बर्बादी का मंजर; फोटो: आईस्टॉक 
आपदा

आपदाओं के आर्थिक नुकसान का 43 फीसदी घरों के नाम, हर साल लग रही 22,800 करोड़ डॉलर की चपत

दुनिया भर में आपदाओं से होने वाले आर्थिक नुकसान का बड़ा हिस्सा घरों को तबाह होने से जुड़ा है, ऐसे में सुरक्षित आवास और समय पर कार्रवाई लाखों लोगों की जिंदगी बचा सकती है।

Lalit Maurya

  • आपदाएं जब घरों को तबाह करती हैं, तो नुकसान सिर्फ ईंट-पत्थर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवारों की जमा-पूंजी, आजीविका और भविष्य के सपने भी बिखर जाते हैं।

  • संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, आपदाओं से होने वाले दर्ज प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान में 43 फीसदी हिस्सा घरों को हुए नुकसान का है। बाढ़, चक्रवात, भूकंप और सुनामी से दुनिया भर में आवासीय इमारतों को हर साल औसतन करीब 22,800 करोड़ डॉलर का नुकसान होने का अनुमान है।

  • वहीं, इन चार आपदाओं से इमारतों को होने वाले कुल अनुमानित सालाना नुकसान में आवासीय भवनों की हिस्सेदारी करीब 53 फीसदी है।

  • संयुक्त राष्ट्र ने चेताया है कि आपदाओं से होने वाली तबाही कम करने के लिए सुरक्षित घरों, बेहतर शहरी नियोजन और समय पर चेतावनी के साथ परिवारों को आपात स्थितियों से निपटने के लिए तैयार करना जरूरी है।

  • लॉयड्स रजिस्टर फाउंडेशन के वर्ल्ड रिस्क पोल 2026 के अनुसार, आपदा का अनुभव कर चुके और पहले से चेतावनी पाने वाले लोगों में, जिनके पास आपदा से निपटने की योजना और अपनी सुरक्षा का भरोसा दोनों थे, 83 फीसदी ने कार्रवाई की। इसके मुकाबले, दोनों के अभाव में केवल 27 फीसदी लोग ही कदम उठा सके।

  • नेपाल, वेनेजुएला और कोलंबिया की आपदाएं भी दिखाती हैं कि तबाही के बाद घरों का पुनर्निर्माण ही पर्याप्त नहीं; प्रभावित परिवारों को आजीविका, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी सुविधाएं बहाल करने में भी मदद चाहिए। सुरक्षित घर और तैयार परिवार ही आपदा के खतरे को कम करने तथा लोगों के जीवन और भविष्य को बचाने की दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

घर सिर्फ ईंट, सीमेंट और छत से नहीं बनता। उसमें किसी परिवार की जिंदगी भर की कमाई, बच्चों का बचपन और सुरक्षित भविष्य के सपने बसे होते हैं। लेकिन जब बाढ़, भूकंप या चक्रवात जैसी आपदा आती है, तो एक झटके में यह सब बिखर सकता है।

घर के ढहने के साथ न केवल परिवारों के सिर से छत छिन जाती है, बल्कि उन्हें अपनी जिंदगी दोबारा शुरू करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े भी बताते हैं कि आपदाओं से होने वाले दर्ज प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान में 43 फीसदी हिस्सा घरों को हुए नुकसान का है। आपको जानकर हैरानी होगी कि बाढ़, चक्रवात, भूकंप और सुनामी से दुनिया भर में आवासीय इमारतों को हर साल औसतन करीब 22,800 करोड़ डॉलर का नुकसान हो रहा है।

अनुमान है कि इन चार आपदाओं से दुनिया भर की इमारतों को हर साल होने वाले कुल नुकसान में करीब 53 फीसदी हिस्सा आवासीय भवनों का होता है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र ने चेताया है कि आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए घरों को सुरक्षित बनाना और परिवारों को आपात स्थितियों से निपटने के लिए तैयार करना बेहद जरूरी है।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का कहना है कि आपदाओं से बचाव की शुरुआत घर को सुरक्षित बनाने से होती है। परिवारों को संभावित खतरों की जानकारी होनी चाहिए और आपदा से निपटने की तैयारी पहले से रखनी चाहिए। समय रहते सही कदम उठाकर लोगों की जान बचाई जा सकती है।

सिर्फ आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं आपदा की मार

संयुक्त राष्ट्र आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यालय (यूएनडीआरआर) के मुताबिक, देशों से मिले आंकड़े बताते हैं कि आपदाओं से प्रभावित बताए गए लोगों में करीब आधे ऐसे थे, जिनके घर क्षतिग्रस्त हुए या पूरी तरह तबाह हो गए थे।

घर के उजड़ने का असर केवल संपत्ति के नुकसान तक सीमित नहीं रहता। इससे परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ सकता है, रोजगार छिन सकता है और बच्चों की पढ़ाई बाधित हो सकती है। इतना ही नहीं लंबे समय तक अस्थाई ठिकानों पर रहने की मजबूरी लोगों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकती है।

यूएनडीआरआर प्रमुख और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव के विशेष प्रतिनिधि कमल किशोर के अनुसार जब तक घरों को अधिक सुरक्षित और आपदा-रोधी नहीं बनाया जाएगा, तब तक आपदाओं से प्रभावित लोगों की संख्या और उनसे होने वाले आर्थिक नुकसान में बड़ी कमी लाना मुश्किल होगा।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आपदा से होने वाली मौतों को कम करने में पिछले 11 वर्षों में जो प्रगति हुई है, उसके मुकाबले प्रभावित लोगों की संख्या और आर्थिक नुकसान घटाने में वैसी ही प्रगति नहीं हुई है।

घरों को सुरक्षित बनाने के लिए क्या करना होगा?

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, सुरक्षित आवास का मतलब सिर्फ मजबूत दीवारें और छत बनाना नहीं। यह भी जरूरी है कि घर ऐसी जगह बनाए जाएं, जहां बाढ़, भूस्खलन, भूकंप या चक्रवात का जोखिम कम हो। भवन निर्माण के नियमों का सख्ती से पालन किया जाए और पुराने घरों को भी जरूरत के मुताबिक मजबूत बनाया जाए।

इसके लिए आवास नीतियों, शहरी नियोजन और निवेश संबंधी फैसलों में आपदा जोखिम को शामिल करना होगा। घरों को स्थानीय खतरों के अनुरूप तैयार करने के साथ भविष्य में बढ़ने वाले जलवायु जोखिमों का भी ध्यान रखना होगा।

मसलन, कहीं भूकंपरोधी निर्माण जरूरी है, तो कहीं बाढ़, चक्रवाती हवाओं या अत्यधिक गर्मी से बचाव के उपाय करने होंगे।

चिंता की बात है कि दुनिया में आज भी लाखों लोग पर्याप्त और किफायती आवास से वंचित हैं। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि आवास की इस कमी को दूर करते समय ही सुरक्षा के मानकों को प्राथमिकता दी जाए, ताकि नए घर भविष्य में आपदाओं के खतरे को बढ़ाने के बजाय उनसे बचाव का जरिया बनें।

चेतावनी मिलने पर भी कार्रवाई नहीं कर पाता हर परिवार

आपदा के बाद पुनर्निर्माण में भी यही सिद्धांत अपनाना जरूरी है। क्षतिग्रस्त घरों को पहले की कमजोरियों के साथ दोबारा खड़ा करने के बजाय अधिक सुरक्षित मानकों के अनुरूप बनाया जाना चाहिए। साथ ही, पुनर्वास की योजना बनाते समय प्रभावित परिवारों की जरूरतों और उनकी भागीदारी को प्राथमिकता देनी चाहिए।

सुरक्षित घरों के साथ लोगों की तैयारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। लॉयड्स रजिस्टर फाउंडेशन के वर्ल्ड रिस्क पोल 2026 के नए निष्कर्ष बताते हैं कि समय रहते चेतावनी मिलने के बावजूद हर व्यक्ति अपने परिवार को बचाने के लिए जरूरी कदम नहीं उठा पाता।

आपदा का अनुभव कर चुके और पहले से चेतावनी पाने वाले लोगों में, जिनके पास न तो परिवार के लिए आपदा से निपटने की कोई योजना थी और न ही खुद को या अपने परिवार को सुरक्षित रखने का भरोसा, उनमें केवल 27 फीसदी लोग ही चेतावनी मिलने पर कार्रवाई कर सके।

इसके विपरीत, जिन लोगों के पास आपदा से निपटने की योजना भी थी और अपनी सुरक्षा के लिए कदम उठाने का भरोसा भी, उनमें 83 फीसदी लोगों ने चेतावनी मिलने पर कार्रवाई की।

मलबे से जिंदगी तक: घर दोबारा बसाने की लंबी चुनौती

यानी, इन दोनों समूहों के बीच 56 फीसदी का अंतर था। ये आंकड़े बताते हैं कि चेतावनी जारी करना ही पर्याप्त नहीं है। लोगों को यह भी पता होना चाहिए कि खतरे के समय कहां जाना है, परिवार के सदस्यों से कैसे संपर्क करना है और खुद को सुरक्षित रखने के लिए क्या करना है।

देखा जाए तो आर्थिक असमानता भी इस तैयारी को प्रभावित करती है। हर परिवार के पास सुरक्षित जगह जाने, जरूरी सामान जुटाने या आपदा के दौरान घर छोड़ने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते। इसलिए सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी परिवारों को जोखिम संबंधी जानकारी, समय पर चेतावनी और सुरक्षा के लिए जरूरी साधन उपलब्ध हों।

आपदा गुजरने के बाद भी नहीं थमती परिवारों की मुश्किलें

आपदा के बाद लोगों की मुश्किलें अक्सर उस समय भी खत्म नहीं होतीं, जब तत्काल राहत और बचाव का काम पूरा हो जाता है। घर लौटना, रोजगार दोबारा शुरू करना और सामान्य जीवन में वापसी करना कई परिवारों के लिए लंबा संघर्ष बन जाता है।

संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय प्रवासन एजेंसी (आईओएम) की मानवीय प्रतिक्रिया और पुनर्बहाली विभाग की निदेशक मारिया मोइता का कहना है कई लोगों के लिए आपदा का अंत घर लौटने, आजीविका बहाल करने और जिंदगी को दोबारा संवारने के लंबे संघर्ष की शुरुआत भर होता है।

उन्होंने नेपाल, वेनेजुएला और कोलंबिया में हाल की आपदाओं का उदाहरण देते हुए बताया कि समय पर आकलन और पुनर्वास की तैयारी प्रभावित लोगों की जरूरतों को समझने में अहम भूमिका निभाती है। गौरतलब है कि नेपाल में अगस्त में ग्लेशियर के ढहने से आई विनाशकारी बाढ़ ने 84,000 से अधिक लोगों को प्रभावित किया और करीब 7,500 घरों को नुकसान पहुंचाया।

इसी तरह वेनेजुएला में जून में आए भूकंपों के बाद एजेंसी ने 50,600 लोगों को अस्थाई आवास, जरूरी सामान, स्वास्थ्य सेवाओं और सुरक्षा संबंधी सहायता उपलब्ध कराई। सर्वेक्षण में आधे से अधिक प्रभावित परिवारों ने घरों की मरम्मत को अपनी प्राथमिकता बताया।

नेपाल से कोलंबिया तक, आपदा की तबाही बयां करते उदाहरण

ऐसा ही कुछ कोलंबिया में भी देखने को मिला जब अगस्त में आए भूकंप से करीब पांच लाख लोग प्रभावित हुए और दो लाख से अधिक घरों को नुकसान पहुंचने की खबर सामने आई। कैली शहर में ही करीब 20,000 परिवारों के विस्थापित होने की जानकारी सामने आई है।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि आपदा के बाद केवल घर दोबारा बना देना पर्याप्त नहीं है। लोगों को पानी, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, रोजगार और दूसरी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच भी चाहिए, ताकि वे सम्मान के साथ अपनी जिंदगी फिर से शुरू कर सकें।

संयुक्त राष्ट्र ने जोर दिया है कि जलवायु परिवर्तन के साथ बढ़ते जोखिमों के बीच आपदा से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए मजबूत इमारतों, बेहतर शहरी नियोजन, समय पर चेतावनी और सामुदायिक तैयारी में लगातार निवेश करना होगा।

आपदा कब आएगी, यह हमेशा पहले से पता नहीं होता। लेकिन घर कितने सुरक्षित हैं, परिवार कितने तैयार हैं और राहत व पुनर्वास की व्यवस्था कितनी मजबूत है, इन पर काम किया जा सकता है।

आखिरकार, आपदा से सुरक्षा का अर्थ केवल जान बचाना नहीं, बल्कि लोगों के घर, उनकी आजीविका और उनके भविष्य को भी सुरक्षित रखना है। मजबूत घर आपदा के खतरे को कम करते हैं और तैयार परिवार उस खतरे का सामना करने की क्षमता बढ़ाते हैं।