सोमवार 6 जुलाई 2026 की सुबह हुई भारी बारिश के कारण चिनाब घाटी के कई हिस्सों में अचानक आई बाढ़ (फ्लैश फ्लड) ने व्यापक तबाही मचाई। इससे जम्मू कश्मीर के किश्तवाड़ जिले की 540 मेगावाट क्वार जलविद्युत परियोजना का काम गंभीर रूप से प्रभावित हुआ, जबकि डोडा जिले के प्रेम नगर के पास डोडा-किश्तवाड़ राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-244) भी बंद हो गया।
540 मेगावाट क्वार जलविद्युत परियोजना के टेल रेस टनल (टीआरटी) क्षेत्र में तेज बहाव के साथ आए पानी ने मिट्टी, बड़े पत्थरों और मलबे को परियोजना परिसर में ला पटका, जिससे वहां खड़े कई वाहन मलबे में दब गए। अधिकारियों के अनुसार, इस घटना में किसी भी प्रकार की जनहानि या घायल होने की सूचना नहीं है।
परियोजना प्रबंधन ने तुरंत भारी अर्थ-मूविंग मशीनों को मौके पर लगाया ताकि मलबा हटाकर उसमें फंसे वाहनों को निकाला जा सके। पूरे दिन बहाली का कार्य जारी रहा।
उधर, डोडा के प्रेम नगर के पास फ्लैश फ्लड के कारण भारी मात्रा में मलबा राष्ट्रीय राजमार्ग-244 पर जमा हो गया, जिससे डोडा-किश्तवाड़ मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध हो गया। कई वाहन रास्ते में फंस गए और दोनों जिलों के बीच आवाजाही बाधित हो गई। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और जिला प्रशासन ने सड़क को जल्द से जल्द चालू करने के लिए मशीनरी और कर्मचारियों को राहत कार्य में लगाया।
सोमवार की इन घटनाओं ने चिनाब घाटी में पिछले कुछ वर्षों से चल रही उस बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है कि क्या पर्यावरणीय क्षरण, अव्यवस्थित बुनियादी ढांचा विकास और बड़े पैमाने पर हो रही निर्माण गतिविधियां हिमालय जैसे पारिस्थितिक रूप से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को और गंभीर बना रही हैं।
जम्मू-कश्मीर का "पावर हाउस" कहे जाने वाले किश्तवाड़ जिले में इस समय कई बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इनमें क्वार, पाकल दुल, किरू और रतले परियोजनाएं प्रमुख हैं। इनके साथ-साथ राष्ट्रीय राजमार्ग-244 के चौड़ीकरण और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के तहत पर्वतीय क्षेत्रों में अनेक सड़कों के निर्माण और विस्तार का कार्य भी बड़े पैमाने पर जारी है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि खुदाई से निकला मलबा पर्यावरणीय दिशानिर्देशों की अनदेखी करते हुए अक्सर प्राकृतिक जल निकासी मार्गों और नदी किनारों के पास डाल दिया जाता है, जबकि नियमों के अनुसार इसे सुरक्षित और निर्धारित डंपिंग स्थलों पर उचित रिटेनिंग संरचनाओं के साथ रखा जाना चाहिए। उनका कहना है कि तेज बारिश के दौरान यही ढीला मलबा बहकर नीचे आता है, जिससे फ्लैश फ्लड की स्थिति और गंभीर हो जाती है तथा नदियों में गाद और तलछट की मात्रा बढ़ जाती है।
संवेदनशील ढलानों के आसपास रहने वाले लोगों का यह भी कहना है कि सड़क निर्माण के दौरान बड़े पैमाने पर पहाड़ काटे गए हैं, लेकिन ढलानों को स्थिर करने और जल निकासी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई। उनका दावा है कि इसी कारण विशेषकर मानसून के दौरान भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं।
विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि हिमालय दुनिया की सबसे नाजुक पर्वतीय पारिस्थितिकी प्रणालियों में से एक है। उनका कहना है कि यदि कठोर पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के बिना अनियंत्रित विकास कार्य किए जाते हैं, तो आपदाओं का जोखिम काफी बढ़ सकता है। जलवायु वैज्ञानिकों का भी मानना है कि बढ़ते तापमान के कारण पूरे हिमालयी क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं अधिक बार हो रही हैं, जिससे मौसम का पारंपरिक स्वरूप लगातार अधिक अनिश्चित होता जा रहा है।
पिछले कई वर्षों में चिनाब घाटी मौसम से जुड़ी अनेक विनाशकारी आपदाओं की गवाह रही है।
पिछले वर्ष किश्तवाड़ जिले के चिशोटी क्षेत्र में हुए बादल फटने की घटना ने भारी तबाही मचाई थी। इस आपदा में मकान, कृषि भूमि, सड़कें और सार्वजनिक बुनियादी ढांचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ था तथा कई लोगों की जान चली गई थी। इस त्रासदी ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया और यह स्पष्ट कर दिया कि पर्वतीय इलाकों में आपदा प्रबंधन कितनी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
जुलाई 2021 में किश्तवाड़ जिले के दच्छन के होंजार क्षेत्र में बादल फटने की घटना ने भी भारी तबाही मचाई थी। उस दौरान सड़कें, पुल और मकान बह गए थे तथा जान-माल का भारी नुकसान हुआ था।
रामबन जिला भी बार-बार विनाशकारी भूस्खलनों और फ्लैश फ्लड का सामना करता रहा है। विशेष रूप से जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर भारी बारिश के कारण अक्सर यातायात बाधित होता है, जिससे कश्मीर और देश के बाकी हिस्सों के बीच संपर्क प्रभावित होता है।
डोडा जिले में भी लगातार भूस्खलन, ढलानों के धंसने और फ्लैश फ्लड की घटनाएं सामने आती रही हैं, जिनका असर दूरदराज के गांवों, सड़क संपर्क और कृषि भूमि पर पड़ता है।