
कोर्ट के निर्देशानुसार जांच रिपोर्ट संबंधित अधिकारियों को भी भेजी जाएगी, ताकि आगे आवश्यक कार्रवाई की जा सके। ट्रिब्यूनल ने झारखंड के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव, झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, चतरा के जिलाधिकारी और एनटीपीसी को मामले में अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
गढ़ी नदी में फ्लाई ऐश बहाने का आरोप
आवेदक का आरोप है कि एनटीपीसी मैनेजमेंट कोयला जलने के बाद पैदा हुई राख (फ्लाई ऐश) को गढ़ी नदी में बहा रहा है। इससे नदी बुरी तरह प्रदूषित हो गई है और उसका पानी इस्तेमाल के लायक नहीं रह गया है।
आवेदन में कहा गया है कि हजारों ग्रामीण और पशु गढ़ी नदी के पानी पर निर्भर हैं। यह नदी आगे बहते हुए दामोदर नदी में मिल जाती है, जिससे प्रदूषण के और बड़े क्षेत्र में फैलने की आशंका है।
आवेदक ने अपने दावों के समर्थन में गढ़ी नदी में फ्लाई ऐश के बहने की तस्वीरें और इस मामले में प्रकाशित समाचार रिपोर्टों की प्रतियां भी एनजीटी के समक्ष पेश की हैं।
देखा जाए तो गढ़ी नदी में फ्लाई ऐश और प्रदूषित पानी छोड़े जाने के आरोप सिर्फ एक नदी की सेहत का सवाल नहीं हैं, बल्कि उन हजारों ग्रामीणों और पशुओं के जीवन से जुड़े हैं जो इसके पानी पर निर्भर हैं।
अब एनजीटी की निगरानी में होने वाली जांच से यह तय होगा कि प्रदूषण की असली वजह क्या है और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी है।
फ्लाई ऐश के उपयोग पर एनजीटी की नजर, 2021 की अधिसूचना में बदलाव की होगी जांच
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 5 अगस्त 2026 को फ्लाई ऐश उत्पाद निर्माताओं के संगठन (एएफएपीएम) और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को निर्देश दिया कि वे 31 दिसंबर 2021 की ऐश (राख) के उपयोग से जुड़ी अधिसूचना की जांच करें।
ट्रिब्यूनल ने पूछा है कि क्या इस अधिसूचना में बाद में कोई संशोधन या बदलाव किया गया है। यदि संशोधन हुआ है तो ऐसे किसी भी नोटिफिकेशन को रिकॉर्ड में रखा जाए।
गौरतलब है कि एएफएपीएम ने 2021 के ऐश यूटिलाइजेशन नोटिफिकेशन के कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए एनजीटी में एक आवेदन दाखिल किया था। संगठन का कहना है कि अधिसूचना में शब्दावली को स्पष्ट किया जाना चाहिए। इसमें “फ्लाई ऐश, बॉटम ऐश और पॉन्ड ऐश” का उल्लेख होना चाहिए, जैसा कि 14 सितंबर 1999 की मूल अधिसूचना में किया गया था।
फ्लाई ऐश से ईंट-टाइल तक: इस्तेमाल की प्राथमिकता तय करने की मांग
आवेदन में यह भी कहा गया कि कोयला या लिग्नाइट-बेस्ड थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली राख का इस्तेमाल मुख रूप से फ्लाई ऐश आधारित ईंट, ब्लॉक और टाइल जैसे उत्पाद बनाने में होना चाहिए। उसके बाद ही दूसरे इस्तेमाल पर विचार किया जाना चाहिए।
एएफएपीएम ने 1999 की अधिसूचना के अनुरूप यह भी स्पष्ट करने की मांग की कि फ्लाई ऐश निर्माण इकाइयों को मुफ्त या रियायती दर पर ऐश उपलब्ध कराई जाए। संगठन के मुताबिक, थर्मल पावर प्लांट से 300 किलोमीटर के दायरे में होने वाले निर्माण कार्यों में केवल बीआईएस मानकों के अनुरूप फ्लाई ऐश उत्पादों का इस्तेमाल अनिवार्य होना चाहिए।
यह भी मांग की गई है कि ये नियम निजी, सार्वजनिक और सरकारी सभी निर्माण एजेंसियों पर लागू किया जाए और इसकी अनिवार्यता को टेंडर दस्तावेजों और निर्माण संबंधी तकनीकी स्पेसिफिकेशन्स में स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए, ताकि फ्लाई ऐश के उपयोग को प्रभावी ढंग से सुनिश्चित किया जा सके।