नेपाल की बुधी गंडकी नदी में अचानक आई बाढ़ से भारी तबाही, कई लोग लापता और मकानों-पुलों को नुकसान पहुंचा।
भूस्खलन से नदी का रास्ता रुकने और अस्थायी बांध टूटने से अचानक बाढ़ आने की आशंका, जांच जारी है।
ग्लेशियरों के पिघलने, पर्माफ्रॉस्ट के कमजोर होने और बढ़ते तापमान से हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ा।
बाढ़ की चेतावनी के बावजूद कई लोग खतरे को नहीं समझ पाए, दूरदराज के इलाकों में निगरानी व्यवस्था कमजोर बनी हुई है।
डब्ल्यूएमओ ने बेहतर पूर्वानुमान, समय पर चेतावनी, सुरक्षित आश्रय और हिमालयी देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया।
नेपाल में लगातार आ रही आपदाओं के बाद विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों के लिए एक सलाह जारी की है।
डब्ल्यूएमओ का कहना है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में निगरानी व्यवस्था मजबूत करनी होगी। नदियों के जलस्तर पर नजर रखने, बेहतर पूर्वानुमान तैयार करने, सुरक्षित आश्रय स्थल बनाने और लोगों को समय रहते निकालने की योजनाओं पर निवेश बढ़ाना होगा।
गौरतलब है कि नेपाल के पहाड़ी इलाकों में एक बार फिर प्रकृति ने अपना रौद्र रूप दिखाया है। 11 अक्टूबर को मध्य नेपाल की बुधी गंडकी नदी प्रणाली में आई अचानक बाढ़ ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। शुरुआती जानकारी के अनुसार, भूस्खलन के कारण नदी का रास्ता अस्थायी रूप से रुक गया था। आशंका है कि इस अस्थायी बांध के टूटने से अचानक तेज बाढ़ आई और नदी के किनारे बसे इलाकों में तबाही मच गई। हालांकि बाढ़ के वास्तविक कारणों की जांच अभी जारी है।
नेपाल के अधिकारियों की शुरुआती रिपोर्टों की समीक्षा करने वाली इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) के मुताबिक, इस घटना में कई लोग लापता बताए जा रहे हैं। मकानों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को भी भारी नुकसान पहुंचने की खबर है। प्रशासन ने नदी के आसपास रहने वाले लोगों को सतर्क रहने की चेतावनी दी है।
एक के बाद एक आपदाओं से सहमे पहाड़ी लोग
नेपाल अभी 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के जख्मों से उबर भी नहीं पाया था कि एक और हादसे ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दीं। अगस्त में करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर पहाड़ से चट्टानों और ग्लेशियर की बर्फ का विशाल हिस्सा टूटकर नीचे गिरा था। इसके बाद ल्हेंदे नदी और भोटे कोशी नदी प्रणाली में पानी और मलबे का तेज बहाव आया।
इस आपदा ने पहाड़ी बस्तियों को भारी नुकसान पहुंचाया और बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई। संकरी घाटियों में रहने वाले लोगों के लिए ऐसी घटनाएं बेहद खतरनाक साबित होती हैं, क्योंकि पानी और मलबे को गांवों तक पहुंचने में बहुत कम समय लगता है।
पिघलते ग्लेशियर और कमजोर होते पहाड़
विशेषज्ञों के मुताबिक, हिमालय के ऊंचे इलाकों में तेजी से हो रहे बदलाव पहाड़ों की स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं। ग्लेशियरों का पीछे हटना, जमीन के भीतर जमी बर्फ यानी पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना और चट्टानों का कमजोर होना खतरे को बढ़ा सकता है।
दस साल से भी पहले आए शक्तिशाली भूकंप का असर भी पहाड़ों की संरचना पर पड़ा हो सकता है। इसके अलावा, हादसे से पहले असामान्य रूप से अधिक तापमान और बर्फ की जगह बारिश होने की बढ़ती संभावना ने भी जोखिम बढ़ाने में भूमिका निभाई हो सकती है।
डब्ल्यूएमओ के हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग और फोरकास्टिंग सेक्शन के प्रमुख ह्विरिन किम ने पहाड़ी इलाकों में बाढ़ के बढ़ते खतरों को लेकर चिंता जाहिर की, साथ ही उन्होंने इन्हें कम करने के लिए कई अहम सुझाव भी दिए।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की 2025 की वैश्विक जल संसाधन रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के सभी ग्लेशियर वाले क्षेत्रों में लगातार चौथे वर्ष बर्फ का कुल नुकसान दर्ज किया गया। यह संकेत है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में पहाड़ी क्षेत्रों की चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं।
चेतावनी मिली, लेकिन हर कोई नहीं समझ पाया खतरा
नेपाल के जल विज्ञान एवं मौसम विज्ञान विभाग ने अगस्त में भोटे कोशी क्षेत्र की बाढ़ के दौरान मोबाइल संदेशों के जरिए लोगों को चेतावनी दी थी। लेकिन कई लोगों ने खतरे की गंभीरता को नहीं समझा। कुछ लोग तो बाढ़ की तस्वीरें और वीडियो बनाने के लिए जोखिम वाले इलाकों में भी पहुंच गए।
रिपोर्ट में कहा गया है कि दूरदराज के पहाड़ी इलाकों में निगरानी केंद्रों और उपकरणों की कमी के कारण अचानक आने वाली बाढ़ का समय रहते पता लगाना मुश्किल हो जाता है। कई बार आपदा इतनी तेजी से आती है कि लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचने का मौका तक नहीं मिलता।
उन्होंने साफ कहा कि केवल चेतावनी जारी कर देना काफी नहीं है। इसके लिए सरकारी विभागों, स्थानीय प्रशासन, मौसम वैज्ञानिकों और आम लोगों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। लोगों तक सही जानकारी पहुंचे और वे उस पर भरोसा करके तुरंत कदम उठाएं, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
दुनिया के पहाड़ी देशों के लिए सबक
नेपाल की घटनाओं ने किर्गिस्तान और स्विट्जरलैंड जैसे पहाड़ी देशों को भी सतर्क किया है। किर्गिस्तान में ग्लेशियर, ऊंची झीलें और पर्माफ्रॉस्ट वाले क्षेत्र मौजूद हैं, जहां इसी तरह के खतरे पैदा हो सकते हैं। वहीं, स्विट्जरलैंड के ब्लाटन गांव में 2025 में हुई बर्फ और चट्टानों के खिसकने की घटना ने समय पर चेतावनी और बेहतर आपदा प्रबंधन की अहमियत बताई।
डब्ल्यूएमओ का कहना है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में निगरानी व्यवस्था मजबूत करनी होगी। नदियों के जलस्तर पर नजर रखने, बेहतर पूर्वानुमान तैयार करने, सुरक्षित आश्रय स्थल बनाने और लोगों को समय रहते निकालने की योजनाओं पर निवेश बढ़ाना होगा।
अब तैयारी ही बचाव का सबसे बड़ा रास्ता: डब्ल्यूएमओ
नदियां और बाढ़ किसी देश की सीमा देखकर नहीं बहतीं। इसलिए नेपाल समेत हिमालयी देशों के बीच मौसम संबंधी आंकड़ों, चेतावनियों और आपदा की जानकारी का समय पर आदान-प्रदान जरूरी है।
डब्ल्यूएमओ का संदेश साफ है - सिर्फ चेतावनी से नहीं, समय पर कार्रवाई से बचेंगी जानें। बदलते मौसम और कमजोर होते पहाड़ों के बीच निगरानी, जन-जागरूकता, मजबूत बुनियादी ढांचे और आपसी सहयोग को प्राथमिकता देना अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।